क्या जख्म पर मरहम लगाएंगे बालेन शाह?
By विजय दर्डा | Updated: March 30, 2026 05:19 IST2026-03-30T05:19:45+5:302026-03-30T05:19:45+5:30
क्या अब यह उम्मीद की जाए कि पिछले डेढ़ दशक में भारत और नेपाल के रिश्तों में प्रचंड तूफान के कारण जो गहरे जख्म उभर आए थे, उस पर बालेन मरहम लगाने की कोशिश करेंगे?

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नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह की बहन सुजाता शाह सेजेकन भारत के बेंगलुरु शहर में रहती हैं. चुनाव में बालेन की प्रचंड जीत के ठीक बाद उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी को दिए साक्षात्कार में कहा था कि भारत और नेपाल के रिश्ते सदियों पुराने हैं और इन्हें कोई बिगाड़ नहीं सकता. जो हुआ, वह एक अस्थायी दौर था. अब स्थिति सकारात्मक ही होगी. साथ में उन्होंने यह विश्वास भी जताया था कि भारत और नेपाल के रिश्ते तभी बेहतर होंगे जब बालेन शाह प्रधानमंत्री बनेंगे. सुजाता की तमन्ना पूरी हो गई है. केवल 35 साल की उम्र के रैपर गायक बालेन शाह ने प्रधानमंत्री का पद संभाल लिया है.
तो क्या अब यह उम्मीद की जाए कि पिछले डेढ़ दशक में भारत और नेपाल के रिश्तों में प्रचंड तूफान के कारण जो गहरे जख्म उभर आए थे, उस पर बालेन मरहम लगाने की कोशिश करेंगे? क्या इस तरह की कोशिश में वे कामयाब हो पाएंगे? क्या वे दिली तौर पर चाहते हैं कि भारत-नेपाल के रिश्ते वैसे ही हो जाएं जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के उदय के पहले थे?
वे चीन के साथ कैसा संबंध रखना चाहेंगे? दुनिया की महाशक्तियों के लिए नेपाल कूटनीतिक और रणनीतिक तौर पर बड़ा महत्वपूर्ण देश है. इसलिए ऐसे बहुत सारे सवाल इस समय नेपाल से लेकर पड़ोसी देशों तक पूछे जा रहे हैं. मगर नेपाल के लोगों ने उन पर गजब का भरोसा किया है. 2008 के बाद वहां गठबंधन सरकारें चलती रहीं.
लेकिन अब बालेन की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को भारी बहुमत से जनता ने तख्त पर बिठाया है. यानी बालेन के पास शक्ति है. वे नेपाल की किस्मत बदलने की ताकत रखते हैं. प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने मंत्रिमंडल की पहली ही बैठक में उन्होंने तेवर दिखा भी दिए हैं. जिस जेन जी आंदोलन से वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं, उस आंदोलन में सरकारी गोलियों से बहुत से नव युवा मारे गए थे.
जांच के लिए गौरी बहादुर कार्की की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था. उस आयोग ने सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी. बालेन ने उस रिपोर्ट की अनुशंसाओं पर कार्रवाई के आदेश दिए. इसके बाद नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेता केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार कर लिया गया.
ओली वो नेता हैं जो प्रधानमंत्री रहते हुए और न रहते हुए भी चीन की गोद में खेलते रहे हैं. कहते हैं कि हाओ यांकी नाम की बला की खूबसूरत चीनी राजदूत ने ओली को अपनी मीठी गिरफ्त में ले रखा था! रमेश लेखक भी चीनी एजेंडे को ही लागू करते थे. यानी लेखक और ओली की गिरफ्तारी चीन के लिए अत्यंत कठोर संदेश है कि वामपंथ के नाम पर वह नेपाल को अपना उपनिवेश बनाने की कोशिश न करे.
चीन ने अभी तक खुले रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन उसकी नजर गिरफ्तारियों पर जरूर होगी. वैसे बालेन चीन को पहले भी झटका दे चुके हैं. जब केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने झापा संसदीय क्षेत्र में नेपाल-चीन फ्रेंडशिप इंडस्ट्रियल पार्क के निर्माण के लिए शिलान्यास किया था. मगर बालेन ने चुनाव के पहले जारी अपने घोषणा पत्र से नेपाल-चीन फ्रेंडशिप इंडस्ट्रियल पार्क को हटा दिया था.
यह पार्क चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव योजना का हिस्सा है. यानी बालेन संकेत दे रहे हैं कि वे चीन की गोद में नहीं बैठने वाले हैं! तो क्या यह भारत के लिए शुभ संकेत है? काफी हद तक यह माना जा सकता है लेकिन भारत को यह उम्मीद कतई नहीं करनी चाहिए कि वे चीन से दूर रहेंगे तो भारत की गोद में बैठ जाएंगे! उनके रवैये को लेकर दो उदाहरणों पर गौर करिए.
जब वे काठमांडू के मेयर थे तब उन्होंने फिल्म आदिपुरुष पर पाबंदी लगा दी थी क्योंकि उस फिल्म में सीता को भारत का बताया गया था जबकि सीता की जन्मस्थली जनकपुर, नेपाल में है. इसके अलावा केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री रहते हुए जब एक ऐसा नक्शा जारी किया जिसमें भारत के उत्तराखंड राज्य के कुछ हिस्सों को नेपाल का दिखाया गया था तो बालेन ने न केवल समर्थन किया.
बल्कि नक्शा उन्होंने काठमांडू के मेयर कार्यालय में टांग लिया था. इसलिए हमें यह मान कर चलना चाहिए कि बालेन शाह वही करेंगे जो उनके नेपाली राष्ट्रवाद को और पुख्ता करेगा! वे ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जो नेपाल के नव युवाओं को अखर जाए लेकिन यह भी ध्यान जरूर रखेंगे कि नेपाल के हित क्या हैं. नेपाल लैंड लाॅक्ड है और भारत के साथ 1250 किलोमीटर लंबी सीमा है.
चीन के साथ सीमा 1414 कि.मी. है लेकिन चीनी सीमा ऊंचे पहाड़ों और बर्फीली चोटियों वाली है. यानी भारत के साथ उसका व्यापार जितना सुगम हो सकता है, चीन के साथ नहीं हो सकता है. दूसरी बात है कि भारत के साथ नेपाल के सांस्कृतिक संबंध हैं. बालेन हालांकि इस बात को कभी स्पष्ट रूप से कहते नहीं हैं मगर वे मधेसी हैं. मधेसी भारतीय मूल के लोगों को कहा जाता है.
इसके ठीक विपरीत चीन के साथ नेपाल का कोई सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध नहीं है. इसलिए मुझे लगता है कि बालेन निश्चय ही उम्मीद भरी निगाहों से भारत की ओर देखेंगे. इस उम्मीद को सम्मानपूर्ण सहयोग के रूप में यदि भारत सरकार पूर्ण कर पाए तो न केवल जख्म मिटेंगे बल्कि ताजी हवा के झोंके के साथ भारत-नेपाल के रिश्तों में मिठास की नई बयार भी उभरेगी. दोनों देशों के लिए ये संबंधों के सृजन का नया अवसर है. उम्मीद करें कि सब शुभ हो!