बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सिंदूर की खेती में किया क्रांतिकारी शोध, हाई जर्मिनेशन मैटेरियल सीड से तैयार किए गए पौधे
By एस पी सिन्हा | Updated: January 20, 2026 16:23 IST2026-01-20T16:22:33+5:302026-01-20T16:23:29+5:30
हाई जर्मिनेशन मैटेरियल सीड से अब एक हजार से अधिक स्वस्थ पौधे तैयार हो चुके हैं। सिंदूर की खेती अब प्रयोग नहीं, बल्कि मुनाफे का सौदा बनने जा रही है।

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पटनाःबिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर के वैज्ञानिकों ने सिंदूर की खेती में ऐसा क्रांतिकारी शोध किया है, जिसे खेती की दुनिया में गेम चेंजर माना जा रहा है। हाई जर्मिनेशन बीज विकसित कर वैज्ञानिकों ने उस सबसे बड़ी परेशानी को दूर कर दिया है, जो अब तक किसानों के लिए सिरदर्द बनी हुई थी कम अंकुरण और पौधों का समय से पहले सूख जाना। यह शोध किसानों के हक में खेती की सियासत को मजबूत करने वाली बड़ी सफलता है। उल्लेखनीय है कि अब तक सिंदूर की खेती बिहार के गिने-चुने इलाकों तक सीमित थी और जोखिम से भरी मानी जाती थी।
पौधे फलन से पहले गिर जाते थे, सूख जाते थे और किसान घाटे में चले जाते थे। लेकिन बीएयू सबौर के वैज्ञानिकों की नई तकनीक ने तस्वीर पलट दी है। हाई जर्मिनेशन मैटेरियल सीड से अब एक हजार से अधिक स्वस्थ पौधे तैयार हो चुके हैं। इससे साफ है कि सिंदूर की खेती अब प्रयोग नहीं, बल्कि मुनाफे का सौदा बनने जा रही है।
विश्वविद्यालय ने इसे सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा है। बीएयू सबौर राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में सिंदूर की खेती फैलाने की रणनीति पर काम कर रहा है। कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के जरिए किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे। वैज्ञानिक खुद खेत तक पहुंचकर मार्गदर्शन देंगे और पौधों के विकास के बाद भी तकनीकी सहयोग जारी रहेगा।
यानी किसान अकेला नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उसे सिस्टम का पूरा सहारा मिलेगा। बीएयू के कुलपति प्रो. दुनिया राम सिंह ने साफ कहा है कि विश्वविद्यालय सिंदूर और फूड कलर उत्पादन को लेकर पूरी गंभीरता से काम कर रहा है। मकसद है राज्य को आयात पर निर्भरता से मुक्त करना और स्थानीय किसानों को नए लाभकारी विकल्प देना।
वैज्ञानिकों ने सिंदूर की खेती के हर पहलू बीज, पौधा, उत्पादन और बाजार पर शोध शुरू कर दिया है। राजनीति और अर्थव्यवस्था में देखें तो यह शोध सिर्फ खेती नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की सियासत है। सिंदूर की खेती किसानों की आय बढ़ाने का नया जरिया बनेगी और बिहार के खेतों में खुशहाली का रंग भरेगी। बीएयू सबौर की यह पहल आने वाले समय में कृषि आधारित कारोबार का मजबूत मॉडल साबित हो सकती है।