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स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली पुलिस के 23 कर्मी पुलिस पदकों से सम्मानित

By भाषा | Updated: August 15, 2021 07:32 IST

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नयी दिल्ली, 15 अगस्त दिल्ली पुलिस के 23 कर्मियों को 75वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उनकी विशिष्ट सेवा के लिए उन्हें पुलिस पदकों से सम्मानित किया गया। अधिकारियों ने शनिवार को यह जानकारी दी।

अधिकारियों ने बताया कि इनमें से छह पुलिसकर्मियों को उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान गंभीर स्थिति में दिखाए गए उनके अदम्य साहस, बुद्धिमत्ता और बहादुरी के लिए वीरता के पुलिस पदक से सम्मानित किया गया है। इस पदक से सम्मानित किए गए पुलिसकर्मियों में तत्कालीन डीसीपी (पुलिस उपायुक्त) अमित शर्मा (वर्तमान में दमन में एसपी (पुलिस अधीक्षक) के पद पर तैनात), तत्कालीन एसीपी (सहायक पुलिस उपायुक्त) अनुज कुमार (वर्तमान में दीव के एसपी के रूप में तैनात) और हेड कांस्टेबल रतन लाल (मरणोपरांत), कांस्टेबल प्रदीप शर्मा, मोहित कुमार और नवीन शामिल हैं।

अधिकारियों ने बताया कि इनके अलावा संयुक्त पुलिस आयुक्त तुषार ताबा और उप निरीक्षक चाको वीसी को विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया है, जबकि अतिरिक्त पुलिस आयुक्त रजनीश गुप्ता और राजीव रंजन, डीसीपी विक्रम कपाली पोरवाल, डीसीपी अजय पाल सिंह, डीसीपी सुशील कुमार सिंह और अतिरिक्त डीसीपी गोविंद उन 15 कर्मियों में शामिल हैं, जिन्हें सराहनीय सेवा के लिए पुलिस पदक से सम्मानित किया गया है।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मौजपुर चौक के पास दो समुदायों के बीच 24 फरवरी, 2020 को हिंसक झड़पें हुई थीं। इस दौरान लोगों की भीड़ ने पथराव किया था, जिसके कारण दंगे शुरू हो गए थे।

पुलिस के अनुसार, उस समय पुलिस उपायुक्त (शाहदरा) के रूप में तैनात अमित शर्मा चांद बाग मजार में एक विरोध स्थल पर थे। वह यह सुनिश्चित कर रहे थे कि वजीराबाद रोड पर यातायात बाधित न हो, लेकिन भारी भीड़ होने के कारण, एसीपी गोकुलपुरी अनुज कुमार डीसीपी की मदद के लिए अन्य कर्मियों के साथ वहां पहुंचे।

उन्होंने बताया कि जब भीड़ 30,000 के करीब पहुंच गई और बृजपुरी टी-प्वाइंट तक फैल गई, तो शर्मा और उनके साथी पुलिसकर्मियों ने भीड़ को शांत करने की कोशिश की और लोगों को धरना स्थल पर ही रहने के लिए कहा, लेकिन लोगों ने वजीराबाद रोड की ओर आक्रामक तरीके से बढ़ना शुरू कर दिया। अचानक पुलिस दल के आसपास भीड़ जमा हो गई और पथराव करने लगी।

घटना को याद करते हुए शर्मा ने कहा कि उन्होंने किसी भी परिस्थिति में घटनास्थल से नहीं हटने का सोच-समझकर फैसला किया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय राष्ट्रीय राजधानी में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मुलाकात कर रहे थे।

शर्मा ने कहा, ‘‘मैं इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट था कि हम गोली नहीं चलाएंगे क्योंकि मेरे सामने महिलाएं और बच्चे थे, भले ही बाद में उन्हें हम पर हमला करने के लिए ढाल के रूप में इस्तेमाल किया गया था। मेरे ऑपरेटर नवीन और मैं वहां खड़े थे, हम मुश्किल से 40 पुलिसकर्मी थे ... और तंग गलियों में हिंसा भड़क गई, क्योंकि भीड़ ने पथराव करना और स्थानीय लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया ... मुझे सिर पर गंभीर चोट लगी और नवीन भी गंभीर रूप से घायल हो गए थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन जब मैं बेहोश हो गया, तो कांस्टेबल प्रदीप शर्मा और मोहित ने अद्म्य साहस दिखाया। मुझे अब भी याद है कि कैसे वे मुझे भीड़ से बचाने में कामयाब रहे और हिंसा के बीच मुझे अस्पताल लेकर गए।’’

पुलिस ने बताया कि झड़पों के दौरान एसीपी गोकुलपुरी की सहायता कर रहे हेड कांस्टेबल रतन लाल भीड़ की गोली लगने से घायल हो गए और उनकी मौत हो गई। लाल के परिवार में उनकी पत्नी पूनम हैं जो उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी में अपने तीन बच्चों के साथ रहती हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे बहुत गर्व है कि मेरे पति को पदक मिल रहा है, लेकिन हमें और खुशी होती अगर उन्हें उनके जीवित रहते यह पुरस्कार मिलता। मेरे लिए मेरे पति से बड़ा कोई पुरस्कार नहीं है। दुर्भाग्य से, वह अब नहीं रहे लेकिन मुझे खुशी है कि लोग उन्हें उनकी सेवा के लिए अब भी याद कर रहे हैं।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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