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विजय दर्डा का ब्लॉग: इमरान खान एक उम्मीद का फिसल जाना..!

By विजय दर्डा | Updated: February 8, 2021 08:52 IST

इमरान खान के करीब सवा दो साल के शासनकाल के बाद आज मैं सोच रहा हूं कि वे समय की रेत पर अपनी किस तरह की छाप छोड़ जाएंगे? इमरान से गलती कहां हुई या हो रही है?

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इमरान खान ने जब क्रिकेट का मैदान छोड़ा और राजनीति की पिच पर गेंदबाजी करने उतरे तो न केवल मुझे बल्कि दुनिया को ऐसा लगा था कि पाकिस्तान को अब कोई ऐसा राजनेता मिला है जो मुल्क को दलदल से बाहर निकालने की क्षमता रखता है!

जिस प्रकार से भारत में जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया था उसी प्रकार इमरान खान ने ‘भ्रष्टाचार-मुक्त पाकिस्तान’ का नारा दिया. उनके शब्द मुल्क को आशान्वित कर रहे थे. पाकिस्तान की युवा पीढ़ी उनकी दीवानी हो गई थी. उनकी सभाओं में लाखों लोग एकत्रित होते थे.

उनके इसी राजनीतिक सफर के बीच उनसे लंदन में पाकिस्तान को लेकर मेरी चर्चा हुई. मैंने महसूस किया कि उनके भीतर परिस्थितियों को बदलने की ललक थी. तब उनकी बातों और उनकी आंखों में मैंने पाकिस्तान की तरक्की का जज्बा और भारत के साथ दोस्ती का पैगाम देखा था. वे खेल भावना के साथ आगे बढ़ रहे थे. 22 साल के संघर्ष के बाद इमरान का सपना सच हुआ और वे पाकिस्तान के वजीरेआजम बन गए.

इमरान खान के करीब सवा दो साल के शासनकाल के बाद आज मैं सोच रहा हूं कि वे समय की रेत पर अपनी किस तरह की छाप छोड़ जाएंगे? इमरान से गलती कहां हुई या हो रही है? पिछले हफ्ते पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट द्वारा डेनियल पर्ल के हत्यारे उमर शेख को बरी करने के फैसले से पता चलता है कि व्यवस्था कितनी जीर्ण हो चुकी है.

पाकिस्तान मैं कई बार गया हूं और वहां की जनता के संघर्ष व आकांक्षाओं से परिचित हूं. वे गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे हैं और भ्रष्टाचार व बेरोजगारी से परेशान हैं. आतंकवाद का बोलबाला है.

खुफिया एजेंसी और सेना पाकिस्तान में हमेशा शक्तिशाली रहे हैं - आज विडंबना यह है कि उन्हें लोकतंत्र की पाकिस्तानी शैली के एक अपरिहार्य अंग के रूप में देखा जाता है.

इमरान खान ने लीक से हटकर चलने का संकेत दिया था. प्रधानमंत्री बनने से काफी पहले उन्होंने लाहौर में अपनी मां के नाम पर बहुत बड़ा स्टेट ऑफ आर्ट कैंसर हास्पिटल बनाया जहां मुफ्त में इलाज होता है. स्कूल और कॉलेज बनाए. प्रधानमंत्री बनने के बाद भी बड़ी सादगी से अपना काम शुरू किया था. यहां तक कि अपनी सरकारी सुरक्षा भी उन्होंने काफी हद तक कम कर दी थी.

वह सरकारी चार्टर प्लेन नहीं बल्कि कमर्शियल फ्लाइट का उपयोग कर रहे थे. वे चाहते थे कि भारत से संबंध सुधरे. उन्होंने कहा था अगर भारत एक कदम आगे चले तो वह दो कदम आगे बढ़ेंगे! लेकिन न वे एक कदम आगे बढ़ पाए और न दो कदम भारत ने बढ़ाए.

इसका कारण रहा 1999 का विश्वासघात, जब अटल जी दोस्ती का पैगाम लेकर नवाज शरीफ के पास गए थे और पाकिस्तान की सेना ने कारगिल का जख्म दे दिया था.

नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को बुलाया था और एक दिन पाकिस्तान में उनके घर भी जा पहुंचे थे लेकिन इसका कोई सिला भारत को नहीं मिला. तो इमरान की पहल पर भारत को स्वाभाविक रूप से लगा कि कहीं इतिहास दोहराया न जाए क्योंकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पर सबसे बड़ा आरोप रहा है ‘सेना की कठपुतली’ होना.

