हत्यारों के समर्थक ने क्यों दी श्रद्धांंजलि?

By विकास मिश्रा | Updated: February 24, 2026 05:44 IST2026-02-24T05:44:15+5:302026-02-24T05:44:15+5:30

धर्म के नाम पर पाकिस्तान का हिस्सा तो बना दिया गया है लेकिन उनकी भाषा बांग्ला के साथ न केवल सौतेला व्यवहार किया जा रहा है बल्कि बांग्ला भाषा को समाप्त करने की साजिश भी रची जा रही है.

Why supporters killers pay tribute Jamaat-e-Islami supported Pakistani army language movement in Bangladesh blog Vikas Mishra | हत्यारों के समर्थक ने क्यों दी श्रद्धांंजलि?

file photo

Highlightsबांग्लादेश में भाषा आंदोलन के वक्त जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था.सबसे पहले यह जानिए कि ये शहीद हैं कौन जिनकी कब्र पर फूल चढ़ाए गए.बंगाली भाषियों ने यह मांग की कि बंग्ला को भी राजभाषा की श्रेणी में रखा जाए.

बांग्लादेश में बहुत कुछ तेजी से घटित हो रहा है. समीकरण बन रहे हैं, बिगड़ रहे हैं. कट्टरपंथी नई चाल चल रहे हैं. क्या तारिक सबको निपटा पाएंगे? बांग्लादेश में पिछले सप्ताह एक ऐसी घटना हुई जिसकी किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी! इसे कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया जा सकता है कि हत्यारों के समर्थक ने मरने वालों की कब्र पर फूल चढ़ाए! लेकिन असली सवाल है कि आखिर ऐसी नौबत आ कैसे गई? सवाल यह भी है कि क्या यह हत्यारों के समर्थकों की कोई चाल है? सबसे पहले यह जानिए कि ये शहीद हैं कौन जिनकी कब्र पर फूल चढ़ाए गए.

1952 में पाकिस्तान के मौजूदा बांग्लादेश वाले हिस्से को यह महसूस हुआ कि उन्हें धर्म के नाम पर पाकिस्तान का हिस्सा तो बना दिया गया है लेकिन उनकी भाषा बांग्ला के साथ न केवल सौतेला व्यवहार किया जा रहा है बल्कि बांग्ला भाषा को समाप्त करने की साजिश भी रची जा रही है. इसके बाद शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में बंगाली भाषियों ने यह मांग की कि बंग्ला को भी राजभाषा की श्रेणी में रखा जाए.

पाकिस्तानी हुक्मरानों को यह मंजूर नहीं था लेकिन बंगाली भाषी विद्यार्थी अपनी मांग पर अडिग रहे. ईस्ट पाकिस्तान मुस्लिम छात्र लीग और अन्य छात्र संगठन इस आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभा रहे थे. पूरे देश में आंदोलन जारी था, जुलूस निकल रहे थे और पाकिस्तानी सेना को ऐसा लगा कि मामला कहीं हाथ से न निकल जाए तो उसने ढाका विश्वविद्यालय में छात्रों के एक समूह पर गोलियां बरसा दीं.

उस गोलीकांड में रफीउद्दीन अहमद, अब्दुल बरकत, अब्दुल जब्बार और अब्दुल सलाम नाम के विद्यार्थी शहीद हो गए. माना जा सकता है कि यही भाषा आंदोलन बाद में स्वतंत्र बांग्लादेश के निर्माण का बीज साबित हुआ. इन्हीं शहीदों को हर साल 21 फरवरी को ढाका विश्वविद्यालय में श्रद्धांजलि दी जाती है और उनकी कब्र पर फूल चढ़ाए जाते हैं.

इस साल भी श्रद्धांजलि देने के लिए बहुत से लोग पहुंचे. उसमें बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन और नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान तथा उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी भी थे. इसमें कोई नई बात नहीं है! प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति हर साल वहां जाता जरूर है.

इस बार नई बात यह थी कि बांग्लादेश में विपक्ष के नेता और जमात-ए-इस्लामी प्रमुख शफीकुर रहमान ने भी सेंट्रल शहीद मीनार पर जाकर भाषा आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी. इसके पहले जमात-ए-इस्लामी के किसी भी नेता ने कभी भी श्रद्धांजलि नहीं दी. जमात-ए-इस्लामी ने उस भाषा आंदोलन का विरोध किया था और पूरी तरह से पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था.

