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लकड़ी के चूल्हे से परिवार का भला होने का विश्वास है स्वच्छ रसाईं ईंधन के रास्ते की बाधा: शोध

By भाषा | Updated: November 10, 2020 18:35 IST

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नयी दिल्ली, 10 नवंबर भारत खाने पकाने के लिये स्वच्छ ईंधन के उपयोग पर जोर दे रहा है और व्यापक स्तर पर बदलाव भी आ रहा है। लेकिन लोगों की यह सोच कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलपीजी) की जगह लकड़ी से खाना पकाना उनके परिवार की भलाई और बेहतरी के लिये अच्छा है, स्वच्छ ईंधन अभियान के रास्ते में रोड़ा है।

पत्रिका नेचर एनर्जी में प्रकाशित एक अध्ययन में यह कहा गया है। अध्ययन के अनुसार विभिन्न ईंधन का उपयोग करने वाली भारतीय ग्रामीण महिलाओं की सोच में अंतर को समझना स्वच्छ ईंधन का व्यापक तौर पर उपयोग सुनिश्चित करने के लिये जरूरी है।

रिपोर्ट लिखने वाली और ब्रिटेन में बर्मिंघम विश्विविद्यालय की रोजी डे ने कहा, ‘‘भारत का हर घर में खाना पकाने के लिये स्वच्छ ईंधन के उपयोग का लक्ष्य है। लेकिन गांवों में जिस पैमाने पर लकड़ी समेत ठोस ईंधन का उपयोग किया जा रहा है, वास्तव में यह संकेत देता है कि स्वच्छ ईंधन का हर घर में सतत रूप से उपयोग का लक्ष्य हासिल करना अभी दूर की कौड़ी है।’’

डे कहती हैं, ‘‘हालांकि खाना पकाना केवल महिलाओं का काम नहीं है लेकिन वास्तविकता यह है कि उनका प्राथमिक कार्य रसोई संभालना ही माना जाता है। इसीलिए अगर भारत को हर घर में स्वच्छ ईंधन को पहुंचाना है तो यह देखना जरूरी है कि महिलाएं खाना पकाने के ईंधन और लाभ के बीच संबंध को किसी रूप में देखती हैं।’’

अध्ययन के अनुसार भारत में दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले लोग लकड़ी, कोयला जैसे ठोस ईंधन पर ज्यादा भरोसा करते हैं।

इसमें कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में सभी को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने को भी रखा गया है। भारत ने भी इस पर हस्ताक्षर किया है।

मौजूदा शोध में वैज्ञानिकों ने आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के चार गांवों में इस बारे में महिलाओं के साथ चर्चा की।

उनका कहना है कि चार गांवों में से दो में बड़े पैमाने पर खाना पकाने के ईंधन के रूप में लकड़ी का उपयोग किया जाता है। अन्य दो गांवों में ज्यादातर एलपीजी उपयोग करने वाले हैं। वे लकड़ी की जगह एलपीजी का उपयोग कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार ईंधन के रूप में लकड़ी का उपयोग करने वाली महिलाओं का मानना है कि इस ईंधन से उनकी वित्तीय हालत बेहतर होती है क्योंकि लकड़ी बेचकर वह कुछ कमा भी लेती है। वहीं ईंधन चुनने के काम से उन्हें दूसरे लोगों से जुड़ने-बातचीत का मौका मिलता है और वे इस परंपरा को जारी रखना चाहती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार इन गांवों के लोगों का मानना है कि एलपीजी से उनकी जेबें ढीली होती हैं। साथ ही इससे बनने वाले खाने का स्वाद अच्छा नहीं होता और उन्हें सिलेंडर फटने का भय भी सताता रहता है।

दूसरी तरफ, एलपीजी उपयोग करने वालों ने शोधकर्ताओं से कहा कि इस ईंधन के उपयोग से सामाज में उनका दर्जा बढ़ा है। साथ ही इससे बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों का देखभाल आसान हुआ है।

उनका कहना है कि एलपीजी के उपयोग से उनके पास समय बच रहा है जिसका उपयोग वे बाहर काम करने और पैसा कमाने में कर रहे हैं तथा अपने परिवार के साथ समय बिता रहे हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि नये ईंधन को बढ़ावा देने के साथ उन महिलाओं को जोड़ने की जरूरत है जो ठोस ईंधन और स्वच्छ ईंधन का उपयोग करती हैं। उनके बीच हर ईंधन के लाभ के बारे में एक खुली चर्चा होनी चाहिए।

अध्ययन के अनुसार इस परिचर्चा और बातचीत से लड़की का उपयोग करने वाली महिलाएं एलपीजी के लाभ से अवगत हो पाएंगी, उनकी चिंताएं दूर होंगी और उन्हें एक-दूसरे से सीखने का मौका मिलेगा।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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