पाकिस्तान के कुछ पुराने और आजाद खयाल लोगों का कहना है कि भारत को एहतियात बरतते हुए इमरान खान को एक मौका देना चाहिए था और पाकिस्तान को दलदल से बाहर निकालने में मदद करनी चाहिए थी. उनका तर्क है कि ऐसा न करके, भारत आईएसआई के ‘जाल’ में फंस गया - इमरान खान भारत से दूर चले गए और आईएसआई व पाकिस्तान की सेना अपने नापाक मंसूबों में सफल रहे. 

आज दोनों ही मुल्क सरहद पर हर रोज करोड़ों रुपए फूंकने को मजबूर हैं. दोनों ओर से जान-माल का नुकसान हो रहा है. आप धर्मगुरुओं को छोड़ दीजिए कि वे क्या चाहते हैं. मैं अपने अनुभव के आधार पर बता सकता हूं कि वहां की अवाम भारत से दोस्ती चाहती है क्योंकि इससे हेल्थ, इंडस्ट्री और ट्रेड में पाकिस्तान को भरपूर फायदा होगा.

आज तो हालात ऐसे हैं कि बातचीत बंद हो चुकी है और पाकिस्तान द्वारा संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं में भारी वृद्धि हुई है. आतंकवाद खत्म नहीं हो रहा है और मुङो तो ऐसी कोई किरण भी नहीं दिख रही कि भारत और पाकिस्तान शांति के लिए भविष्य में कभी एक साथ बैठेंगे भी!

इमरान खान घरेलू और विदेशी - दोनों मोर्चे पर असफल रहे हैं. हालांकि उनके सत्ता में आने से पहले ही पाकिस्तान से अमेरिका मुंह मोड़ चुका था और उसको अमेरिकी खैरात मिलनी भी बंद हो गई थी.

इसकी पूर्ति के लिए पाकिस्तान ने अपने सदाबहार दोस्त सऊदी अरब की ओर रुख किया लेकिन सऊदी-अमेरिका गठबंधन के चलते वहां से भी निराशा ही हाथ लगी. तुर्की, मलेशिया और ईरान के साथ मिलकर इमरान ने नई ‘इस्लामिक गोलबंदी’ की शुरुआत की थी लेकिन वह सऊदी अरब और ईरान की प्रतिद्वंद्विता में फंस गई.

आर्थिक तौर पर पाकिस्तान चरमरा गया है. अभी भी वह एफएटीएफ की ‘ग्रे’ सूची में लटका हुआ है. चीन पर उसकी निर्भरता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है. चीन ने पाक को बेतहाशा कर्ज तो दिया है लेकिन ब्याज इतना ज्यादा है कि शायद ही पाकिस्तान कभी कर्ज चुका पाए.

इसीलिए इमरान पर ‘चीन के हाथों पाकिस्तान को बेच देने’ का आरोप भी लग रहा है. इमरान इतने मजबूर हो गए हैं कि वे चीन के वीगर मुसलमानों की दुर्दशा पर एक वाक्य नहीं बोल पा रहे हैं.

इमरान खान से जब मेरी मुलाकात हुई थी तब उन्होंने कहा था कि कोई भी देश धर्म के नाम पर प्रगति नहीं कर सकता. इससे लगता था कि वे अपने आप को धर्म के ठेकेदारों से दूर रखेंगे. दुर्भाग्य से वे आज आईएसआई और सेना के साथ मुल्लाओं की राजनीति में फंस गए हैं.

एक तरफ कोर्ट की ओर से अपराधियों को सजा देने का दिखावा किया जाता है तो दूसरी ओर उन्हें आतंक की फैक्टरी चलाने की खुली इजाजत रहती है. इमरान खान इसे कैसे रोक सकते हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि वे आज भी साफ-सुथरी छवि वाले नेता के रूप में देखे जाते हैं, लेकिन जनता के मन में उनके प्रति प्रेम घटने लगा है.

आम आदमी महंगाई से इस कदर परेशान है कि विपक्षी दल और आतंकियों की मदद करने वाले संगठन इमरान के खिलाफ माहौल खड़ा करने में सफल हो गए हैं. देश के करीब-करीब सभी इलाकों में जबर्दस्त प्रदर्शन हुए हैं. 22 करोड़ की आबादी वाले देश में रोजगार की हालत पहले से ही खराब थी, कोरोना काल में करीब 2 करोड़ लोगों का रोजगार और छिन गया है. महंगाई 12 साल के अपने उच्चतम स्तर पर है.

इमरान खान के पास हालांकि करीब पौने तीन साल का वक्त बचा है. नया पाकिस्तान के नारे पर वे अब भी कायम हैं लेकिन वर्तमान में यह दूर की कौड़ी लगती है. यह दुखद है. उनकी असफलता का मतलब है एक उम्मीद का फिसल जाना..!

इंडियन एक्सप्रेस से साभार

 

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