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कुसहा बांधः 2008 में कोसी नदी विनाश लीला, अभिशाप नहीं वरदान, तरबूज की खेती की कर कमा रहे लाखों रुपये, कोलकाता, उत्तर प्रदेश और दिल्ली मंडी...

By एस पी सिन्हा | Updated: June 4, 2025 15:53 IST

यूपी से आए किसानों ने बंजर हो चुके खेतों में तरबूज उपजाना शुरू किया, जिससे इन इलाकों के किसानों का भाग्य ही बदल गया।

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ठळक मुद्देकुसहा की त्रासदी किसानों के लिए अभिशाप नहीं बल्कि वरदान साबित हो रही है। कोसी नदी के पेट में खेतों में तरबूज के नाम पर किसान सोना उपजा रहे हैं। किसान इसे एक सफल और लाभदायक फसल के रूप में देखते हैं।

पटनाःबिहार में कोसी नदी के द्वारा 2008 में कुसहा बांध को तोड़ते हुए भारी तबाही मचाई गई थी। कुसहा बांध की त्रासदी, जिसे कोसी की त्रासदी भी कहा जाता है, ने उत्तर बिहार में विनाशकारी बाढ़ का कारण बना था। इस बाढ़ से हजारों लोग मारे गए थे और लाखों बेघर हो गए थे। इस त्रासदी ने कोसी क्षेत्र में पडने वाले खेतों में रेत भर दिया था, जिससे खेत बंजर हो गए थे। जिससे किसानों के सामने भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। लेकिन यूपी से आए किसानों ने बंजर हो चुके खेतों में तरबूज उपजाना शुरू किया, जिससे इन इलाकों के किसानों का भाग्य ही बदल गया।

ऐसे में कहा जाने लगा कि कुसहा की त्रासदी किसानों के लिए अभिशाप नहीं बल्कि वरदान साबित हो रही है। कोसी नदी के पेट में खेतों में तरबूज के नाम पर किसान सोना उपजा रहे हैं। यहां तरबूज की खेती काफी लोकप्रिय हो गई है और इस क्षेत्र के किसान इसे एक सफल और लाभदायक फसल के रूप में देखते हैं।

कई किसान यूपी से भी आकर इस क्षेत्र में तरबूज की खेती कर रहे हैं और अच्छी कमाई कर रहे हैं। किसानों की मेहनत से दियारा क्षेत्र खिलखिला उठा है। बता दें कि कोसी का पश्चिमी दियारा इलाका, जो कभी गोलियों की तड़तड़ाहट और बारूद की गंध के लिए मशहूर था, अब तरबूज की खुशबू से महकता है।

हर साल उत्तर प्रदेश से किसान यहां आकर तरबूज की खेती करते हैं। यहां उपजने वाला तरबूज कोलकाता, उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक भेजा जाता है। उत्तर प्रदेश से आए किसान मो. अशरफ ने बताया कि यहां लगभग 30 से अधिक किसान अपने परिवार के साथ आते हैं और तंबू गाड़ कर जनवरी से रहना शुरू कर देते हैं।

जैसे ही नदी में पानी का प्रवाह बढता है सभी अपना सामान समेटकर वापस लौट जाते हैं। उन्होंने बताया कि सहरसा के  नवहट्टा प्रखंड क्षेत्र में 30 हजार प्रति बीघा की रेट से जमीन लीज पर लेते हैं। जमीन पूरी तरह से बलुआही होता है, जो तरबूज की खेती के लिए बेहद उपयुक्त है। 90 दिनों में यह तरबूज तैयार हो जाता है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।

खेतों में लहलहाते तरबूज के बड़े-बड़े फल देखकर लोगों का मन ललचा जाता है। तरबूज का फलन शुरू होते ही दिल्ली, यूपी और कोलकाता के व्यापारी आने लगते हैं और खेत से ही सारा तरबूज खरीद लेते हैं। वहीं, मो. रिजवान ने बताया कि वे 200 एकड़ में तरबूज की खेती कर रहे हैं। 1 एकड़ में लगभग 50 हजार रुपये की लागत आती है।

तरबूज की खेती में फायदा अधिक होता है, इसलिए हर साल यहां आकर खेती करते हैं। एक सीजन में दो से ढाई लाख रुपये की कमाई हो जाती है। यूपी से सहरसा आकर अपने पूरे परिवार के साथ खेत में मेहनत करते हैं। दिल्ली से तरबूज का बीज खरीदकर लाते हैं और कोसी की बलुआही जमीन पर बोते हैं।

वहीं, मो. अजान ने बताया कि कुल 8 बीघा जमीन लीज पर लेकर तरबूज की खेती कर रहे हैं। खेती में काफी मेहनत लगती है और दिन-रात काम करने के बाद 90 दिनों में तरबूज तैयार हो जाता है। इसके बाद मार्केट में सप्लाई कर देते हैं। इन सभी की देखा देखी इन इलाकों के भी कुछ किसान तरबूज की खेती करने लगे हैं। इस तरह बंजर हो चुका भूमि सोना उगलने लगा है।

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