जो खुद को नायक कहता है, खलनायक से भी अधिक भयावह लगता है!
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: April 8, 2026 05:25 IST2026-04-08T05:25:26+5:302026-04-08T05:25:26+5:30
ईरान तो अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराते देख मरने-मारने पर उतारू है ही, युद्ध लंबा खिंचने से बौखलाए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी आखिरकार शांति दूत का अपना मुखौटा उतार फेंका है.

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हेमधर शर्मा
हममें से शायद बहुत से लोगों ने वह कहानी सुनी होगी कि एक चिड़िया बहुत मेहनत से अपना घोंसला बनाती लेकिन एक उत्पाती बंदर उसे उजाड़ देता था. बार-बार उजाड़ने के बाद भी चिड़िया ने जब घोंसला बनाना नहीं छोड़ा तो आखिरकार बंदर को अपने कृत्य पर शर्म आई, उसने चिड़िया की मदद करने की सोची. लेकिन बहुतेरी कोशिशों के बावजूद जब वह दो-चार तिनके भी सही ढंग से नहीं जोड़ पाया, तब उसे अहसास हुआ कि तोड़ना कितना सरल है और जोड़ना कितना कठिन! इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच पिछले सवा महीने से जारी युद्ध में विनाशलीला जारी है.
ईरान तो अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराते देख मरने-मारने पर उतारू है ही, युद्ध लंबा खिंचने से बौखलाए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी आखिरकार शांति दूत का अपना मुखौटा उतार फेंका है. ईरान की परमाणु क्षमता खत्म करने को युद्ध का मकसद बताने वाले ट्रम्प ने अब ईरान के पुलों को उड़ाना और बिजली केंद्रों को तबाह करना शुरू कर दिया है.
उन्होंने नौ करोड़ की जनसंख्या वाले ईरान की पूरी सभ्यता को ही मटियामेट कर देने और पाषाण युग में धकेलने की धमकी दी है. ट्रम्प को शायद यह सपने में भी अनुमान नहीं था कि जिस युद्ध को एक हफ्ते के भीतर जीत लेने की वे उम्मीद पाले बैठे थे, वह एक महीने से भी ज्यादा लंबा खिंच जाएगा और इसके बावजूद अमेरिका के ही हारने की आशंका प्रबल दिखाई देगी.
चार साल पहले रूस ने भी यूक्रेन पर आक्रमण करते समय कहां सोचा था कि युद्ध का कोई अंत ही नजर नहीं आएगा! सब जानते हैं कि यूक्रेन सिर्फ एक मुखौटा है, रूस के खिलाफ युद्ध तो पर्दे के पीछे से अमेरिका और यूरोपीय देश ही लड़ रहे हैं. लेकिन ट्रम्प को शायद पता नहीं था कि दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला खुद ही उसमें गिरता है!
अब यह जानते हुए भी कि ईरान के ऊपर रूस और चीन का वरदहस्त है (वरना वह इतने दिनों तक लड़ाई में कभी नहीं टिक पाता), वे कुछ नहीं कर सकते. ईरान से आतंकवाद का भय दिखाते हुए उन्होंने उसे दुनिया के सामने खलनायक और खुद को नायक के रूप में पेश करने की कोशिश की,
लेकिन युद्ध की शुरुआत में ही ईरान के एक स्कूल पर हमला करके सैकड़ों बच्चियों को मारने का भूत उनका पीछा नहीं छोड़ रहा और अब तो हताशा के चरम पर पहुंचने के बाद उन्होंने गाली-गलौज के स्तर पर उतर कर (ट्रम्प के ईरान को गरियाने के पहले क्या कोई सोच सकता था कि कोई अमेरिकी राष्ट्रपति किसी को सार्वजनिक रूप से गाली भी दे सकता है!),
ईरान की नागरिक सुविधाओं को नेस्तनाबूद करना शुरू कर दिया है. राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका द्वारा एक भी नया युद्ध नहीं शुरू करने का दावा करने वाले और दूसरे कार्यकाल में दुनिया में आठ से भी ज्यादा युद्ध रुकवाने की डींग हांकने वाले ट्रम्प खुद को नोबल शांति पुरस्कार नहीं मिलने का दुनिया से इतना क्रूर बदला लेंगे,
क्या यह किसी ने सपने में भी सोचा होगा! वैसे पश्चिमी देशों को ईरान का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने ट्रम्प का ध्यान अपनी ओर खींचकर उन्हें बचा लिया है, वरना ट्रम्प ने तो ग्रीनलैंड और उसके बाद कनाडा पर कब्जा करने की लगभग तैयारी ही कर ली थी! क्यूबा को भी ईरान का आभार मानना चाहिए क्योंकि युद्ध की शुरुआत में ही ईरान को गाजर-मूली समझते हुए ट्रम्प ने क्यूबा को खुलेआम धमकी दी थी कि अगला नंबर उसी का है. पुराने जमाने में कुआं, बावड़ी, तालाब आदि खुदवाना या सार्वजनिक हित का कोई अन्य काम करना बहुत पुण्य का कार्य माना जाता था.
गांवों से संबंध रखने वाले बड़े-बुजुर्गों ने देखा होगा कि पहले किसी से किसी की कितनी भी दुश्मनी हो जाए लेकिन अपने जलस्रोतों से किसी को पानी भरने से रोकने या अपने खेत-मेंड़ से होकर गुजरने देने के लिए किसी को मना करने का दुस्साहस कोई नहीं करता था, क्योंकि इस स्तर तक नीचे गिरना अत्यंत अधम कार्य माना जाता था.
लेकिन उन्हीं गांव-देहातों में पिछले कुछ दशकों में ही इतना ज्यादा बदलाव आ गया है कि किसी से झगड़ा होने पर लोग अब उसे अपने हैंडपम्प से पानी भरने देने या अपने खेतों से होकर गुजरने देने पर रोक लगाने का काम सबसे पहले करते हैं. सड़क किनारे के जिन खेतों को पहले कोई जल्दी खरीदता नहीं था (क्योंकि रास्ते से आते-जाते मवेशी फसल पर मुंह मारते थे),
पिछले तीस-चालीस वर्षों में ही समय इतनी तेजी से बदला कि रोड से लगी जमीन खरीदना ही अब लोगों की पहली पसंद बन गई है ताकि कोई रास्ता न रोक सके! इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प को हम उनकी मूर्खताओं के लिए कितना भी कोसें, दरअसल वे हमारी संकुचित होती मनोवृत्तियों के ही प्रतिबिंब हैं. फर्क शायद बस इतना है कि अपनी जिन कुत्सित इच्छाओं-लालसाओं को खुलेआम क्रियान्वित करने में हम शर्माते थे, ट्रम्प उस लाज-शर्म को घोंटकर पी गए हैं!
ऐसे में क्या सचमुच ही अपने दुस्साहसों के लिए अकेले ट्रम्प दोषी हैं?