अमेरिका-इजराइल और ईरानः युद्धविराम पर खतरा मंडराने से भरोसा टूटा?
By राजेश बादल | Updated: April 10, 2026 05:27 IST2026-04-10T05:27:15+5:302026-04-10T05:27:15+5:30
US-Israel and Iran: पाकिस्तान एक नकली राष्ट्र है. एक नकली देश असली युद्ध विराम कैसे करा सकता था. वह तो अमेरिका की कठपुतली है.

file photo
US-Israel and Iran:अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच देर रात हुए दो सप्ताह के युद्ध विराम पर आखिर विश्व बिरादरी को क्यों यकीन करना चाहिए था? यह ऐसा सवाल था, जो जंगबंदी के ऐलान के साथ ही यक्ष प्रश्न की तरह जानकारों के सामने उपस्थित था और जिसका उत्तर खुद जंग में शामिल देश भी नहीं जानते थे, क्योंकि अमेरिका-इजराइल और पाकिस्तान अपनी घोषणाओं से कब पलट जाएं, कोई नहीं कह सकता. पाकिस्तान एक नकली राष्ट्र है. एक नकली देश असली युद्ध विराम कैसे करा सकता था. वह तो अमेरिका की कठपुतली है.
अन्यथा वह बलोच विद्रोहियों से समझौता कर सकता था, अफगानिस्तान से समझौता कर सकता था और ईरान से तो उसके अनेक मसलों पर गंभीर मतभेद हैं. आज तक बातचीत की किसी मेज पर पाकिस्तान नहीं आया क्योंकि दरअसल पाकिस्तान में ऐसी कोई मेज है ही नहीं. वह तो घबराए ट्रम्प का हुक्म था. पाकिस्तान ने वही किया. यही उसका चरित्र है.
दुनिया के तमाम मुल्कों की तो बात इसलिए अलग है क्योंकि ट्रम्प उनकी सुनते नहीं हैं. डोनाल्ड ट्रम्प चंद रोज पहले जिस अभद्र भाषा और अश्लीलता पर उतर आए थे, उस स्तर पर तो किसी भी देश का प्रमुख नहीं जा सकता था. ट्रम्प की पुस्तक ‘द आर्ट ऑफ द डील’ को अमेरिकी लोग अब निश्चित रूप से रद्दी की टोकरी में फेंक देना चाहेंगे.
चार दशक पहले कारोबारी नजरिये से लिखी गई किताब का आज कोई सियासी अर्थ नहीं रहा है, क्योंकि युद्ध का उन्माद ट्रम्प के ऊपर इस कदर हावी था कि वे समूचे विश्व के मान्य सिद्धांत और मार्गदर्शक निर्देशों को भुला बैठे थे. अंतरराष्ट्रीय संधियों पर अमल नहीं करने की तो उन्होंने जैसे शपथ ले रखी है. राष्ट्रपति एक प्राचीन विरासत और सभ्यता वाले देश को पाषाण युग में पहुंचाने की बात करने लगे थे.
वे भूल गए कि सभ्यता कोई दो-चार साल में विकसित होने वाली प्रक्रिया नहीं है. सभ्यताओं का विकास लंबी, जटिल और बारीक रेशे वाली सामाजिक परिवर्तनों की हजारों साल चलने वाली श्रृंखला से होता है. उसे कोई खतरनाक परमाणु बम गिराकर नष्ट नहीं कर सकता. जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने से वहां की सभ्यता तो नष्ट नहीं हुई.
आज का जापान इसका प्रमाण है. दरअसल अमेरिका के अतीत - गर्भ में ही भयावह विनाशकारी बीज आज भी मरे नहीं हैं, जो गाहे-बगाहे अपने होने का सबूत देने के लिए फड़फड़ाते रहते हैं. तो फिर अब क्या हुआ? अमेरिका कभी अपने जिद्दी स्वभाव और आक्रामकता को नहीं छोड़ता. बीते तीन दशक इसके गवाह हैं.
लेकिन इस बार ईरान जैसे एक परंपरागत राष्ट्र ने उसे बातचीत की मेज पर आने को मजबूर कर दिया था. ट्रम्प को उसी शैली में उत्तर देने वाला इसके पहले नहीं मिला था. अभी तक की सारी बंदरघुड़कियों ने ईरान पर कोई असर नहीं किया था. ईरान के शिया मुसलमान आमतौर पर कट्टर और लड़ाकू नहीं हैं. फिर भी अगर वे मरने-मारने पर आ जाएं तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता है.
