Bangladesh’s election 2026: बांग्लादेश के साथ नई शुरुआत की उम्मीद

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 19, 2026 05:46 IST2026-02-19T05:46:13+5:302026-02-19T05:46:13+5:30

Bangladesh’s election 2026: शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने वाले 2024 के ‘जेन जी’ विद्रोह से जन्मा और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाला अंतरिम प्रशासन अब इतिहास बन गया है.

Bangladesh’s election 2026 Hope new beginning with Bangladesh blog Prabhu Chawla | Bangladesh’s election 2026: बांग्लादेश के साथ नई शुरुआत की उम्मीद

Bangladesh’s election 2026

HighlightsBangladesh’s election 2026: तारिक रहमान की बीएनपी ने चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया.Bangladesh’s election 2026: जमात-ए-इस्लामी अब लगभग 70 सीटों के साथ विपक्ष का नेतृत्व कर रही है.Bangladesh’s election 2026: स्थिर और समावेशी बांग्लादेश के साथ काम करने की भारत की तत्परता को रेखांकित करती है.

प्रभु चावला

दक्षिण एशिया की ज्यामिति में भूगोल ही नियति है और स्मृति कभी जड़ नहीं होती. बांग्लादेश भारत का पड़ोसी भर नहीं है, यह भारत की महाद्वीपीय सुरक्षा का पूर्वी आधार स्तंभ और उन साझा जल संसाधनों का संरक्षक है, जो आधे अरब जीवन को सींचते हैं. यह बंगाल की खाड़ी के विस्तृत होते रणनीतिक रंगमंच का प्रवेश द्वार भी है. इसलिए ढाका में जो कुछ भी घटित होता है, उसकी गूंज इसके डेल्टा मैदानी इलाकों से बहुत दूर तक जाती है. पिछले सप्ताह बांग्लादेश ने एक ऐसा फैसला दिया, जिसकी गूंज भूकंपीय बदलाव की तरह थी. तारिक रहमान की बीएनपी ने चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया.

शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने वाले 2024 के ‘जेन जी’ विद्रोह से जन्मा और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाला अंतरिम प्रशासन अब इतिहास बन गया है. तीन दशकों से अधिक के महिला वर्चस्व के बाद एक पुरुष ढाका में प्रधानमंत्री पद संभाल रहा है. कभी एक अनिच्छुक सहयोगी रही जमात-ए-इस्लामी अब लगभग 70 सीटों के साथ विपक्ष का नेतृत्व कर रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई वास्तविकता स्पष्ट रूप से पहचानी है. नतीजा सामने आने के कुछ ही घंटों के भीतर तारिक रहमान को फोन कर बधाई देने वाले वह पहले शासनाध्यक्षों में से थे. यह पहल एक लोकतांत्रिक, स्थिर और समावेशी बांग्लादेश के साथ काम करने की भारत की तत्परता को रेखांकित करती है.

मीडिया विशेषज्ञों के लिए बांग्लादेश का यह घटनाक्रम शेख हसीना के बाद के अंतराल की बर्बरता की निर्मम राष्ट्रीय जांच, अल्पसंख्यकों की गरिमा पर एक बाध्यकारी जनमत संग्रह तथा आर्थिक सुधार, व्यावहारिक शासन और राष्ट्रीय नवीनीकरण पर केंद्रित ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ सिद्धांत की एक गूंजती हुई पुष्टि है.

शेख हसीना के पतन के बाद बांग्लादेश अल्पसंख्यकों के खिलाफ आतंक के सुनियोजित शासन में डूब गया था. वैश्विक संस्थानों ने पहले 100 दिनों में ही हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर 2000 से अधिक हमले दर्ज किए थे, जिससे हजारों लोग भारत आने को मजबूर हुए. खुद मोहम्मद यूनुस द्वारा आमंत्रित एक संयुक्त राष्ट्र जांच समिति ने अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के अंतरिम  शासन के इनकार को खारिज कर दिया. भारतीय स्क्रीन पर विस्थापित परिवारों, नष्ट किए गए मंदिरों और शिकार होते श्रद्धालुओं के दृश्यों ने द्विपक्षीय संबंधों को आक्रोश की भट्टी में बदल दिया.

