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ईरान में खामनेई शासन ने पार किया क्रूरता?, अमेरिका की धौंस का कितना असर?

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: January 20, 2026 05:48 IST

ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करने की हिम्मत ट्रम्प क्यों नहीं जुटा पा रहे हैं? हालांकि ट्रम्प ने अपनी लाज बचाने के लिए यह कह दिया है कि उनकी धमकी काम कर रही है.

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ठळक मुद्देअसली सवाल है कि क्या वाकई अमेरिका कोई हस्तक्षेप करने जा रहा है.आप आंदोलन जारी रखिए, मदद पहुंचने वाली है, रास्ते में है! भीतर घुस कर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई आसान नहीं होगी.

मानवाधिकार में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति इस बात को स्वीकार करता है कि ईरान में खामनेई शासन जिस तरह से क्रूरता बरत रहा है, वह समाप्त होना चाहिए. ईरान के लोगों को खुली हवा में सांस लेने का अधिकार होना चाहिए लेकिन इसके साथ ही इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि क्या पूरी दुनिया का चौधरी अमेरिका को ही बनने का अधिकार है और वह अपने फायदे के लिए जहां जो चाहेगा करेगा? यही कारण है कि मानवाधिकार का समर्थक होने के बावजूद बहुत से लोग किसी भी तरह के अमेरिकी हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन असली सवाल है कि क्या वाकई अमेरिका कोई हस्तक्षेप करने जा रहा है.

खासतौर पर सैन्य हस्तक्षेप? पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरानी प्रदर्शनकारियों से कहा था कि आप आंदोलन जारी रखिए, मदद पहुंचने वाली है, रास्ते में है! अब सवाल उठ रहा है कि मदद है कहां? और यह सवाल भी कि ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करने की हिम्मत ट्रम्प क्यों नहीं जुटा पा रहे हैं? हालांकि ट्रम्प ने अपनी लाज बचाने के लिए यह कह दिया है कि उनकी धमकी काम कर रही है.

ईरान में पचास लोगों की फांसी टाल दी गई है. मगर सच यह है कि ट्रम्प के सहयोगियों ने उन्हें समझाया है कि ईरान वेनेजुएला नहीं है जहां घुसंगे और खामनेई को पकड़ कर ले आएंगे. ईरान दुनिया की 16वीं बड़ी सैन्य शक्ति है. प्रकृति ने उसे समंदर और पहाड़ों से इस तरह घेरा है कि उसके भीतर घुस कर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई आसान नहीं होगी.

खामनेई अपनी सत्ता बचाने के लिए अमेरिका के खिलाफ किसी भी स्तर तक जा सकते हैं. कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि अरब देशों में जहां भी अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, उस पर ताबड़तोड़ हमला कर दें. इसके अलावा हिज्बुल्लाह और हमास जैसे संगठन ईरान की मदद कर सकते हैं.

खुले रूप से भले ही चीनी और रूसी सैनिक सामने न आएं लेकिन दोनों देश मिलकर ईरान में उत्तर कोरिया का छापामार दस्ता उतार सकते हैं. वैसे ईरान के भीतर ईरानी सैनिक भी भारी पड़ेंगे. ट्रम्प को उनके सहयोगियों ने बताया होगा कि ईरान पर फतह की कोशिश सद्दाम हुसैन ने भी की थी

लेकिन कई वर्षों तक लगातार हमले के बावजूद वे ईरान का बाल बांका नहीं कर पाए और अब तो ईरान काफी ताकतवर हो चुका है. इसके अलावा अरब देश भी नहीं चाहते कि अमेरिका ईरान पर हमला करे. वे भी अमेरिका के सहयोग से कन्नी काट रहे हैं. कुल मिलाकर यह साफ लग रहा है कि ट्रम्प की धौंस का ईरान पर कोई खास असर नहीं हो रहा है. ईरान के मसले पर साफ लग रहा है कि ट्रम्प की किरकिरी होने वाली है. 

टॅग्स :ईरानअमेरिकाडोनाल्ड ट्रंप
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