होली: समष्टि चित्त के उल्लास का पर्व
By गिरीश्वर मिश्र | Updated: March 3, 2026 14:10 IST2026-03-03T14:07:58+5:302026-03-03T14:10:09+5:30
उत्साह के साथ होली में एक किस्म का उन्माद का भाव आता है जब हम अपने को भुला कर आनंद का अनुभव करते हैं.

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मनुष्य न केवल समाज बल्कि प्रकृति के साथ भी एकाकार होने की संभावना को तलाशता रहता है. इसी में आनंद मिलता है जो जीवन का प्रयोजन है. होली का उत्सव इसी लौकिक तलाश का एक मूर्त रूप है. होली वसंत में मनाई जाती है जब पूरी सृष्टि में एक साथ उल्लास के बीज का विस्फोट दिखता है. नया रमणीय होता है इसलिए सबके मन को भाता है. नए के लिए मन में उत्सुकता और उमंग होती है. अज्ञात और अनागत का आकर्षण वसंत के आगमन में चतुर्दिक दिखता है. उत्साह के साथ होली में एक किस्म का उन्माद का भाव आता है जब हम अपने को भुला कर आनंद का अनुभव करते हैं.
प्रकृति में परिवर्तन का संदेश राग और अनुराग के कोमल भावों को जीवित करता है. वह यही कहता है कि सालभर जिन सफलताओं और विफलताओं का मीठा-कड़वा अनुभव करते रहे हैं उन सबसे आगे बढ़ कर या परे जाकर जीवन क्रम के नाटक का नया अंक शुरू करें. होली का उत्सव पुराने का आतंक भूल नए चित्र कैनवस पर उकेरने की पुकार लगाता है.
भारत में ऋतुराज वसंत इस दृष्टि से अनोखा और समृद्ध होता है कि इसके आगमन के साथ ही ठंड को किनारे कर प्रकृति अपने सौंदर्य की ऊष्मा का सारा संचित खजाना लुटाने के लिए व्यग्र हो उठती है. वसंत के निजी दूत बने पशु-पक्षी गा कर, तरु, लता, गुल्म, और पादप नव किसलय और पुष्प के साथ सज-धज कर बड़ी मुस्तैदी से इस मस्ती भरी असीम व्यग्रता का डंका बजाते हैं.
वायुमंडल में भी बदलाव आता है और फागुन की मदमाती बयार हर किसी के चित्त को उन्मथित किए देती है. यह सब कमोबेश एक व्यवस्थित क्रम में काल चक्र की निश्चित गति से आयोजित होता है. कुल मिला कर प्रकृति नटी इस बीच कोमल और आकर्षक नया परिधान धारण कर सजती है. खेतों और बाग-बगीचों में विभिन्न रंगों की अद्भुत चित्रकारी देखते बनती है.
बिना किसी व्यतिक्रम के एक सहज स्वाभाविक संगति में ये विविधता भरा जादुई परिवर्तन एक नया उत्साहवर्धक परिदृश्य रच देता है. संक्रामक वसंत सार्वभौमिक सा है, कुछ उसी तरह जैसे जीवन-विस्तार में यौवन की अवस्था स्वाभाविक रूप से आती है. इसी समय बुलबुल और कोयल की मीठी बोली भी आमंत्रण देती है.
प्रवासी पक्षी भी इस बीच हजारों मील दूर साइबेरिया तक से चले आते हैं. वसंत की दस्तक के साथ आंतरिक और बाह्य अस्तित्व में बदलाव की श्रृंखला शुरू होती है. होली सामूहिक उल्लास की ताजगी के साथ व्यष्टि को समष्टि बनाने वाला अवसर है. इस सांस्कृतिक आयोजन पर अब बाजार हावी होता जा रहा है और उत्कंठा और संवेदना के लिए जगह कम होती जा रही है. फिर भी होली अभी भी उद्घोष करती है कि वास्तविक आनंद दूसरे को सुखी करने में ही होता है.