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25वां घंटा: एक ऐसी दुनिया जो किनारे पर खड़ी है?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 12, 2026 05:33 IST

इलाका फिर से शक्ति, अहंकार और बदले की लड़ाई का मैदान बन गया है. मिसाइल का जवाब मिसाइल से दिया जा रहा है.

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ठळक मुद्देलगातार युद्धों ने इंसानियत को तबाही के बिल्कुल किनारे पर पहुंचा दिया है.मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ रहा है, उसकी चेतावनी पहले से ज्यादा सच्ची लगती है. ऐसा लगता है जैसे इंसानियत आखिरी घड़ी के बहुत करीब खड़ी है.

माजिद पारेख

कई साल पहले एक किताब आई थी ‘द 25th आवर’ (25वां घंटा). इस किताब में एक ऐसी दुनिया का चित्र खींचा गया है जो दो दुश्मन खेमों में बंट चुकी है और दोनों एक-दूसरे को मिटा देना चाहते हैं. किताब में लेखक ने चेतावनी दी है कि हथियारों की अंधी दौड़ ने धरती को विनाश के गोदाम में बदल दिया है. लगातार युद्धों ने इंसानियत को तबाही के बिल्कुल किनारे पर पहुंचा दिया है.

उसने एक डरावनी उपमा देते हुए लिखा कि 24वां घंटा खत्म हो चुका है और इंसानियत 25वें घंटे में प्रवेश कर रही है. आज जब पूरे मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ रहा है, उसकी चेतावनी पहले से ज्यादा सच्ची लगती है. यह इलाका फिर से शक्ति, अहंकार और बदले की लड़ाई का मैदान बन गया है. मिसाइल का जवाब मिसाइल से दिया जा रहा है.

धमकी का जवाब धमकी से. गठबंधन और मजबूत हो रहे हैं. और इसकी कीमत आम लोग -परिवार, बच्चे और मेहनतकश- चुका रहे हैं. हमें खुद से पूछना चाहिए: क्या हम 25वें घंटे में प्रवेश कर रहे हैं? आज दुनिया में परमाणु हथियार तैयार हैं, उंगलियां बटन पर हैं, और देश आपसी शक और डर से भरे हुए हैं. ऐसा लगता है जैसे इंसानियत आखिरी घड़ी के बहुत करीब खड़ी है.

अगर यह हमारी सुबह है तो शायद हम शाम न देख पाएं, और अगर यह हमारी शाम है तो शायद अगली सुबह न देख पाएं. लोग इतने डरे हुए हैं कि कभी-कभी उन्हें जमीन के ऊपर से ज्यादा नीचे रहना सुरक्षित लगता है. यह सिर्फ राजनीतिक अस्थिरता नहीं है-यह पूरी सभ्यता की चिंता है. इतिहास ने हमें सिखाया है कि युद्ध में कोई असली विजेता नहीं होता.

जीतने वाले भी आर्थिक, नैतिक रूप से घायल हो जाते हैं. शहरों को फिर से बनाया जा सकता है, लेकिन भरोसा लौटाने में पीढ़ियां लग जाती हैं. हथियार सीमाओं की रक्षा कर सकते हैं, लेकिन दिलों को सुरक्षित नहीं कर सकते. ऐसा लगता है जैसे इंसानियत धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेजी से नैतिक दिवालियेपन की ओर दौड़ रही है.

सोचिए, कितने लोग प्राकृतिक आपदाओं में मरे हैं और कितने लोग इंसानों द्वारा लाई गई तबाहियों में. भूकंप किसी विचारधारा के साथ नहीं आते. तूफान धर्म देखकर भेदभाव नहीं करते. लेकिन इंसानों के झगड़े ऐसा करते हैं. जब विनाश इंसान के हाथों होता है तो त्रासदी और भी बड़ी हो जाती है- क्योंकि उसे रोका जा सकता था.

ईश्वर ने इंसान को दो हाथ और एक दिमाग दिया है, ताकि वह निर्माण करे, विनाश नहीं. इन हाथों का काम घर बनाना, खेत उगाना, बीमारों का इलाज करना और ज्ञान लिखना था- न कि विनाश के बटन दबाना. यह दिमाग तरक्की और भलाई के लिए दिया गया था, तबाही की योजनाएं बनाने के लिए नहीं. जब इन उपहारों का गलत इस्तेमाल होता है, तो उसका परिणाम महिमा नहीं बल्कि बर्बादी होता है.

आज का संघर्ष दिखाता है कि जब शक्ति बुद्धि से बड़ी हो जाती है, जब बदला संयम की जगह ले लेता है और जब घमंड अंतरात्मा की आवाज को दबा देता है, तब क्या होता है. अगर 24वां घंटा अवसर का प्रतीक है, तो 25वां घंटा जवाबदेही का प्रतीक हो सकता है. हम इतिहास के एक नाजुक मोड़ पर खड़े हैं.

तकनीक ने हमें कुछ ही मिनटों में सभ्यता खत्म करने की ताकत दे दी है, लेकिन नैतिक परिपक्वता उतनी तेजी से नहीं बढ़ी. यही असली खतरा है. दुनिया को अब और सैन्य ताकत दिखाने की जरूरत नहीं है. उसे नैतिक साहस की जरूरत है. उसे यह समझने की जरूरत है कि सत्ता अस्थायी है, लेकिन उसके परिणाम लंबे समय तक रहते हैं. हमें उस घड़ी के आने से पहले जागना होगा- क्योंकि अगर हम अब भी नहीं जागे तो 25वां घंटा केवल एक रूपक नहीं रहेगा, बल्कि अंतिम सच बन सकता है.

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