एप्सटीन एक व्यक्ति नहीं, व्यवस्था का नाम...

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 4, 2026 18:41 IST2026-02-04T18:41:11+5:302026-02-04T18:41:41+5:30

गरीबी, असमानता, पितृसत्ता और पलायन के जाल में ये अपराध लगातार नए रूप धारण करते रहे हैं।

Jeffrey Epstein files not person he name of system | एप्सटीन एक व्यक्ति नहीं, व्यवस्था का नाम...

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Highlightsसामाजिक सरोकार तब ब्लैकमेल हुए या अब हो रहे हैं, ये बड़ा प्रश्न है।खेल बहुत पहले से खेला जा रहा है, बस हर दौर में इसके चेहरे बदलते रहे हैं।

जेफ्री एप्सटीन अब उस व्यवस्था का नाम है, जहाँ यौन अपराध, सत्ता, धन और सामाजिक रसूख की आड़ में वर्षों तक पलते रहते हैं। एप्सटीन प्रकरण में सामने आ रहे अनेक वीडियो, तस्वीरें और दस्तावेज़ों ने यह उजागर किया कि किस तरह नाबालिग लड़कियों का इस्तेमाल कर प्रभावशाली लोगों को जाल में फँसाया गया और फिर उसी अपराध को चुप्पी, डर और ब्लैकमेल के ज़रिये ढँक दिया गया और वास्तविकता यह है कि सामाजिक सरोकार तब ब्लैकमेल हुए या अब हो रहे हैं, ये बड़ा प्रश्न है।

अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सब केवल अमेरिका तक सीमित था या इसका वजूद हर समाज में किसी न किसी रूप में मौजूद है? जब हम राष्ट्रीय, प्रांतीय या शहरी स्तर पर दृष्टि डालते हैं, तो लगता है कि ब्लैकमेलिंग और यौन शोषण का यह खेल बहुत पहले से खेला जा रहा है, बस हर दौर में इसके चेहरे बदलते रहे हैं।

यदि हम अपने इर्दगिर्द दृष्टि डालें तो पाते हैं कि इस प्रकार के खेल न्यूनाधिक,  इस या उस रूप में विद्यमान हैं। काश, मानव समाज ने वैज्ञानिक सृजन और नैतिक चेतना पर उतनी मेहनत की होती, जितनी उसने अपराध को छिपाने की तकनीकों पर की है तो दृश्य व दृष्टि प्रगतिगामी होती। भारतीय संदर्भ में सच्चाई यह है कि यहाँ यौन अपराध और मानव तस्करी किसी एक “एप्सटीन मॉडल” में नहीं दिखते लेकिन गरीबी, असमानता, पितृसत्ता और पलायन के जाल में ये अपराध लगातार नए रूप धारण करते रहे हैं।

यहाँ अपराध चमकदार द्वीपों और निजी जेट से नहीं बल्कि गाँवों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, झुग्गियों और महानगरों की तंग गलियों से शुरू होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और अन्य आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि भारत में हर वर्ष हज़ारों मानव तस्करी और यौन शोषण के मामले दर्ज होते हैं। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं और नाबालिग लड़कियों की होती है।

कुल पीड़ितों में लगभग 60 प्रतिशत महिलाएँ और लड़कियाँ हैं, जबकि करीब 40 प्रतिशत बच्चे। इनमें से एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर यौन शोषण के लिए इस्तेमाल किया जाता है और यह संख्या केवल दर्ज मामलों की है, वास्तविकता इससे कहीं अधिक भयावह है। भारतीय समाज में अब ये अपराध केवल गली-कूचों तक सीमित नहीं रहे।

स्पा सेंटर, मसाज पार्लर, होटल, गेस्ट हाउस, लॉज, किराए के फ्लैट, कोचिंग सेंटर, हॉस्टल, फैक्ट्री परिसर, यहां तक कि कुछ धार्मिक स्थल और आश्रम भी समय-समय पर ऐसे मामलों में चर्चा में आए हैं। कहीं नौकरी के नाम पर, कहीं आध्यात्मिक मुक्ति के नाम पर, कहीं मॉडलिंग और सोशल मीडिया फेम के सपनों के सहारे—लड़कियों और बच्चों को जाल में फँसाया जाता है।

डिजिटल युग ने इस अपराध को और भयावह बना दिया है। मोबाइल कैमरे, छिपे हुए वीडियो, सोशल मीडिया और क्लाउड स्टोरेज अब अपराधियों के लिए नए हथियार हैं। वीडियो और तस्वीरों के ज़रिये ब्लैकमेल करना अब किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहा; यह अपराध शहरी, अर्द्ध-शहरी और ग्रामीण—तीनों समाजों में फैल चुका है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन मामलों में अक्सर पीड़िता ही कठघरे में खड़ी कर दी जाती है और फिर समाज प्रश्न करता है—“वह वहाँ गई ही क्यों?”, “उसने मना क्यों नहीं किया?”, “अब बोलने का क्या मतलब?” या "भाई, अब चुप रहना ही सही है", इसी कारण अपराधी धन, रसूख और सामाजिक-राजनीतिक संरक्षण के सहारे बच निकलते हैं।

यही सामूहिक चुप्पी, यही नैतिक पलायन, वह ढाल है जिसने एप्सटीन जैसे लोगों को वर्षों तक सुरक्षित रखा। भारत में ITPA, POCSO एक्ट, महिला एवं बाल संरक्षण कानून और मानव तस्करी विरोधी इकाइयाँ मौजूद हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि जाँच की धीमी गति, कम सज़ा दर, गवाहों की असुरक्षा और पीड़ितों के कमजोर पुनर्वास के कारण अपराधियों के हौसले पूरी तरह टूट नहीं पाते।

कई बार राजनीतिक संरक्षण और आर्थिक ताकत कानून से भी भारी पड़ जाती है। एप्सटीन प्रकरण भारतीय समाज के लिए एक चेतावनी है—कि यौन अपराध किसी एक देश, संस्कृति या वर्ग की समस्या नहीं हैं। फर्क केवल इतना है कि कहीं वे सत्ता और विलासिता के परदे में छिपे होते हैं, और कहीं गरीबी, मजबूरी और अंधविश्वास के अँधेरे में...।

अब असली सवाल यह नहीं है कि भारत में कोई “एप्सटीन” है या नहीं। असली सवाल यह है कि हम एक समाज के रूप में अपने आसपास मौजूद छोटे-छोटे एप्सटीन को पहचानने, रोकने और उनके खिलाफ खड़े होने के लिए कितने तैयार हैं।

डॉ. धर्मराज,

प्रोफेसर बाबूलाल महाविद्यालय, गोवर्धन

Web Title: Jeffrey Epstein files not person he name of system

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