असल समस्या ट्रम्प हैं या दुनिया का दरोगा बनने की अमेरिकी मनोदशा?

By रहीस सिंह | Updated: April 4, 2026 05:18 IST2026-04-04T05:18:31+5:302026-04-04T05:18:31+5:30

यह तो पता नहीं कि अमेरिका सहित दुनिया में ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन ट्रम्प के अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं अथवा नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि ट्रम्प अब अमेरिका के लोकप्रिय नेता नहीं रह गए हैं.

iran war real problem donald Trump or American mindset becoming world's policeman blog Dr. Rahees Singh | असल समस्या ट्रम्प हैं या दुनिया का दरोगा बनने की अमेरिकी मनोदशा?

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Highlightsपेश करने की कोशिश की जा रही है या वे खुद को पेश कर रहे हैं?सवाल और, क्या अमेरिका वैसा ही है जैसा कि अमेरिकी मानते आ रहे हैं? सत्ता को जनता से ऊपर समझने की गलती कर रही है.

खबरें बता रही हैं कि अमेरिका गुस्से में है. सड़कों पर एक आवाज सुनाई दे रही है- ‘नो किंग्स’. यह आवाज अमेरिकी शहरों से भी और आगे बढ़कर दुनिया के दूसरे देशों के शहरों- पेरिस, लंदन, बर्लिन, रोम, एथेंस और लिस्बन तक में भी सुनाई दी. अब सवाल यह उठता है कि इस तरह का प्रदर्शन राष्ट्रपति ट्रम्प के खिलाफ असंतोष की अभिव्यक्ति है अथवा अमेरिकियों में गहरे तक पैठी हुई निराशा और बेचैनी से हुआ विस्फोट है? क्या इसके जरिए यह बताने की कोशिश हो रही है कि ट्रम्प अमेरिका नहीं हैं, जैसा कि उन्हें पेश करने की कोशिश की जा रही है या वे खुद को पेश कर रहे हैं?

एक सवाल और, क्या अमेरिका वैसा ही है जैसा कि अमेरिकी मानते आ रहे हैं? यह तो पता नहीं कि अमेरिका सहित दुनिया में ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन ट्रम्प के अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं अथवा नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि ट्रम्प अब अमेरिका के लोकप्रिय नेता नहीं रह गए हैं. यह ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन का तीसरा संस्करण था जो 3000 से अधिक जगहों पर हुआ जो यह संदेश देने में सफल हो रहा है कि यह किसी नेता के खिलाफ नहीं बल्कि उस सोच के खिलाफ है जो सत्ता को जनता से ऊपर समझने की गलती कर रही है.

किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अमेरिकी मनोविज्ञान को समझना जरूरी लगता है. इसके लिए यह देखना जरूरी है कि अमेरिका में पिछले एक दशक से या उससे भी कुछ पहले से जो उथल-पुथल हो रही है वह अमेरिकियों के लिए गर्व का प्रश्न है अथवा निराशा का? एक लेखिका लिडिया पोलग्रीन अपने एक लेख में लिखती हैं कि कभी-कभी मुझे लगता है कि अमेरिका में जो कुछ घटा है,

उसने उस राष्ट्र को पूरी तरह बदल दिया है जिसे मैं जानती थी. फिर भी, हर संकट के बाद मुझे यह अहसास होता है कि शायद अमेरिका वैसा कभी था ही नहीं जैसा हम समझते रहे. वे आगे लिखती हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प का उदय प्रायः अमेरिकी लोकतंत्र के लिए एक असाधारण विचलन के रूप में देखा जाता है, एक ऐसे विचित्र अपवाद के रूप में जो हमारे मूल्यों से मेल नहीं खाता.

