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प्रियंका गांधी वाड्रा का ब्लॉग: संघर्ष, संपर्क और संवाद के बिना राजनीति सफल नहीं हो सकती

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: June 13, 2020 07:51 IST

देर शाम जब अजय लल्लू रिहा होकर लौटे, मैंने थोड़ी खिंचाई करते हुए पूछा अब मन शांत हुआ अजय भैया? पुलिस से संपर्क-संवाद कर आए?’ हंसते हुए उन्होंने कहा ‘दीदी सड़क पर तो उतरना ही होगा!’

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उन्नाव रेप कांड, जिसमें बलात्कार पीड़िता को बलात्कारियों ने जिंदा जला दिया, ने हम सबको झकझोर दिया था. जिस परिवार से हम मिलने जा रहे थे उसे हिंसा ने उजाड़ दिया था.

न्याय के लिए उनके संघर्ष और दर्द को हमने वास्तव में महसूस किया था. लेकिन अन्याय देखकर चुप रहना अजय लल्लू की फितरत नहीं है, कहने लगे, ‘‘दीदी, पूरे प्रदेश में आंदोलन खड़ा करना होगा,’’ उन्होंने आह्वान किया, ‘‘संघर्ष, संपर्क और संवाद’’ इनके बिना दीदी, कुछ भी कर लीजिए, राजनीति सफल नहीं हो सकती’’.

कुछ घंटों में हमारा पड़ाव आ गया. चारपाई पर लड़की की भाभी और नौ साल की भतीजी बैठे थे. उम्र से अधिक बूढ़े हो चुके उसके पिता बगल में खड़े थे. बेलगाम भीड़ को देखते हुए मैंने अनुरोध किया कि हम उनकी कोठरी के अंदर चलें और उनकी बात सुनें. लड़की की भाभी परिवार के भयानक अनुभव बता रही थी. हम मौन शर्मिंदा होकर उनकी अकल्पनीय आपबीती सुन रहे थे.

लड़की के पिता चारपाई के एक कोने पर बैठे थे. बहू ने यह बताते हुए अपनी दास्तान खत्म की कि किस तरह उनके खेतों में आग लगा दी गई और जिस कोठरी में हम बैठे थे, उसी में घुसकर उन्हें निर्दयता से पीटा गया.

उसने बताया कि इस सबके बावजूद उनकी निडर लड़की ट्रेन में बैठकर बगल के जिले रायबरेली अकेले जाती थी ताकि वह जिला न्यायालय में अपने केस की सुनवाई में हाजिर रह सके.

यह सुनते ही अचानक लड़की के पिता अपने मुंह पर हाथ रख रोने लगे. अजय लल्लू तुरंत उनके सामने घुटनों पर बैठ गए . लल्लू की आंखों से आंसू छलक आए, ‘‘हम हैं न आपके साथ बाबा,’’ उन्होंने धीमे से कहा, ‘‘हौसला रखो’’.  

जैसे ही हमारा काफिला लखनऊ में दाखिल होने को हुआ, लल्लू कहने लगे कि उन्हें विधानसभा के पास छोड़ दिया जाए, जहां कुछ कार्यकर्ता घटना का विरोध करने के लिए इकट्ठा थे. थोड़ी देर बाद हमें सूचना मिली कि वो गिरफ्तार हो गए हैं.

मैं जहां रुकी थी वहां देर शाम जब वह रिहा होकर लौटे, मैंने थोड़ी खिंचाई करते हुए पूछा अब मन शांत हुआ अजय भैया? पुलिस से संपर्क-संवाद कर आए?’ हंसते हुए कहा ‘दीदी सड़क पर तो उतरना ही होगा!’

पीड़ितों के लिए संघर्ष करने की सर्वोच्च भावना से संचालित, अपने कई सहयोगियों की ड्राइंग रूम राजनीति से असहज और बेबाकी से अपनी बात रखने वाले उप्र कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार ‘लल्लू’ एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके लिए संघर्ष और पीड़ा स्वयं का भोगा हुआ यथार्थ है. उन्नाव जाने के दिन, उन्होंने मुझे बताया कि दिल्ली में वह एक झुग्गी में अन्य मजदूरों केसाथ रहे.

सेवा और सहयोग की नियत से यूपी कांग्रेस ने अपने घरों को पैदल लौट रहे हजारों प्रवासियों की मदद करने के लिए अपनी तरफ से 1000 बसें चलाने का प्रस्ताव उप्र सरकार को दिया. सहयोग और सेवा की भावना से प्रेरित हमारे इस प्रस्ताव से न जाने क्यों उप्र सरकार पहले दिन से ही असहज हो गई. पहले 17 मई को तो उन्होंने हमारे प्रस्ताव को नकार दिया और यूपी की सीमा से 500 बसों को वापस भेज दिया.

18 मई को फिर उन्होंने हमारा प्रस्ताव स्वीकारते हुए बसों के दस्तावेज मांगे. उन्होंने वाहनों की लिस्ट के साथ चालकों-परिचालकों के नाम, बसों की फिटनेस व प्रदूषण प्रमाणपत्र के साथ हमें सिर्फ 10 घंटे का समय देकर सारी बसों को लखनऊ लाने को कहा.  खाली बसों को लखनऊ ले जाना हमें समय और संसाधनों की बर्बादी लगी.

इस पर यूपी सरकार ने तर्क दिया कि 2 घंटे में अपनी बसों को नोएडा और गाजियाबाद की सीमा पर खड़ा करें. इसी बीच सरकार ने भयंकर दुष्प्रचार शुरू करके हम पर फर्जी लिस्ट देने का आरोप लगा दिया. उन्होंने इस तथ्य को नकार दिया कि हमारी 900 बसें आगरा के ऊंचा नगला बॉर्डर और 200 बसें नोएडा के महामाया पुल पर 19 मई की दोपहर से खड़ी थीं. 19 मई की रात अजय लल्लू गिरफ्तार कर लिए गए.  

जब उन्हें लखनऊ पुलिस आगरा से लखनऊ जेल के लिए लेकर निकल रही थी तो मैंने किसी तरह से उनसे फोन पर बात की. इससे पहले कि मैं पूरी बात कह पाती, फोन पर उनकी उत्साह भरी हंसी फूट पड़ी- ‘अरे दीदी, ये दमनकारी सरकार है.

इसके सामने मैं कभी भी सिर नहीं झुकाऊंगा. आप मेरी फिक्र  मत करो’. अगली सुबह उनके ऊपर कई धाराओं में फर्जी मुकदमे लाददिए गए.

अजय लल्लू उस भारत के सच्चे नागरिक हैं जिसके लिए महात्मा गांधी ने लड़ाई लड़ी थी. वे इंसाफ के हकदार हैं. उनके साथ न्याय होना चाहिए.

टॅग्स :प्रियंका गांधीराजनीतिक किस्सेइंडिया
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