गुरुग्राम में 3 साल की बच्ची से बलात्कार?, उच्चतम न्यायालय ने कहा- आयुक्त से लेकर सब-इंस्पेक्टर तक नाकाम?, कानून का जरा भी सम्मान तो तबादला करो
By सतीश कुमार सिंह | Updated: March 25, 2026 16:03 IST2026-03-25T16:02:42+5:302026-03-25T16:03:28+5:30
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने हरियाणा सरकार को तत्काल विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन करने का निर्देश दिया।

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नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा के गुरुग्राम में तीन साल की बच्ची से बलात्कार के मामले में राज्य पुलिस के रवैये को ‘‘शर्मनाक’’ और ‘‘असंवेदनशील’’ बताते हुए बुधवार को इसकी निंदा की तथा इस घटना की निष्पक्ष जांच के लिए महिला आईपीएस अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम का गठन किया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने हरियाणा सरकार को तत्काल विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन करने का निर्देश दिया और गुरुग्राम पुलिस को मामले के रिकॉर्ड जांच समिति को सौंपने के निर्देश दिए।
बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले में गुरुग्राम पुलिस की प्रतिक्रिया की कड़ी आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि यह एक "स्पष्ट" मामला है, जहां आरोपियों को बचाने की कोशिश की गई। कोर्ट ने बच्ची और उसके माता-पिता के साथ पुलिस अधिकारियों के व्यवहार पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह "अत्यंत असंवेदनशीलता" को दर्शाता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने "पूरी मानवीय संवेदनशीलता" के साथ मामले की नए सिरे से जांच करने के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया। कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस आयुक्त विकास कुमार अरोड़ा और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया।
कोर्ट ने बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट बदलने वाले डॉक्टर और मुख्य कल्याण समिति के सदस्यों को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा, "आयुक्त से लेकर सब-इंस्पेक्टर तक, पूरी पुलिस फोर्स ने यह साबित करने की हर संभव कोशिश की कि बच्ची के पास कोई सबूत नहीं है या माता-पिता की बात बेतुकी है।"
बच्ची से जिरह करने वाले अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि यह "द्वितीय उत्पीड़न" और "अपमान" का सबसे बुरा रूप है। यह पीठ गुरुग्राम पुलिस की निष्क्रियता के आरोप में अभिभावकों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इससे पहले, अदालत ने पुलिस और जिला न्यायपालिका से यह स्पष्टीकरण मांगा था कि मजिस्ट्रेट ने आरोपी की उपस्थिति में बच्चे से पूछताछ कैसे की।
पीठ ने पूछा कि यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (पीओसीएसओ) की धारा 6 से अपराध को घटाकर धारा 10 क्यों कर दिया गया। धारा 6 में अपराध सिद्ध होने पर कम से कम 20 वर्ष की कैद का प्रावधान है, जबकि धारा 10 में 10 वर्ष की कैद का प्रावधान है।
हरियाणा की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने जब कहा कि बाल कल्याण समिति की रिपोर्ट के आधार पर आरोप बदले गए हैं, तो अदालत ने पूछा कि रिपोर्ट को बच्ची के बयान से अधिक महत्व क्यों दिया गया और वकील से कहा कि "जिसका बचाव नहीं किया जा सकता, उसका बचाव न करें"।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, "पुलिस अधिकारियों को देखिए। उनका पद और ओहदा... पुलिस उपायुक्त, सहायक पुलिस अधीक्षक। अगर बच्ची के साथ हुए अपराध की यही समझ है, तो कानून का क्या? ... बलात्कार केवल शारीरिक प्रवेश नहीं है। पुलिस को स्पष्ट रूप से इसकी जानकारी नहीं है। यह बेहद चिंताजनक है।
सबसे उच्च पुलिस अधिकारी इस अपराध की गंभीरता को धारा 6 से घटाकर धारा 10 करने में शामिल थे।" मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "उन्होंने तो मूल अधिनियम को भी नहीं पढ़ा है।" “आपने बच्ची की मासूमियत पर शक किया है। उन पर शर्म आती है। अगर राज्य को कानून का जरा भी सम्मान है, तो उनका तुरंत तबादला होना चाहिए। आप कहते हैं कि सीसीटीवी नहीं है, वगैरह। 15 दिनों से आपने कुछ नहीं किया।
जैसे ही हमें संज्ञान आता है, आप गिरफ्तारियां शुरू कर देते हैं। क्या आप चाहते हैं कि हम आपको बताएं कि आप किस काम में व्यस्त थे? यह मामला असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा को दर्शाता है,” उन्होंने कहा। अभिभावकों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि बच्ची की जांच करने वाली डॉक्टर ने अपनी रिपोर्ट बदल दी।
“यह पूरी तरह से गैरकानूनी है, यह सब हरियाणा पुलिस के दबदबे की वजह से हुआ है,” न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि हलफनामे में हर जगह बच्ची का नाम लिखा है। “हम दिन भर यही सिखाते हैं कि पीड़ित की पहचान उजागर न करें।”
अदालत ने बच्ची के घर न जाने के लिए पुलिसकर्मियों को फटकार भी लगाई। “पुलिस पीड़ित के घर क्यों नहीं जा सकती? क्या वे राजा हैं?” मुख्य न्यायाधीश ने पूछा। उन्होंने कहा कि गुरुग्राम पुलिस द्वारा अपनाई गई असंवेदनशील, लापरवाह, गैरजिम्मेदार और पूरी तरह से गैरकानूनी जांच पद्धति के परिणामस्वरूप बच्चे का आघात कई गुना बढ़ गया।