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1500 करोड़ रुपए का नुकसान?, युद्ध विराम की घोषणा और लखनऊ में प्लास्टिक, साबुन, गत्ता, बेकरी, टेक्सटाइल उद्योग के मालिक और कर्मचारियों ने ली राहत की सांस

By राजेंद्र कुमार | Updated: April 8, 2026 17:50 IST

अविनाश त्रिपाठी का कहना है कि लखनऊ में करीब चार हजार प्लास्टिक उद्योगों का उत्पादन घटकर 20 फीसदी रह गया है. कच्चे माल की कीमत दोगुनी होने से यह स्थिति बनी है.

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ठळक मुद्देप्लास्टिक, साबुन और टेक्सटाइल कारोबार को भारी क्षति हुई है.निजी और सरकारी कंपनियों में भी कच्चे माल की उपलब्धता नहीं है.गैस की किल्लत के कारण नाश्ता काउंटर भी नहीं चल पा रहे हैं.

लखनऊः ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्ते के युद्ध विराम की घोषणा हो गई. इस खबर से लखनऊ में प्लास्टिक, साबुन, गत्ता, बेकरी, टेक्सटाइल और रसायन जैसे अन्य उद्योग के मालिक और कर्मचारियों ने राहत की सांस ली है. क्योंकि युद्ध के कारण उक्त उद्योगों को करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ है. इसमें प्लास्टिक उद्योग सर्वाधिक प्रभावित हुआ है, जिसे 500 करोड़ रुपए से अधिक की हानि का होने का अनुमान है. साबुन, गत्ता, बेकरी और रसायन जैसे अन्य उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. यूपी आदर्श व्यापार मंडल के प्रदेश प्रभारी अविनाश त्रिपाठी के अनुसार, युद्ध के कारण प्रदेश भर में तमाम उद्योगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. लखनऊ भी इससे अछूता नहीं है, इस शहर में प्लास्टिक, साबुन और टेक्सटाइल कारोबार को भारी क्षति हुई है.

घटा उत्पादन हुआ नुकसान

अविनाश त्रिपाठी का कहना है कि लखनऊ में करीब चार हजार प्लास्टिक उद्योगों का उत्पादन घटकर 20 फीसदी रह गया है. कच्चे माल की कीमत दोगुनी होने से यह स्थिति बनी है. प्लास्टिक दाना जो नब्बे-सौ रुपये प्रति किलो मिलता था, वह दो सौ रुपए के पार पहुंच गया है. निजी और सरकारी कंपनियों में भी कच्चे माल की उपलब्धता नहीं है.

बाजार 80 फीसदी तक घटने से उद्यमियों को रोजी-रोटी का संकट सताने लगा था. गैस की किल्लत के चलते शहर में  मिठाई, रेस्टोरेंट, ढाबे और होटल कारोबार को एक महीने में दो सौ करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ है. लखनऊ में मिठाई की बिक्री आधी रह गई है. यही नहीं शहर में गैस की किल्लत के कारण नाश्ता काउंटर भी नहीं चल पा रहे हैं.

हर दिन कच्चे माल की कीमत बढ़ रही है. इस कारण से तमाम कारोबार बंद होने की कगार पर पहुंच गए. उत्पादन घट गया तो कारखानों में काम करने वाले श्रमिक भी पलायन करने लगे थे. आईआईए के चेयरमैन विकास खन्ना का कहना है कि पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ी कीमतें, गैस सिलेंडर की दिक्कत, डीजल की कमी आने के कारण करीब 40 दिनों से लखनऊ का  उद्योग बेपटरी रहा. पैकेजिंग कारोबार घटकर आधा रह गया. साबुन उद्योग में पाम ऑयल, रसायन और पैकेजिंग सामग्री महंगी हुई है.

इससे तैयार माल की लागत बढ़ी है और कारोबार पंद्रह-बीस फीसदी ही बचा है. अभी भी स्थिति सुधरी नहीं है. उद्यमी अपनी पूंजी का 25 फीसदी हिस्सा खर्च कर चुके हैं. लागत बढ़ने से व्यापारी माल लेने को तैयार नहीं हैं. श्रमिकों के रोजगार पर भी संकट गहराया है. उम्मीद है कि युद्ध विराम का समय खत्म होने के बाद युद्ध नहीं होगा. स्थिति सुधरेगी और उद्योग धंधे फिर पटरी पर आ जाएंगे. 

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