लेकिन यह दृष्टिकोण अधूरा है. ट्रम्प केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, वे उस लंबे ऐतिहासिक प्रवाह का बाइ-प्रॉडक्ट हैं, जिसने अमेरिका की राजनीति, समाज और वैश्विक भूमिका को आकार दिया है. क्या वास्तव में ऐसा ही है? यह प्रश्न इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि ट्रम्प या उन जैसा नेतृत्व किसी देश को तब तक अपने नियंत्रण में नहीं ले पाता जब तक कि उसे स्वीकारने की मनोदशा निर्मित न कर ले.

वैसे अमेरिका का इतिहास स्वयं को असाधारण मानने की धारणा से कभी उबर नहीं पाया. कारण यह कि अमेरिका खुद को नैतिक रूप से श्रेष्ठ और दुनिया का पथप्रदर्शक मानता है. उसकी यही सोच पढ़े-लिखे अमेरिकियों को भी उन कमियों से आंखें मूंद लेने पर मजबूर करती रही जो देश और उसके नागरिकों के हित में नहीं थीं.

इसके विपरीत वे अमेरिकी संस्थाओं की मजबूती और अपने लोकतंत्र पर इतराते रहे. जबकि सच यह है कि अमेरिका हमेशा से विरोधाभासों से भरा रहा है. वह स्वतंत्रता और असमानता, लोकतंत्र और बहिष्कार, आदर्शवाद और शक्ति आधारित राजनीति (पावर पॉलिटिक्स) के बीच झूलता हुआ आगे बढ़ा. ट्रम्प इसी विरोधाभास से उपजे हैं.

किसको नहीं पता कि शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने खुद को स्वतंत्रता का वैश्विक रक्षक घोषित किया था. लेकिन क्या वह सच में ऐसा ही रहा? यदि हां तो उन युद्धों और हस्तक्षेपों को कहां रखा जाए जिनके परिणाम विनाशकारी रहे. वियतनाम से लेकर इराक और काबुल से लेकर बेरूत तक, पूरी दुनिया में शक्ति के प्रयोग प्रायः उन आदर्शों से टकराते हुए देखे गए जिनका अमेरिका दावा करता आ रहा था.

फिर ट्रम्प पर विलाप या गुस्सा क्यों? ट्रम्प ने तो उन संदेहों को केवल गहरा किया है जो राजनीति में पहले से ही मौजूद थे. असल समस्या तो उस अमेरिकी व्यवस्था और चरित्र में ही निहित है जिसे उसने कम से कम पिछली एक सदी के दौरान विकसित किया. अमेरिका की विदेश नीति के मूल में यह विचारधारा रही है कि उसे दुनिया का नेतृत्व करना चाहिए. बिना भय और युद्ध के यह संभव ही नहीं.

हालांकि अमेरिका ने इसके लिए कुछ और उपाय भी किए थे जिसमें ‘ब्रेटन वुड्स’ व्यवस्था प्रमुख थी. इसने दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक वैश्विक व्यवस्था दी, लेकिन वही व्यवस्था अब बदलती हुई दुनिया के साथ तालमेल बिठाने में खुद को असमर्थ पा रही है. चूंकि इसका विकल्प अभी तक स्पष्ट नहीं है, शायद ट्रम्प इसी से टकरा रहे हैं.

आज चीन जैसी शक्तियां उभर रही हैं और समानांतर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था निर्मित करने की कोशिश में हैं. संभवतः अमेरिका इसे अस्तित्वगत चुनौती मानता है. यही वह कारण है कि जहां ट्रम्प का उभरना आश्चर्यजनक नहीं लगता.

इसके अतिरिक्त और क्या वजह हो सकती है कि एक अनिश्चित व्यवहार और मनोदशा वाले ट्रम्प को उनकी योग्याताओं के आधार पर नहीं बल्कि उनकी इडियोसिटी के आधार पर देश का राष्ट्रपति चुन लिया गया. बहरहाल, अमेरिकियों को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि असल समस्या ट्रम्प नहीं हैं बल्कि वह ऐतिहासिक और सामाजिक प्रक्रिया है जिसके कारण ट्रम्प का उभार हुआ.  

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