यहीं उनकी अपनी सभ्यता के बीज भी छिपे हुए हैं, जिन्हें ट्रम्प नष्ट करने पर उतारू थे. यह उनकी खौफनाक भूल थी. अस्सी के दशक में ईरान और इराक कई साल तक युद्ध लड़ते रहे. यह युद्ध बीसवीं सदी के सबसे लंबे और विनाशकारी युद्धों में से एक है. इराक ने ईरान पर आक्रमण किया था. यह जंग आठ साल चली.
इसमें भारी विनाश हुआ था और रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल भी हुआ था. क्या ट्रम्प की सेना आज इतनी लंबी लड़ाई के लिए तैयार है? इस बार तो इराक समेत नाटो के अनेक देशों ने ट्रम्प से किनारा कर लिया. यूरोपीय देशों ने अपनी अलग राह पकड़ ली है. आज ट्रम्प के पास अंध समर्थक देशों का कौन सा समूह है?
शायद कोई भी नहीं. खुद अमेरिका के करोड़ों मतदाता ट्रम्प के इस रवैये पर खफा हैं. अमेरिका में हुए अनगिनत प्रदर्शन इसके साक्षी हैं. यह विडंबना है कि अपना कोष हथियारों और गोला बारूद पर खाली करने वाले डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका की आर्थिक बदहाली देखना ही नहीं चाहते. जबकि अमेरिका पर कुल ऋण 3096 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक है.
कर्ज राष्ट्र की कुल जीडीपी का 127 फीसदी से भी अधिक है. इस देश को प्रतिदिन दो अरब डॉलर केवल ऋण का ब्याज चुकाने पर खर्च करने पड़ रहे हैं. आंकड़े कहते हैं कि प्रत्येक अमेरिकी नागरिक पर करीब एक करोड़ रुपए का ऋण है. यह विश्व में सर्वाधिक है. बताने की जरूरत नहीं कि सैनिक साजो-सामान और गोला-बारूद पर अमेरिका का व्यय सर्वाधिक है.
तटस्थ समीक्षा करें तो पाते हैं कि अमेरिका ने खुद को इन युद्ध जैसी परिस्थितियों में उलझाया है. चाहे वह अफगानिस्तान में किया हो, यूक्रेन का साथ देने पर किया गया हो या फिर ईरान के खिलाफ. इन दिनों अमेरिका में बहस का मुद्दा है कि राष्ट्रपति को संविधान प्रदत्त असीमित अधिकार कहां तक जायज हैं और क्या अब समय आ गया है जब संविधान की समीक्षा की जाए.
विडंबना है कि इजराइल पूरे मामले में ठगा सा महसूस कर रहा है. सूत्रों की मानें तो डोनाल्ड ट्रम्प ने युद्ध विराम से पहले नेतन्याहू से विचार-विमर्श भी आवश्यक नहीं समझा. पाकिस्तान और ईरान ने साफ तौर पर कहा है कि लेबनान भी युद्ध विराम में शामिल है. इसके उलट इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने एक अधिकृत बयान में स्पष्ट किया है कि लेबनान युद्ध विराम का हिस्सा नहीं है.
इसलिए इधर जंगबंदी की घोषणा हुई और उधर इजराइल ने हमले शुरू कर दिए. अब अमेरिका और पाकिस्तान किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचे हैं. अब आते हैं पाकिस्तान पर. ईरान और अमेरिका दोनों ने उसका शुक्रिया अदा किया था. ईरान और पाकिस्तान के बीच बलूचिस्तान के मसले पर लंबे समय से तनाव जारी है.
फिलहाल ईरान ने युद्ध विराम प्रस्ताव स्वीकार तो किया है लेकिन इसके पीछे इरादे क्या हैं, कोई नहीं कह सकता. अमेरिका किसी भी कीमत पर जंग से बाहर निकलना चाहता था. पर इजराइल और ईरान अभी खामोश नहीं बैठेंगे. दो सप्ताह का समय ईरान के लिए काफी था. वह अपनी युद्ध की तैयारियों को नया रूप दे सकता है और नए सिरे से अपने नेतृत्व का चुनाव कर सकता है.
भारत ने शायद ठीक ही ईरान से तत्काल भारतीयों को स्वदेश लौटने के लिए कहा है. बहुत सारी खुफिया सूचनाएं होती हैं, जो साझा नहीं की जाती हैं. आशंका तो है कि पंद्रह दिन बाद जंग का कोई नया रूप देखने को मिल सकता है, इसलिए भारतीयों का स्वदेश लौटना ही उचित है.