क्या वियतनाम याद आ रहा है आपको?, यदि नहीं तो चलिए मैं याद दिला देता हूं?

By विकास मिश्रा | Updated: March 24, 2026 05:35 IST2026-03-24T05:35:16+5:302026-03-24T05:35:16+5:30

सेना को खुद पर पूरा भरोसा था कि दुनिया की कोई ताकत उसे परास्त नहीं कर सकती तो फिर उत्तरी वियतनाम जैसे पिद्दी से देश की क्या औकात? इस दंभ में अमेरिका ने उत्तरी वियतनाम पर हमला कर दिया.

Do you miss Vietnam November 1, 1955 ended April 30 1975 More than 58,000 American soldiers killed 300,000 American soldiers injured blog Vikas Mishra | क्या वियतनाम याद आ रहा है आपको?, यदि नहीं तो चलिए मैं याद दिला देता हूं?

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Highlightsसंक्षिप्त में कहानी ऐसी है कि वियतनाम एक फ्रांसीसी उपनिवेश था.अमेरिकी इतिहास का यह शर्मनाक पन्ना है.अंत में बहुत बेआबरू होकर अमेरिका वहां से बाहर निकला.

मुझे तो इन दिनों वियतनाम युद्ध की याद आ रही है. क्या आपको भी उस युद्ध की याद आ रही है? यदि नहीं तो चलिए मैं याद दिला देता हूं. वो युद्ध आधिकारिक रूप से 1 नवंबर 1955 को प्रारंभ हुआ और 30 अप्रैल 1975 को समाप्त हुआ. उस जंग में अमेरिका के 58 हजार से ज्यादा सैनिकों की मौत हुई. करीब 3 लाख अमेरिकी सैनिक घायल हुए और 10 हजार का तो आज तक पता ही नहीं चला कि वे गए कहां? और अंत में बहुत बेआबरू होकर अमेरिका वहां से बाहर निकला. अमेरिकी इतिहास का यह शर्मनाक पन्ना है. संक्षिप्त में कहानी ऐसी है कि वियतनाम एक फ्रांसीसी उपनिवेश था.

फ्रांस से आजादी प्राप्त करने के लिए 1930 में वहां कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई. दूसरे विश्वयुद्ध के ठीक बाद वियतनाम ने खुद को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया लेकिन वास्तव में फ्रांस के आधिपत्य से वह 1954 में ही बाहर आ पाया. मगर शांति समझौते के नाम पर एक राजनीतिक खेल हो गया और वियतनाम को दो हिस्सों में बांट दिया गया.

उत्तरी वियतनाम और दक्षिणी वियतनाम. प्रावधान रखा गया कि दो साल बाद चुनाव के माध्यम से दोनों का पुनर्मिलन हो जाएगा. मगर यह वास्तव में चाल थी. दक्षिणी वियतनाम पर फ्रांस और अमेरिका समर्थक सरकार का शासन था जिसने पुनर्मिलन में  व्यवधान पैदा करना प्रारंभ कर दिया. उत्तरी वियतनाम साम्यवादी था.

अमेरिका को डर था कि साम्यवाद कहीं दक्षिणी वियतनाम पर न हावी हो जाए और पास के दूसरे देशों को भी अपनी चपेट में न ले ले. इसलिए उसने दक्षिणी वियतनाम को धन और हथियार दिए और फिर खुद भी उसके लाखों सैनिक पहुंच गए ताकि उत्तरी वियताम पर कब्जा करके उसे एक शासन के अधीन ले आया जाए.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद निर्विवाद रूप से अमेरिका दुनिया की सबसे मजबूत आर्थिक ताकत बन चुका था. उसकी सेना को खुद पर पूरा भरोसा था कि दुनिया की कोई ताकत उसे परास्त नहीं कर सकती तो फिर उत्तरी वियतनाम जैसे पिद्दी से देश की क्या औकात? इस दंभ में अमेरिका ने उत्तरी वियतनाम पर हमला कर दिया.