उसका कहना था कि उर्दू एकमात्र राजभाषा रहनी चाहिए. यदि बांग्ला भाषा को तरजीह दी गई तो उर्दू के माध्यम से स्थापित पाकिस्तान की इस्लामी पहचान को धक्का पहुंच सकता है. इतना ही नहीं, ये वही जमात-ए-इस्लामी है जिसने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का साथ दिया. वह नहीं चाहता था कि बांग्लादेश बने.

जमात-ए-इस्लामी के बारे में दुनिया जानती है कि वह पाकिस्तान का पिट्ठू है और पाकिस्तान के हितों को बांग्लादेश में साधने की कोशिश में लगा रहता है. जमात ने हमेशा ही कट्टरपंथ का समर्थन किया है और उसके नेता आतंकवाद को पालते-पोसते रहे हैं. यही कारण है कि शेख हसीना ने उस पर पाबंदी लगा रखी थी.

शेख हसीना को उखाड़ फेंकने में सबसे बड़ी भूमिका जमात ने ही निभाई थी. मो. यूनुस को उससे बड़ी  हमदर्दी भी थी. जमात को भरोसा था कि शेख हसीना से नाराज लोग उसे सत्ता में लेकर आएंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जमात और उसके सहयोगी दलों को केवल 77 सीटें मिलीं जबकि तारिक रहमान के बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को 209 सीटें मिलीं.

यानी बांग्लादेश के मतदाताओं ने स्पष्ट संदेश दे दिया कि कट्टरपंथ उन्हें मंजूर नहीं है. यह संदेश जमात के लिए झटका जरूर है लेकिन ध्यान रखिए कि उसे और उसके सहयोगी दलों को 77 सीटें मिली हैं यानी उसका वजूद है. जमात को पता है कि ये 77 सीटें उसे कट्टरपंथियों की वजह से मिली हैं. यदि उसे भविष्य में सत्ता हासिल करनी है तो इसके लिए बंगाली भाषियों के दिलों को जीतना होगा.

अब सवाल है कि दिल कैसे जीतें? माना जा रहा है कि जमात ने खुद को बांग्ला भाषा के करीब दिखाने के लिए भाषा आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देने की योजना बनाई. मगर इस पर नजर रखने वाले लोग सतर्क हैं और बांग्लादेश में जमात की इस नई चाल पर व्यापक चर्चा हो रही है. प्रधानमंत्री तारिक अनवर को भी इस बात का इल्म है कि जमात उन्हें चैन से काम नहीं करने देगी.

फसाद जमात के खून में है और उसके आका यानी पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई कुछ न कुछ उपद्रव करवाते रहेंगे. रहमान भले ही शेख हसीना के कट्टर राजनीतिक विरोधी हों लेकिन उन्होंने भी जमात को संदेश दे दिया है कि वे दबाव में नहीं आने वाले हैं.

मो. यूनुस ने चुनाव के साथ संविधान बदलने के लिए भी मतदान करवा लिया था लेकिन इस तथाकथित परिषद के सदस्य के रूप में शपथ लेने से बीएनपी ने इनकार कर दिया.  जमात ने शपथ ली है क्योंकि उसे भरोसा है कि किसी दिन कट्टरपंथी ताकतें हावी हो गईं तो संविधान को कट्टरपंथ के हिसाब से मोड़ा जा सकता है.

मगर तारिक ऐसा नहीं चाहते. वे प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति हैं और देश को लोकतांत्रिक रास्ते पर ही रखना चाहते हैं. हाल के दिनों में एक और ऐसी बात हो रही है जिसकी कल्पना नहीं की जा रही थी. दरअसल शेख हसीना की अवामी लीग के कई दफ्तरों में पिछले सप्ताह हलचल देखी गई?

सवाल पूछा जा रहा है कि क्या तारिक चाहते हैं कि अवामी लीग का वजूद बना रहे ताकि जमात जैसी ताकतों को कमजोर बनाए रखा जाए? क्या तारिक के साथ हसीना की पार्टी संपर्क में है? ऐसे कई और भी सवाल हैं लेकिन जवाब स्पष्ट नहीं है. राजनीति में कुछ भी हो सकता है. फिलहाल नजर रखिए कि आगे होता क्या है!

Web Title: Why supporters killers pay tribute Jamaat-e-Islami supported Pakistani army language movement in Bangladesh blog Vikas Mishra

विश्व से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे