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74 दिन बाद दुर्घटनाग्रस्त हेलीकाप्टर ध्रुव एएलएच मार्क-4 के सह-पायलट का क्षत विक्षप्त शव बरामद, रणजीत सागर झील में गिर गया था

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: October 17, 2021 20:32 IST

जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में अगस्त में हादसे के बाद रणजीत सागर बांध में डूबे सेना के हेलीकॉप्टर के सह-पायलट का शव रविवार को बरामद कर लिया गया।

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ठळक मुद्देतीन अगस्त की सुबह सेना का हेलीकाप्टर क्रैश होकर रणजीत सागर झील में गिर गया था। हेलीकाप्टर के साथ पायलट और को-पायलट लापता हो गए थे। काफी मशक्कत से उस जगह को चिह्नित किया गया, जहां हेलीकाप्टर गिरा था।

जम्मूः रंजीत सागर झील में क्रैश हुए सेना के हेलीकाप्टर ध्रुव एएलएच मार्क-4 के लापता पायलट कैप्टन जयंत जोशी का शव 74 दिन के बाद आखिरकार बरामद हुआ। शव पूरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका है। लापता कैप्टन को ढूंढने का प्रयास लगातार जारी था। 

तीन अगस्त की सुबह सेना का हेलीकाप्टर क्रैश होकर रणजीत सागर झील में गिर गया था। हेलीकाप्टर के साथ पायलट और को-पायलट लापता हो गए थे। काफी प्रयास के बावजूद न तो हेलीकाप्टर का सुराग झील में मिल रहा था और न ही लापता पायलट और को-पायलट का।

काफी मशक्कत से उस जगह को चिह्नित किया गया, जहां हेलीकाप्टर गिरा था। पठानकोट के एक नागरिक ने बताया था कि हेलीकाप्टर गिरने के बाद झील में धमाका हुआ था। इसके साथ ही दो महीने से जारी तलाशी अभियान पूरा हो गया। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि कैप्टन जयंत जोशी के पार्थिव शरीर को दोपहर बाद करीब दो बजे बरामद किया गया।

यह हाल के इतिहास में सबसे लंबा तलाशी अभियान रहा। उनके अवशेष को बाद में पठानकोट सैन्य ठिकाने पर ले जाया गया। थल सेना के उड्डयन स्क्वॉड्रन के हेलीकॉप्टर रुद्र ने तीन अगस्त को पठानकोट के मामुन सैन्य ठिकाने से उडान भरी थी और कुछ देर बाद ही वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।

गहन तलाशी अभियान के बाद हेलीकॉप्टर के पायलट लेफ्टिनेंट कर्नल अभीत सिंह बाथ का शव 15 अगस्त को बांध से बरामद किया गया था। अधिकारियों ने बताया कि सबसे लंबे तलाशी अभियान में देशभर से सेना, नौसना, वायुसेना, ‘एनडीआरएफ’, ‘एसडीआरएफ’, जम्मू-कश्मीर पुलिस, बांध प्राधिकरण और निजी कंपनियों के विशेषज्ञों और उपकरणों को हेलीकॉप्टर का मलबा और शवों का पता लगाने के लिए लगाया गया था।

उन्होंने बताया कि भारी मशीनरी और पनडुब्बी बचाव इकाई को भी इस काम में लगाया गया था जबकि नौसेना और थल सेना के विशेष बलों के गोताखोरों ने मिलकर पूरे अभियान के दौरान काम किया। हालांकि, पानी मटमैला और दृष्यता कम होने से उन्हें चुनौती का सामना करना पड़ा। 

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