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कोरोना ही नहीं ये वायरस भी है जानलेवा, इलाज नहीं कराने पर 100 में से 80 की हो सकती है मौत

By अभिषेक पारीक | Updated: July 22, 2021 21:23 IST

वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरण के कारण लोग बेहद परेशान हैं। हालांकि कोरोना के साथ ही ऐसे कई वायरस हैं जो न सिर्फ कोरोना की तरह ही खतरनाक है बल्कि जिनके कारण जान तक जा सकती है।

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ठळक मुद्देचीन में 27 मई को मंकी बी वायरस से एक पशु चिकित्सक की मौत हो गई थी। मंकी बी वायरस के बारे में जानने के लिए वैज्ञानिक निरंतर केशिश में जुटे हैं। इससे संक्रमित होने वाले 80 फीसद लोगों की इलाज नहीं कराने पर मौत हो जाती है। 

वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरण के कारण लोग बेहद परेशान हैं। हालांकि कोरोना के साथ ही ऐसे कई वायरस हैं जो न सिर्फ कोरोना की तरह ही खतरनाक है बल्कि जिनके कारण जान तक जा सकती है। चीन से कोरोना के बाद अब मंकी बी वायरस सामने आया है। हाल ही में वायरस से पहली मौत का मामला सामने आया था। 

चीन के मीडिया के मुताबिक, बीजिंग में पशु चिकित्सक नॉन ह्यूमन प्राइमेट्स पर शोध में जुटे थे। उन्होंने मार्च में बंदरों पर शोध किया था, जिसके करीब एक महीने बाद उनमें संक्रमण के शुरुआती लक्षण नजर आने लगे थे। कई अस्पतालों में इलाज के बावजूद उन्हें नहीं बचाया जा सका और 27 मई को उनकी मौत हो गई। 

उनकी मौत के बाद भी कई सैंपल लिए गए हैं और वायरस के बारे में और अधिक जानने की कोशिश की जा रही है। चीन के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी डिजील कंट्रोल एंड प्रिवेंशन में यह सैंपल भेजे गए हैं। 

मंकी बी वायरस के बारे में धीरे-धीरे जानकारी सामने आ रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह वायरस मैकाक बंदरों से फैलता है। यह बंदर इन्हें चिंपांजी में भी इन्हें फैला सकते हैं। साथ ही यह वायरस मनुष्यों के लिए भी खतरनाक है। यह न सिर्फ मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है, बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकता है। इस वायरस को हर्पीस बी या हर्पीस वायरस के नाम से भी जाना जाता है। 

इसके लक्षण भी सामान्य ही होते हैं। जिनमें बुखार, मांसपेशियों में दर्द, सिर में दर्द हो सकते हैं। साथ ही सांस लेने में तकलीफ, उल्टी और बेचैनी भी इसके कारण हो सकते हैं। यह वायरस मनुष्य के नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है और दिमाग को प्रभावित कर सकता है। संक्रामक बीमारियों के विशेष डॉ. केंटोरा इवाटा ने कहा है कि इलाज ना होने पर यह 70 से 80 फीसद मरीजों की जान भी जा सकती है। 

हालांकि अमेरिका के यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, इसकी पहचान पहली बार 1932 में हुई थी और अभी तक वैश्विक स्तर पर इसके सिर्फ 50 मामले सामने आए हैं। इनमें से 21 की मौत हो चुकी है।  

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