उस वक्त अमेरिकी नेताओं को ऐसे लगा था कि दो-चार दिनों की लड़ाई में ही उत्तरी वियतनाम दम तोड़ देगा. मगर हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतकांग यानी गुरिल्ला लड़ाकों ने अमेरिका को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया. करीब बीस साल तक वे लड़ते रहे. उन लड़ाकों ने छापामार युद्ध में इतनी महारत हासिल कर ली थी कि वे जंगलों में अमेरिकी सैनिकों को घेरते, उन्हें मारते और पलक झपकते ही गायब हो जाते. वो जंग कितनी भयानक थी, इसका अंदाजा कुछ आंकड़ों से लगाया जा सकता है. 1995 में वियतनाम ने युद्ध में मारे गए लोगों की आधिकारिक संख्या का अनुमान जारी किया था.

अनुमान है कि दोनों पक्षों के करीब 20 लाख नागरिक मारे गए. इनमें करीब 11 लाख उत्तरी वियतनामी और छापामार लड़ाके थे. अमेरिकी सेना मानती है कि दक्षिण वियतनाम के करीब 2 लाख सैनिकों की मौत हुई. जब युद्ध चरम पर था तब वियतनाम में पांच लाख से भी ज्यादा सैनिक तैनात थे. वैसे करीब बीस वर्षों की अवधि में अमेरिका के पच्चीस से तीस लाख सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया.

वाशिंगटन डीसी में वियतनाम वेटरन्स मेमोरियल में अमेरिकी सशस्त्र बलों के 58,300 से अधिक सदस्यों के नाम दर्ज हैं जो युद्ध में मारे गए या लापता हो गए. जंग में अमेरिका के इतने ज्यादा सैनिकों की मौत ने अमेरिका के भीतर ही उद्वेलन पैदा कर दिया कि इस जंग की जरूरत ही क्या है? अमेरिका में भारी असंतोष पैदा हुआ. घरेलू राजनीति में अमेरिकी सरकार पर दबाव बढ़ने लगा कि जंग रुकनी चाहिए.

दूसरों के लिए हम अपना बेटा क्यों गंवाएं. इधर पैसा भी खूब खर्च हो रहा था. अंतत: अमेरिका ने वियतनाम से अपने पैर वापस खींच लिए. जंग समाप्त हुई. वियतनाम एक हो गया. मन में सवाल उठना लाजमी है कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेना को एक गरीब देश ने कैसे वापस लौट जाने पर मजबूर किया?

अमेरिका से वियतनाम की हवाई दूरी तेरह से चौदह हजार किलोमीटर दूर है. इतनी दूर लड़ाई लड़ना बहुत मुश्किल काम था. अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट की मानें तो युद्ध पर उस वक्त अमेरिका का 686 अरब डॉलर खर्च हुआ था. मगर क्या यही कारण था? दूसरे विश्वयुद्ध में तो अमेरिका ने इससे कई गुना ज्यादा खर्च किया था.

जहां तक बहुत दूर जाकर लड़ाई लड़ने का सवाल है तो कोरिया की दूरी अमेरिका से करीब दस हजार किलोमीटर है, फिर भी अमेरिका ने जीत दर्ज की थी! भले ही आज उत्तर कोरिया उसे आंखें दिखा रहा हो और अमेरिका आंखें चुराने पर मजबूर हो. इसका मतलब बहुत साफ है कि वियतनाम में अमेरिका की पराजय का कारण वियतनाम के लोग और छापामार गुरिल्ले थे.

जिन्होंने कभी इस बात की परवाह ही नहीं की कि वे एक सुपरपावर से जंग लड़ रहे हैं. वे तो अपने अस्तित्व के लिए जंग लड़ रहे थे. जब बात अस्तित्व की हो तो फिर डर को उखाड़ फेंकना और जीतना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है! तो वियतनाम की कहानी का इस वक्त क्या संदर्भ है? संदर्भ यह है कि अमेरिका ने दंभ भरा था कि ईरान दो-चार दिनों से ज्यादा नहीं टिकेगा! मगर ईरान टिका हुआ है.

अमेरिका ने तो शायद यह भी नहीं सोचा था कि तालिबान इस कदर लड़ेगा कि अंतत: उसे ही सत्ता सौंपकर भागना पड़ेगा! अफगानिस्तान में अमेरिका ने कहा कि मकसद पूरा हुआ और भाग खड़ा हुआ! क्या ईरान में भी यही होने वाला है? जो भी हो, अमेरिका महाबली है. जीत गए...जीत गए... जीत गए... का शोर मचाना मचाना उसका अधिकार है. जितनी जल्दी हो, वो शोर मचाए, इसी में दुनिया की भलाई है.

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