पटनाः बिहार में औद्योगिक विकास को गति देने के लिए राज्य सरकार लगातार नीतिगत सुधार और निवेश प्रोत्साहन योजनाएं ला रही है। स्टार्टअप पॉलिसी, औद्योगिक प्रोत्साहन नीति और निवेशकों को दी जा रही सब्सिडी के जरिए बिहार को उद्योगों के लिए अनुकूल राज्य बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन इसी बीच केंद्र सरकार की नई इथेनॉल पॉलिसी ने बिहार के औद्योगिक परिदृश्य में चिंता की लकीरें खींच दी हैं। दरअसल, नई नीति के तहत अब तेल मार्केटिंग कंपनियां बिहार से 50 प्रतिशत ही उत्पाद खरीद सकती हैं। इससे बिहार के इथेनॉल प्लांट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
इथेनॉल की खरीद को 50 प्रतिशत तक सीमित किए जाने का सीधा असर राज्य के इथेनॉल उद्योग पर दिख रहा है। बताया जाता है कि बिहार के जिन इथेनॉल प्लांट्स से अब तक 100 प्रतिशत उत्पादन की खरीद की जा रही थी, उन्हें नवंबर 2025 से केवल आधे उत्पादन की ही आपूर्ति का आदेश मिल रहा है। इससे इन फैक्ट्रियों का संचालन आर्थिक रूप से बेहद कठिन होता जा रहा है।
मौजूदा समय में बिहार में सालाना 84 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन होता है, लेकिन इस साल के लिए केवल 44 करोड़ लीटर खरीद का ही ऑर्डर मिला है। मोदी सरकार की नई इथेनॉल नीति से प्रदेश के मक्का किसानों को भी तगड़ा झटका लगा है। दरअसल, जब से मक्का से इथेनॉल बनाने का काम शुरू हुआ था, तब से मक्का की कीमत 12000 रुपये टन से बढ़कर 26000 रुपये टन तक चली गई थी।
अब मक्का का भाव घटकर 19000 रुपये टन चला गया है। ऐसे में बिहार के 17 एथनॉल प्लांट बंद होने के कगार पर खडे हो गए हैं। यहां यह भी कहा जा सकता है कि बिहार में एथेनॉल उद्योग को लेकर प्लांट ऑनर्स का विश्वास डगमगा रहा है। जबकि इथेनॉल उत्पादन के क्षेत्र में बिहार बड़ी तेजी से उभर रहा था।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने फरवरी 2021 में कहा था कि बिहार में इथेनॉल उत्पादन के क्षेत्र में काफी निवेशक आएंगे। इससे प्रदेश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। तत्कालीन उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन ने दावा किया था कि बिहार जल्ह ही इथेनॉल हब बनकर उभरेगा। लेकिन प्रदेश के इथेनॉल उद्योग को अब मोदी सरकार की ओर एथेनॉल आपूर्ति नीति में बदलाव किए जाने से बड़ा झटका लगा है।
जानकारों के अनुसार एक किसान-प्रधान राज्य होने के नाते एथेनॉल नीति बिहार के किसानों के लिए एक बेहतरीन शुरुआत थी, लेकिन मात्र 2 वर्षों में ही हालात चिंताजनक हो गए हैं। आज न तो मक्का की खरीद हो रही है और न ही धान की मांग बची है। नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 तक बिहार के एथनॉल प्लांट्स ने 49,500 टन मक्का खरीदा।
लेकिन नवंबर 2025 से अक्टूबर 2026 में यह घटकर केवल 14,640 टन रह जाएगा। इसका मुख्य कारण बिहार के एथनॉल प्लांट्स का सप्लाई ऑर्डर 50 फीसदी कर दिया गया। वहीं, बचे हुए 50 फीसदी में से 40 फीसदी एथेनॉल एफसीआई के दूसरे राज्यों से आयातित चावल से बनाने का आदेश दिया गया। इसका सीधा नुकसान बिहार के किसानों और उद्योग दोनों को हो रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार बिहार की 17 में से 11 कंपनियों का उत्पादन 2024-25 में जहां 47.64 करोड़ लीटर प्रति वर्ष था, वह 2025-26 में घटकर 23.82 करोड़ लीटर सालाना रह गया है। ये कंपनियां बदली परिस्थितियों में सबसे अधिक नुकसान झेल रही हैं और इस मसले को लेकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को लगातार पत्र भेज रही हैं।
कंपनियों के शीर्ष अधिकारी बिहार के मुख्य सचिव से मिलकर समस्या का समाधान करने की मांग कर रहे हैं। इनकी एक ही मांग है कि 2022 के समझौते के हिसाब से उनका इथेनॉल खरीदा जाए। भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगता दिख रहा है। कारणों की बात करें तो प्लांट मालिक केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति में बदलाव को दोषी ठहरा रहे हैं।
