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आमद-ए-रमजान : इंसानियत को राहत दिलाने वाली दुआओं की जरूरत, पढ़ें जावेद आलम का ब्लॉग

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: April 27, 2020 11:13 IST

रमजान चूंकि सवाब लूटने का महीना है, सहरी, रोजा, इफ्तार, तरावीह, कुरआन पढ़ना दुआएं वगैरा इसमें पूरी तन्मयता से की जाती हैं. दूसरे धर्म के लोग जो रमजान की अहमियत जानते व समझते हैं, वे इसमें विशेष दुआओं का आग्रह करते हैं.

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वह पवित्न माह जिसका नाम रमजान-उल-मुबारक है और हर मुसलमान को जिसका बेसब्री से इंतजार होता है, आन पहुंचा. परिस्थितियां बहुत बदली हुई हैं और रमजान-उल-मुबारक का पवित्न माह इस बार कुछ अजीब तरह के हालात में आया है. चूंकि कोरोना जनित लॉकडाउन पहले से चल रहा था, सो इबादत-गुजार बंदे इन हालात में रमजान गुजारने के लिए जेहनी तौर पर तैयार थे. इसलिए रमजान-उल-मुबारक की ज्यादातर इबादतें घरों पर रह कर ही वैयक्तिक रूप से अदा करते हुए इस वबा यानी प्रकोप से पूरी दुनिया को निजात (छुटकारा) देने की खुसूसी दुआएं की जा रही हैं.

जब यह पंक्तियां लिखी जा रही थीं, तब तक यही जानकारी है कि वतने-अजीज (प्रिय देश) की बड़ी मुस्लिम आबादी सारी इबादतें घर में रह कर ही कर रही है. इसमें देश के मुस्लिम संगठनों व संस्थानों का बड़ा योगदान है. फिर चाहे वह दारुलउलूम देवबंद हो, जमीअत उलमा-ए-हिंद या ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, इन्होंने व छोटे-बड़े अनेक संगठनों, संस्थानों ने बहुत पहले से इस बाबत जेहन-साजी शुरू कर दी थी. यह तमाम संगठन, संस्थान ऐसे संदेश दे रहे थे कि जहां-जहां कोरोना का असर है, वहां-वहां प्रशासन के दिशानिर्देश अनुसार ही मस्जिदों में जाएं या सामूहिक इबादतों का इंतजाम करें. अन्यथा सारी इबादतें, दुआएं घरों में ही की जाएं. इसका असर दिख रहा है.

वैसे भी कोविड-19 के कहर की वजह से मस्जिदों सहित दुनिया के ज्यादातर पूजास्थल आमजन के लिए बंद हैं. नियमित इबादतें उनमें बस चुनिंदा लोगों द्वारा की जा रही हैं. इसी तरह लॉकडाउन का पालन करते हुए सऊदी अरब स्थित दो बड़ी इबादतगाहों काबा शरीफ व मस्जिद-ए-नबवी में भी स्टाफ व कुछ स्थानीय लोग ही नमाज अदा कर रहे हैं. पवित्न शहर मक्का स्थित काबा शरीफ अर्थात हरम शरीफ में भी तरावीह कुछ उलमा व चुनिंदा लोग ही पढ़ रहे हैं.

मस्जिद-ए-नबवी के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था की गई है. बताना जरूरी है कि यह दोनों इबादतगाहें ऐसी हैं, जहां इबादत करने का बेहद सवाब बताया गया है. इधर रमजान में भी एक नेकी का सवाब (पुण्य) सत्तर गुना तक बढ़ा दिया जाता है. ऐसे में माहे रमजान की पाक घड़ियां वहां गुजारने की तमन्ना हर इबादत-गुजार बंदे के दिल में होती है. सो हर साल वहां रमजान में इबादतें करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है. लेकिन इस बार लॉकडाउन का असर है, सो दोनों इबादतगाहों में इस वक्त बहुत एहतियात से काम लिया जा रहा है.

गौर हो कि रमजान ऐसा महीना है, जिसका इंतजार खुद अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (स.) को रहता था और आप रमजान से पहले दुआ फरमाते कि ऐ अल्लाह! हमारे रज्जब व शाबान में बरकत अता फरमा और रमजान के महीने तक हमें पहुंचा. रज्जब व शाबान रमजान से पहले आने वाले महीनों के नाम हैं. आप (स.) ऐसी दुआ भी फरमाते जिसका अर्थ निकलता है कि मुङो रमजान के लिए और रमजान को मेरे लिए सही-सालिम रखिए और रमजान को मेरे लिए सलामती के साथ (इबादतों व दुआओं की) कुबूलियत का जरिया बना दीजिए.

रमजान चूंकि सवाब लूटने का महीना है, सहरी, रोजा, इफ्तार, तरावीह, कुरआन पढ़ना दुआएं वगैरा इसमें पूरी तन्मयता से की जाती हैं. दूसरे धर्म के लोग जो रमजान की अहमियत जानते व समझते हैं, वे इसमें विशेष दुआओं का आग्रह करते हैं. जैसे चंद दिन पहले महाराष्ट्र के एक मंत्नी ने मुसलमानों से आग्रह किया कि वे रमजान में कोरोना रूपी इस प्रकोप से हमारे देश को व सारी दुनिया को निजात दिलाने के लिए विशेष दुआएं करें.

जाहिर है कि ऐसा महीना जिसमें अल्लाह तआला विशेष रूप से मेहरबान होता हो, उसमें ऐसी दुआएं की ही जानी चाहिए, जिससे इंसानियत को राहत मिले.

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