ऐसा शायद ही कभी होता है कि किसी जंग के दौरान कोई देश अपने आर्मी चीफ को पद से हटा दे! मगर यह अभी-अभी अमेरिका में हुआ है. अमेरिकी सेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज से इस्तीफा ले लिया गया है. हर ओर यही चर्चा चल रही है कि इसका कारण क्या है? क्या व्हाइट हाउस और अमेरिकी सेना के बीच रिश्तों में सामंजस्य नहीं है? विशेषज्ञों का कहना है कि जॉर्ज और उनके कई वरिष्ठ सहयोगी इस बात के खिलाफ थे कि ईरान पर जमीनी हमला किया जाए. संभव है कि इन्हीं कारणों से उन्हें पद से चलता किया गया हो!
तो क्या नए कार्यवाहक आर्मी चीफ के नेतृत्व में ईरान पर जमीनी हमला होने वाला है? यदि ऐसा हुआ तो हालात क्या होंगे? निश्चित रूप से अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे बेहतरीन सेना है. ईरान में उसने अपने पायलट को मौत के मुंह से बाहर निकाल कर बता दिया है कि वह जो चाहे कर सकती है.
मगर सवाल यह है कि अमेरिका जैसे महारथी को वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान और ईराक तक जिस स्थिति का सामना करना पड़ा क्या वैसी ही स्थिति ईरान में पैदा होगी? यदि हम भौगोलिक रूप से देखें तो ईरान काफी बड़ा देश है और सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के लिए उस पर जमीनी हमला करना आसान नहीं होगा.
जब अमेरिका ने ईराक पर हमला किया था तो उसे करीब डेढ़ लाख सैनिकों की जरूरत पड़ी थी. ईरान तो ईराक की तुलना में चार गुना ज्यादा बड़ा है. ईरान का सैन्य ढांचा काफी बड़ा और मजबूत है. यदि इस नजरिये से भी देखें तो अमेरिका को जमीनी हमले के लिए कम से कम छह लाख सैनिक तो उतारने ही होंगे. फिर भी तेहरान पर कब्जा करना शायद ही संभव हो पाए!
ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे सुरक्षा प्रदान करती है. उसके पश्चिम में इराक-तुर्की, उत्तर में अजरबैजान-आर्मेनिया-तुर्कमेनिस्तान, कैस्पियन सागर, पूर्व में अफगानिस्तान और पाकिस्तान तथा दक्षिण में फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी है. समुद्र के बड़े हिस्से पर उसका दबदबा है तो दूसरी ओर ऊंचे पहाड़ और तीसरी ओर रेतीले मैदान उसकी सुरक्षा करते हैं.
सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जिस तरह से ईरान ने अमेरिकी हवाई हमलों का जवाब दिया है, उससे एक बात तो तय है कि हमलों से निपटने की तैयारी वह काफी पहले से कर रहा था. यदि अमेरिकी सेना इराक की ओर से जमीनी हमला करती है तो पहाड़ी कंदराओं में छिपे ईरानी सैनिक आग बरसाने के लिए तैयार मिलेंगे.
ईरान ने कहा भी है कि वे आग बरसाने को तैयार हैं. संभव है कि समुद्र के रास्ते अमेरिकी सैनिक पहुंचें लेकिन वहां भी ईरान की कुछ न कुछ तैयारियों जरूर होंगी. इसके अलावा ईरानी सेना ने होर्मुज सहित दूसरे सभी इलाकों में यदि समुद्री माइन्स बिछा दिए हों तो भी अमेरिकी सैनिकों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा और बहुत क्षति की आशंका बनी रहेगी.
वैसे यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिकी सेना पूर्ण युद्ध में उतरने का खतरा मोल नहीं लेगी बल्कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों पर हवाई मार्ग से पहुंच कर कब्जा करेगी. एक तो खार्ग द्वीप पर कब्जा करना ताकि ईरान की आर्थिक कमर को पूरी तरह तोड़ दिया जाए. इसके साथ ही अमेरिका चाहता है कि ईरान के पास जो संवर्धित 450 किलो यूरेनियम है, उसे भी नष्ट किया जाए.
कहा जा रहा है कि यह यूरेनियम इजराइली हमले के दौरान मलबे के रूप में परिवर्तित हो गए परमाणु संस्थान के नीचे दबा है. इस यूरेनियम तक ईरानी सेना भी नहीं पहुंच पा रही है. अमेरिका कहता है कि यूरेनियम इस स्थिति में है कि कुछ ही दिनों में ईरान कम से कम 11 परमाणु बम बना सकता है. इसलिए इसे जब्त करके या तो नष्ट कर दिया जाए या फिर अमेरिका ले जाया जाए!
यह बात सुनने में जितनी आसान लगती है, क्या वास्तव में उतनी आसान होगा? ईरानी सेना क्या आसानी से ऐसा होने देगी? निश्चित रूप से यदि अमेरिका ऐसी कोशिश करता है तो भीषण संघर्ष की स्थिति पैदा होनी ही होनी है. इसलिए अमेरिका चाहता है कि पहले ईरानी सेना को पंगु बना दिया जाए. संभव है, इसके लिए बड़े पैमाने पर बमबारी की जाए.
अमेरिका कुछ न कुछ जरूर बड़ा करेगा क्योंकि उसे ये चिंता सता रही है कि यदि ईरान को वह परास्त नहीं कर पाता है और जंग को अपनी चाहत के अनुरूप परिणाम तक नहीं पहुंंचा पाता है तो मध्य पूर्व के मित्र देशों का उस पर भरोसा कम होगा. वैसे भी इन देशों पर ईरान के हमलों ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अमेरिका उन्हें सुरक्षित रख पाएगा?
अमेरिका इस बात को समझ रहा है कि ईरान अकेला नहीं है. रूस और चीन उसकी मदद कर रहे हैं. नॉर्थ कोरिया ने तो खुले रूप से हजारों की संख्या में ड्रोन्स ईरान को भेजे हैं. ऐसे में युद्ध की नई रणनीति अमेरिका के लिए आवश्यक है. शायद इसी उम्मीद में आर्मी चीफ के पद पर ट्रम्प के चहेते लावेन लाए गए हैं. मगर दुनिया को इस वक्त शांति की जरूरत है.
क्या लावेन ये सलाह ट्रम्प को दे पाएंगे? उम्मीद कम है लेकिन उम्मीद पर ही दुनिया कायम है. हम उम्मीद करें कि शांति जल्दी लौटे! यदि जंग खत्म नहीं होती है, शांति नहीं लौटती है तो फिर यह मानकर चलिए कि पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिति खराब होने वाली है. तबाह केवल ईरान ही नहीं होने वाला है, मध्य पूर्व के सारे देश लहूलुहान होंगे और रक्त के छींटे पूरी दुनिया के दामन पर लगेंगे.