भारत द्वारा बेदखल प्रधानमंत्री हसीना को शरण देने ने द्विपक्षीय दरार को और गहरा किया. हालांकि अपनी मां खालिदा जिया की मृत्यु के बाद लंदन से 17 साल के निर्वासन से लौटे तारिक रहमान ने खुद को संप्रभुता के रक्षक के रूप में पेश किया. एक संबोधन में उन्होंने राष्ट्र को पहाड़ियों और मैदानों, मुसलमानों, हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों की एक साझा विरासत घोषित किया,

और जोर दिया कि हर नागरिक को बिना डरे सड़कों पर चलना चाहिए. जमात के संभावित शासन के डर ने इस संदेश को पुरअसर बनाया. करीब तीन दर्जन हिंदू बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में, जो कभी अवामी लीग के गढ़ थे, नौ प्रतिशत हिंदू मतदाताओं ने निर्णायक रूप से बीएनपी का साथ दिया. उन्होंने तारिक रहमान की पार्टी को उन नेटवर्कों के खिलाफ इकलौती सक्षम ढाल के रूप में देखा,

जिन्होंने उन्हें 18 महीनों तक आतंकित किया था. बांग्लादेश के चुनावी नतीजे से एक असंभव गठबंधन बना. सुरक्षा चाहने वाले अल्पसंख्यक, गरिमा और नौकरियों की मांग करने वाले युवा तथा वंशानुगत शासन व पश्चिमी संरक्षण को खारिज करने वाले रूढ़िवादी मुसलमान एक साथ आ गए. चुनौती हालांकि अभी खत्म नहीं हुई है.

जमात और उसके सहयोगियों के पास 77 सीटों के साथ एक कठोर वैचारिक मशीनरी भी है. ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि उन्होंने भारत की सीमा से लगे निर्वाचन क्षेत्रों में अपना सबसे मजबूत समर्थन हासिल किया, जिसके गंभीर निहितार्थ हैं. इससे सीमापार घुसपैठ को प्रोत्साहन मिलने का जोखिम है. बीएनपी की जीत बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के लिए एक नाजुक उम्मीद जगाती है.

रहमान ने व्यवस्था बहाल करने और सभी धर्मों की सुरक्षा को राज्य के मुख्य कर्तव्य के रूप में स्थापित करने का वादा किया है. शेख हसीना को मानवता के आधार पर दी गई शरण को भारत को दुश्मन के रूप में चित्रित करने का हथियार बनाया गया. ठप पड़ी जल वार्ता से लेकर सांस्कृतिक बहिष्कार और पिछले महीने बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड द्वारा टी-20 विश्व कप के लिए भारतीय धरती पर मैच खेलने से इनकार के असाधारण निर्णय तक, संबंध पूरी तरह टूट गए. क्रिकेट का जो खेल कभी सेतु था, वह युद्ध का एक और मैदान बन गया.

फिर भी, मोदी द्वारा रहमान के जनादेश की त्वरित मान्यता ने आपसी संबंधों के पुनर्गठन का एक द्वार खोल दिया है. भारत के लिए, बांग्लादेश के नए नेतृत्व का आचरण निर्णायक कारक होगा. क्या तारिक रहमान अल्पसंख्यकों की रक्षा करेंगे, 2024-25 के अत्याचारों के लिए न्याय दिलाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि बांग्लादेश भारत विरोधी विद्रोहियों को पनाह नहीं देगा?

रहमान को चरमपंथी तत्वों से स्पष्ट रूप से संबंध तोड़ने होंगे और भारतीय उग्रवादियों को पनाह देने से इनकार करना होगा. इसके अलावा, ढाका को आपसी रणनीतिक और आर्थिक लाभ के आधार पर एक लेन-देन वाले संबंध को आगे बढ़ाना चाहिए तथा उस सीमापार टकराव को खारिज करना चाहिए,

जिसने बार-बार संबंधों में जहर घोला है. दोनों राष्ट्र भूगोल, इतिहास और साझा नियति से इस तरह बंधे हैं, जिसे विचारधारा मिटा नहीं सकती. बांग्लादेश के लिए बेहतर होगा कि वह अंतहीन टकराव के पाकिस्तान मॉडल को खारिज कर दे. भारत और बांग्लादेश के एक साथ आने से यह डेल्टा विकास, कनेक्टिविटी और स्थिरता के पावरहाउस के रूप में उभर सकता है.

Web Title: Bangladesh’s election 2026 Hope new beginning with Bangladesh blog Prabhu Chawla

विश्व से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे