अविश्वास के घने कोहरे में विश्वास की खोज !

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 10, 2026 07:36 IST2026-04-10T07:36:10+5:302026-04-10T07:36:14+5:30

युद्ध विराम की घोषणा होने के बाद भी वे इस तरह की धमकी से बाज नहीं आ रहे हैं. जरा सोचिए कि ऐसी स्थिति में ईरान कैसे अमेरिका पर भरोसा करे?

America Israel and Iran Searching for faith in the dense fog of disbelief | अविश्वास के घने कोहरे में विश्वास की खोज !

अविश्वास के घने कोहरे में विश्वास की खोज !

शायर आसिम वास्ती का एक शेर है- ‘मेरी जुबान के मौसम बदलते रहते हैं, मैं आदमी हूं मेरा ए’तिबार मत करना!’ अमेरिका-इजराइल और ईरान के प्रसंग में इस वक्त जो कुछ भी चल रहा है, उसमें ये शेर बड़ा मौजूं बैठता है. अविश्वास का कोहरा इतना घना है कि उसमें विश्वास की तलाश कर पाना वाकई बहुत मुश्किल काम है. सबका अपना एजेंडा है और कोई अपने एजेंडे से जरा सा भी डिगने को तैयार नहीं है तो फिर समझौता होगा कैसे? सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि अमेरिका या ईरान समझौते के लिए जिस पाकिस्तान का कंधा इस्तेमाल कर रहे हैं, वह पाकिस्तान पूरी दुनिया में अपनी धोखेबाजी के लिए जाना जाता है. जो खुद ही अविश्वसनीय हो, उसे विश्वास की खोज का नायक बनाना मूर्खता के अलावा और क्या है? दरअसल अमेरिका ने पाकिस्तान को इस भूमिका में इसलिए रखा क्योंकि उसके प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना अध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर ट्रम्प की चापलूसी की सारी हदें पार कर चुके हैं. अमेरिका को पाकिस्तान से बेहतर संदेशवाहक मिल भी नहीं सकता था.

इस जंग का सबसे प्रमुख हिस्सा इजराइल है लेकिन इजराइल को ही पाकिस्तान पर भरोसा नहीं है. शहबाज शरीफ ने युद्ध विराम की घोषणा करते हुए कहा कि युद्ध विराम की अवधि के दौरान लेबनान पर इजराइल हमला नहीं करेगा मगर कुछ ही देर बाद इजराइल ने कह दिया कि लेबनान का मसला युद्ध विराम में आता ही नहीं है! अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी अब यही राग अलाप रहे हैं. उनका कहना है कि ईरान को कोई गलतफहमी हुई होगी. लेबनान तो युद्ध विराम में शामिल ही नहीं है. सवाल है कि जब लेबनान का मसला युद्ध विराम में शामिल ही नहीं था तो फिर शहबाज शरीफ ने घोषणा क्यों की? क्या इजराइल से कोई बातचीत नहीं की गई या शरीफ ने दुनिया को धोखे में रखा? वैसे भारत में इजराइल के राजदूत रूवेन अजार ने तो साफ कह दिया कि उनका देश पाकिस्तान को विश्वसनीय देश ही नहीं मानता है!

इधर ट्रम्प की हालत यह है कि एक तरफ वे ईरान के साथ समझौते की बात करते हैं तो अगले ही पल धमकी देते हैं कि यदि ईरान ने बात नहीं मानी तो उसे मिटा देंगे. युद्ध विराम की घोषणा होने के बाद भी वे इस तरह की धमकी से बाज नहीं आ रहे हैं. जरा सोचिए कि ऐसी स्थिति में ईरान कैसे अमेरिका पर भरोसा करे? भरोसे की इसी कमी के कारण ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामनेई ने अपनी फौज से कहा है कि गोलीबारी रोक दें लेकिन उंगलियां ट्रिगर पर रखें.

मोजतबा की इस घोषणा ने निश्चय ही अमेरिका और इजराइल को आश्चर्यचकित कर दिया होगा क्योंकि ये दोनों ही मोजतबा की तलाश में हैं लेकिन वे मिल नहीं रहे हैं. कहां हैं, किसी को पता नहीं है लेकिन यह माना जा रहा है कि वे जहां भी हैं, बिल्कुल चुनिंदा लोगों के संपर्क में हैं क्योंकि ईरान में यह भरोसा करना मुश्किल है कि कौन इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद का एजेंट है और कौन नहीं है! कुल मिलाकर हर तरफ भरोसे का संकट है.

Web Title: America Israel and Iran Searching for faith in the dense fog of disbelief

विश्व से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे