लखनऊः केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए जीएसटी के बाद से उत्तर प्रदेश में पान मसाला तथा तंबाकू उत्पादों के साथ ईंट भट्ठा उद्योग से मिलने वाले राजस्व में भारी कमी आई है. प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना के अनुसार, प्रदेश में पान मसाला तथा तंबाकू उत्पादों की खपत में कोई कमी नहीं होने के बाद भी इससे मिलने वाले राजस्व से सरकार को होने वाली कमाई लगभग 70 फीसदी तक कम हो गई है.
इन दोनों उद्योगों से सरकार को हर साल 1150 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है. क्योंकि पान मसाला उद्योग से सालाना मिलने वाला 1000 करोड़ रुपए का राजस्व अब घटकर 300 करोड़ रुपए रह गया. इसी प्रकार ईंट भट्ठों से होने वाली वार्षिक कमाई 700 करोड़ रुपए से घटकर 250 करोड़ रह गई है.राज्य में चावल मिलों की संख्या भी 4000 से घटकर अब 1700 रह गई है.
इस कारण प्रदेश सरकार ने वर्ष 2017 से हो रहे इस राजस्व नुकसान का मुद्दा केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के समक्ष उठाया है. वित्त मंत्री सुरेश खन्ना के मुताबिक केंद्रीय वित्त मंत्री से प्रदेश सरकार ने पान मसाला और तंबाकू उत्पादों में क्षमता आधारित/उत्पादन आधारित कर व्यवस्था लागू किए जाने की मांग की है.
केंद्रीय वित्त मंत्री से की गई यह मांगे
सुरेश खन्ना के अनुसार, वर्ष 2017 में जीएसटी लागू होने से पहले पान मसाला और तंबाकू उत्पादों से लगभग 1000 करोड़ रुपए का राजस्व सूबे को प्राप्त होता था, जो जीएसटी लागू होने के बाद से घटकर महज 300 करोड़ रुपए रह गया है. जबकि पान मसाला तथा तंबाकू उत्पाद में और खपत में कोई कमी नहीं हुई है फिर भी सूबे के राजस्व में कमी बनी हुई है.
इसलिए पान मसाला और तंबाकू उत्पाद पर क्षमता आधारित/उत्पादन आधारित कर व्यवस्था लागू किए जाने पर केंद्र सरकार को विचार किया जाना चाहिए। सुरेश खन्ना का कहना है केंद्रीय वित्त मंत्री से ये आग्रह करते हुए उन्हे ईंट भट्ठा उद्योगों पर जीएसटी लागू होने के बाद करों में हुई भारी कमी के बारे में बताया गया है.
उन्हें बताया गया है कि जीएसटी से पहले इस उद्योग से 700 करोड़ रुपए राजस्व प्रदेश को मिलता था, अब महज 250 करोड़ रुपए राजस्व प्राप्त हो रहा है क्योंकि वर्तमान कर व्यवस्था राज्य में इन दोनों उद्योग के लिए अव्यवहारिक साबित हो रही है. इसलिए इसकी समग्र समीक्षा किए जाने का अनुरोध केंद्रीय वित्त मंत्री से गया है.
इसके साथ ही उन्हे यह भी बताया गया है कि प्रदेश में चावल मिलों की संख्या 4,000 से कम होकर महज 1,700 रह गई हैं. सुरेश खन्ना बताते हैं कि कंबाइन मशीन में कटाई के कारण धान में सामान्यतः: 20-25 प्रतिशत तक नमी रहती है, जबकि सरकारी मापदंडों में नमी की सीमा 17 प्रतिशत निर्धारित है. चावल में 30-40 प्रतिशत तक टूटन होती है,
जबकि सरकार द्वारा केवल 25 प्रतिशत टूटन के आधार पर रिकवरी ली जाती है. इन नियमों के कारण चावल मिल मालिकों को नुकसान होता है. इस लिए राज्य में बंद हो रही चावल मिलों को बचाने के लिए इन मानकों की व्यावहारिक समीक्षा करने की मांग भी केंद्र सरकार से की गई है.
यूपी के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना का कहना है
सुरेश खन्ना का कहना है कि वर्तमान जीएसटी की कर व्यवस्था राज्य सरकार और पान मसाला तथा तंबाकू उद्योग और ईट भट्टा उद्योग के लिए अव्यवहारिक साबित हो रही है. इसकी समग्र समीक्षा किए जानी चाहिए और क्षमता/उत्पादन आधारित कर व्यवस्था लागू किए जाने पर विचार किया जाना चाहिए.
क्षमता आधारित टैक्स व्यवस्था में मशीन और ईंट भट्ठों की कुल उत्पादन क्षमता के आधार पर टैक्स तय कर दिया जाता था. जिसमें कारोबारी को तय धनराशि देने की बाध्यता थी. सरकार को भी तय धनराशि मिल जाती थी. जबकि वर्ष 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद पान मसाला व तंबाकू उत्पादों पर 28 प्रतिशत कर लगाया गया था.
सितंबर में जीएसटी दरें बढ़ने के हुए फैसले के बाद पान मसाला तथा तंबाकू उत्पादों पर 40 प्रतिशत जीएसटी लागू की गई है. जीएसटी दरें बढ़ने से पान मसाला व तंबाकू उत्पादों से मिलने वाले कर में कुछ बढ़ोतरी होने का अनुमान है, इसके बाद भी प्रदेश को इन उद्योगों से मिलने वाला राजस्व वर्ष 2017 में मिलने वाले राजस्व से कम ही होगा.
सुरेश खन्ना यह भी बताते हैं कि जीएसटी में मशीन व ईंट भट्ठों की कुल उत्पादन क्षमता नहीं देखी जाती है, इसमें व्यापारी खुद कुल उत्पादन की घोषणा करता है, जिसके आधार पर जीएसटी ली जाती है. इस कारण से इस उद्योग पर भी क्षमता आधारित टैक्स व्यवस्था लागू की जानी चाहिए.