पिछले साल सितंबर में इथेनॉल पॉलिसी में एक छोटे से बदलाव ने प्लांट मालिकों और किसानों के भविष्य को अधर में धकेल दिया है। सबसे ज्यादा असर प्रदेश के मक्का किसानों पर देखा जा रहा है, जो इथेनॉल प्लांट में अपनी उपज बेचकर अच्छी-खासी कमाई करते हैं। पॉलिसी में बदलाव से किसानों का मक्का बिना किसी दाम और काम के रह गया है।
एमएसपी की बात कौन कहे, किसानों के सामने मक्के की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। भारत प्लस एथनॉल्स प्राइवेट लिमिटेड के सीएमडी अजय सिंह ने कहा कि 'हम लोगों को नहीं मालूम था कि इथेनॉल के कोटे में कटौती की जा रही है। हम लोग डेडीकेटेड इथेनॉल प्लांट हैं। भारत सरकार ने अचानक एक निर्णय लिया, इसके पीछे का मुख्य वजह यह है कि चीनी मिल की कंपनी को फायदा पहुंचाना है।
सरकार के द्वारा किए गए एग्रीमेंट को खत्म कर दिया गया। हम लोगों का कोटा काटकर 400 करोड़ लीटर इथेनॉल शुगर कंपनियों को दिया गया। अजय सिंह का कहना है कि 50 फीसदी कटौती करने के कारण अब मार्केट में बने रहना मुश्किल हो गया है। इथेनॉल कंपनी खोलने में 200 करोड़ से ज्यादा का इन्वेस्टमेंट हुआ है। अब यदि सिर्फ 13 से 14 दिन फैक्ट्री चलेगी तो फिर कैसे सरवाइव किया जाएगा।
2 महीने से उत्पादन आधा हो गया है जबकि कंपनी का खर्चा उतना ही आ रहा है। उन्होंने कहा कि अपनी समस्या को लेकर हम लोगों ने केंद्र सरकार को पत्र भी लिखा है। आग्रह किया है कि बिहार में उद्योगों की कमी है इसलिए बिहार को अलग नजरिए से देखा जाए, ताकि यहां कंपनी सरवाइव कर सके। बिहार की 60 फीसदी एथेनॉल कंपनियां बंद होने के कगार पर पहुंच गई है या बंद हो चुकी हैं।
उल्लेखनीय है कि बिहार सरकार ने भी 2021 में इथेनॉल उत्पादन प्रोत्साहन नीति लाया था। निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए पहले आओ पहले पाओ योजना की शुरुआत भी की थी। निवेश करने वालों को स्टांप ड्यूटी एवं निबंधन शुल्क में 100 फीसदी की छूट, भूमि संपरिवर्तन शुल्क में 100 फीसदी की छूट, 5 वर्ष के लिए टर्म लोन पर 10 फीसदी ब्याज अनुदान सहित अनेक लाभ देने का विकल्प दिया गया।
लेकिन अब नई नीति के तहत केंद्र सरकार ने इथेनॉल कंपनियों से खरीद को सीमित करते हुए 50 प्रतिशत तक कर दिया है। इसका सीधा असर बिहार के इथेनॉल की कंपनियों पर दिखने लगा है। इथेनॉल कंपनियों के साथ ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने 88 करोड़ लीटर इथेनॉल प्रतिवर्ष खरीदने का अनुबंध किया था।
लेकिन पिछले वर्ष नवंबर में उन्हें ओएमसी की तरफ से एक निर्देश आया जिसमें बिहार से मात्र 44 करोड़ लीटर इथेनॉल ही खरीदने की बात कही गई। उधर, केंद्र सरकार के इस फैसले का राजद ने कड़ा विरोध किया है। राजद विधायक गौतम कृष्ण ने कहा कि बिहार में इथेनॉल के क्षेत्र में बहुत सारी संभावनाएं हैं।
अगर ऐसी बात सामने आ रही है तो सरकार को इस पर विचार करना चाहिए सरकार को इस मामले को देखना चाहिए। अगर इस तरह की नीति से इथेनॉल फैक्ट्री पर खतरा है तो यह चिंताजनक बात है। वहीं इस मामले पर बिहार के उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल ने कहा कि एथेनॉल उद्योग पर संकट है और इसके लिए वह जल्द केंद्र सरकार से मुलाकात करके इस विषय को उठाएंगे।
ताकि बिहार में एथेनॉल फैक्ट्री पर संकट टल सके। वहीं, बिहार में इथेनॉल के निवेशकों के साथ हो रही समस्या पर बिहार के उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल का कहना है कि नई पॉलिसी आने के कारण आधा प्रोडक्शन का ही परचेज किया जा रहा है। इथेनॉल कंपनी के ऊपर न केवल खतरा मंडरा रहा है बल्कि बंद होने की कगार पर आ गई हैं।
कंपनी अब 6 महीना ही फैक्ट्री चलाने की स्थिति में आ गई है. सभी कंपनियों में अच्छी तादाद में वर्कर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पूरे देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिक्स किया जाता है। बिहार सरकार केंद्र सरकार से मांग कर रही है कि पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा 20 से बढ़ाकर 22 से 25 प्रतिशत किया जाए।
इससे इथेनॉल कंपनियों के ऊपर संकट भी कम होगा और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा। बिहार सरकार की मांग पर केंद्र सरकार विचार कर रही है। इसी माह फिर हमलोगों की इस मामले में बैठक होने जा रही है। उम्मीद है कि इससे संकट के बादल छट जाएंगे।