हो जाएं अलर्ट, बैन 31 दिसंबर 2027 तक बढ़ाया?, नीम, पीपल, बरगद, आम, शीशम, सागौन, महुआ, बेल, जामुन, आंवला सहित 29 प्रमुख प्रजाति के पेड़ काटने पर?
By राजेंद्र कुमार | Updated: February 27, 2026 17:15 IST2026-02-27T17:14:23+5:302026-02-27T17:15:09+5:30
सरकार ने नीम, पीपल, बरगद, आम, शीशम, सागौन, महुआ, बेल, जामुन, आंवला सहित 29 प्रमुख प्रजातियों के पेड़ों को काटने पर लगे प्रतिबंध को सरकार ने 31 दिसंबर 2027 तक लिए और बढ़ा दिया है.

file photo
लखनऊः उत्तर प्रदेश में हर साल घर के दरवाजे, खिड़कियां, चौखट और फर्नीचर आदि के निर्माण के लिए हर साल करीब 40 से 50 लाख घन मीटर औद्योगिक लकड़ी की आवश्यकता होती है. अगले दस वर्षों में औद्योगिक लकड़ी की मांग बढ़कर 8 से 9 करोड़ घन मीटर होने की संभावना है. यही वजह है कि सूबे की सरकार राज्य में हर साल 35 लाख पौधे लगाने का महाअभियान चलाती है ताकि भविष्य की जरुरत के अनुसार राज्य में औद्योगिक लकड़ी की मांग को पूरा किया जा सके. इसी क्रम में अब प्रदेश सरकार ने नीम, पीपल, बरगद, आम, शीशम, सागौन, महुआ, बेल, जामुन, आंवला सहित 29 प्रमुख प्रजातियों के पेड़ों को काटने पर लगे प्रतिबंध को सरकार ने 31 दिसंबर 2027 तक लिए और बढ़ा दिया है. यह प्रतिबंध बीते 31 दिसंबर को खत्म हो गया था.
सरकार के इस फैसले के तहत अब उक्त 29 प्रजाति के पेड़ वन विभाग की पूर्व अनुमति के बिना काटना गैरकानूनी होगा. यानी जो व्यक्ति बिना अनुमति के नीम, पीपल, बरगद, आम आदि के पेड़ को कटेगा, उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई जाएगी. बिना अनुमति के पड़े काटने वाले व्यक्ति पर आर्थिक जुर्माना लगेगा. ऐसा गैरकानूनी कार्य कई बार किए है तो उसे छह महीने तक की जेल तक हो सकती है.
इस अधिनियम के तहत लगाई गई रोक
प्रदेश की प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण वी हेकाली झिमोमी के अनुसार, उत्तर प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1976 के तहत 29 प्रजातियों के पेड़ों की कटाई को नियंत्रित किया जाता है. इस अधिनियम में समय-समय पर संशोधनों के मध्यम से पेड़ों की कटाई आदि के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाते है. इसी क्रम में वर्ष 2018 में 29 प्रजातियों के पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाया गया था.
प्रतिबंधित प्रजातियों में नीम, पीपल, बरगद, आम (कलमी/तुकमी), साल, महुआ, बीजा साल, गूलर, पाकड़, अर्जुन,पलाश, बेल, चिरौंजी, खिरनी, कैथा, इमली, जामुन, असना, कुसुम, रीठा, भिलावा, तून, सलई, हल्दू, बाकली/करधई, धौ, खैर, शीशम व सागौन शामिल हैं. इन पेड़ों की कटाई पर लगाए गए प्रतिबंध के तहत इन पेड़ों को निजी या सरकारी जमीन से काटने से पहले वन विभाग से अनुमति लेना अनिवार्य किया गया था. अनुमति लेने के लिए यूपी ई-लॉटरी/यूपी फॉरेस्ट पोर्टल से ऑनलाइन आवेदन करना होता है.
इसके साथ ही अब प्रति पेड़ 10 नए पौधे लगाने और उनकी देखभाल सुनिश्चित करने का शपथ पत्र भी देना अनिवार्य किया गया है. यही नहीं एक पेड़ काटने पर 10 नए पौधे लगाने या इसके लिए वन विभाग को प्रतिपूर्ति राशि जमा करना भी अनिवार्य किया गया है.
प्रमुख सचिव पर्यावरण एवं वन के मुताबिक वन विभाग एक पौधे के लिए 100 रुपए जमा कराता है. ताकि 10 पौधों के लिए एक हजार रुपए के साथ ही पौधों के रोपण का खर्च भी अलग से लिया जाता है. रोपण का खर्च प्रभागवार अलग-अलग होता है. इसे जमा करने के बाद पेड़ काटने की अनुमति मिल जाती है.
यूपी का 9.96% हिस्सा हरियाली से ढका
प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण के मुताबिक इस व्यवस्था के चलते ही राज्य में पेड़ों की कटाव को हत्साहित किया जाता है. इसके अलावा सरकार हर साल बड़े पैमाने पर पुधरोपण कर हरियाली के दायरे को बढ़ाने के प्रयास कर रही है. इसके अलावा अब एक्सप्रेसवे और सड़कों के किनारे भी बड़े पैमाने पर हरियाली देने इमली, पीपल, नीम, बरगद, आम आदि के पौधे लगाए जा रही हैं.
ताकि अगले दस वर्षों बाद प्रदेश की जरूरत के मुताबिक औद्योगिक लकड़ी की मांग को पूरा करने में मदद मिल सके. प्रमुख सचिव का कहना है कि यूपी के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल (2,40,928 वर्ग किमी) का लगभग 9.96% हिस्सा हरियाली से ढका है. इससे बढ़ाने के लिए यूपी में पीपल, बरगद और पाकड़ जैसे पेड़ों को विरासत वृक्ष के रूप में भी संरक्षित किया जा रहा है,
ताकि इनकी कटाई को पूरी तरह रोका जा सके. इसके अलावा सरकार ने बीते साल एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत एक ही दिन में 37.21 करोड़ से अधिक पौधे लगाए थे ताकि भविष्य में लकड़ी की कमी से जूझना न पड़े