युद्ध लगाते हैं मानव सभ्यता पर सवालिया निशान
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 3, 2026 14:27 IST2026-03-03T14:25:09+5:302026-03-03T14:27:10+5:30
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प भी कह चुके हैं कि लड़ाई अभी कुछ और सप्ताह तक चल सकती है तथा कुछ और अमेरिकी सैनिकों की इसमें जान जा सकती है

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दुनिया इन दिनों भीषण युद्धों से जूझ रही है. रूस-यूक्रेन युद्ध और इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष तो जारी ही हैं, इजराइल-अमेरिका द्वारा इरान पर किए जा रहे हमलों और ईरान द्वारा पलटवार करते हुए लगभग दर्जन भर देशों में अमेरिकी ठिकानों पर किए जा रहे हमलों ने तीसरे विश्व युद्ध की आशंका को हवा दे दी है. हालांकि जब तक चीन और रूस सक्रिय रूप से ईरान के समर्थन में आगे नहीं आते, तब तक शायद दुनिया दो ध्रुवों में न बंटे, फिर भी ईरान अकेले दम पर ही जिस तरह से इजराइल समेत मिडिल ईस्ट के कई देशों को निशाना बना रहा है, उससे इस युद्ध के जल्दी खत्म होने के बजाय और भड़कने की आशंका ही ज्यादा नजर आती है. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प भी कह चुके हैं कि लड़ाई अभी कुछ और सप्ताह तक चल सकती है तथा कुछ और अमेरिकी सैनिकों की इसमें जान जा सकती है.
ईरान झुकने को तैयार नहीं है और अमेरिकी राष्ट्रपरि ट्रम्प उसे झुकाए बिना मानने को तैयार नहीं हैं. हालांकि ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई मारे जा चुके हैं, फिर भी अमेरिका का कहना है कि उसका लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ है. यह बात अलग है कि ट्रम्प ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वास्तव में अमेरिका का लक्ष्य क्या है.
उधर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी सीमा पर संघर्ष तेज हो गया है और दोनों पक्षों के सैकड़ों लोग मारे गए हैं. इन युद्धों में जो देश प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं, उन्हें तो नुकसान हो ही रहा है, तटस्थ देशों को भी इसका आर्थिक खामियाजा भुगतना पड़ रहा है क्योंकि ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद करने से कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ा है, जिससे तेल के दामों के आसमान छूने की आशंका है. दुनियाभर के शेयर बाजार भी धराशायी हो रहे हैं. सब जानते हैं कि युद्धों में जीतता कोई नहीं, दोनों ही पक्ष हारते हैं.
फर्क सिर्फ इतना है कि कोई कम हारता है कोई ज्यादा अर्थात किसी को कम नुकसान होता है और किसी को ज्यादा. यह दुर्भाग्य ही है कि मानव सभ्यता के चरम शिखर पर पहुंचने के बावजूद हम आज भी अपने मतभेदों का निपटारा अंततोगत्वा पाशविक बल से ही करते हैं. तो क्या कथित तौर पर हमारी सभ्यता मुखौटा मात्र ही है और अंदर से हम मनुष्य आज भी आदिम युग जैसे ही हैं?
त्रासदी यह है कि आदिम युग में हम आदिम औजारों से लड़ते थे तो उससे क्षति भी सीमित मात्रा में ही होती थी, जबकि आज अत्याधुनिक हथियारों ने मानव जाति के अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा कर दिया है. दुनिया आज जिस तरह विनाशकारी युद्धों से जूझ रही है उसने हर विवेकवान मनुष्य को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्या हमारी सभ्यता का यही हश्र होना चाहिए?