अभी भी खत्म नहीं हुआ है रेडियो का आकर्षण

By उमेश चतुर्वेदी | Updated: February 13, 2026 07:13 IST2026-02-13T07:10:59+5:302026-02-13T07:13:18+5:30

विश्व रेडियो दिवस के मौके पर कम से कम भारतीय परिदृश्य में इस बारे में सोचा और समझा जाना चाहिए.

world radio day The charm of radio is still not over | अभी भी खत्म नहीं हुआ है रेडियो का आकर्षण

अभी भी खत्म नहीं हुआ है रेडियो का आकर्षण

आज के डिजिटल और इंटरनेट के दौर में भी रेडियो न सिर्फ जिंदा है, बल्कि प्रमुख संचार, संवाद और मनोरंजन के माध्यम के तौर पर प्रासंगिक बना हुआ है. हालांकि इंटरनेट की प्रभावी उपस्थिति के पहले इस माध्यम का एक स्वर्ण युग भी रहा है. तब पारंपरिक ट्रांजिस्टर सेटों के जरिए वह खेत-खलिहानों से लेकर नदी के बीच हिलकोर मारती नावों, समंदर से लेकर पहाड़ों तक हर जगह इसकी मौजूदगी थी. यह बात और है कि रील्स के प्रति बढ़ते आकर्षण ने रेडियो के सामने उसके अस्तित्व के लिए चुनौती पेश कर दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि रेडियो अतीत की तरह प्रभावी, अत्यधिक प्रासंगिक और उपयोगी कैसे बना रह सकता है. विश्व रेडियो दिवस के मौके पर कम से कम भारतीय परिदृश्य में इस बारे में सोचा और समझा जाना चाहिए.

समय के साथ रेडियो ने खुद को भी बदला है. अब यह सिर्फ पुराने ट्रांजिस्टर सेटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आधुनिक स्मार्ट स्पीकर, मोबाइल ऐप्स और इंटरनेट स्ट्रीमिंग के माध्यम से भी दुनिया के हर कोने में अपनी मौजूदगी बनाए हुए है. ड्राइविंग करते समय समाचार, संगीत और मनोरंजन के लिए रेडियो अभी भी सबसे लोकप्रिय माध्यम है. रेडियो की मौजूदगी के लिए अत्यधिक स्थानीय विषयवस्तु भी बड़ा माध्यम बनी है.  स्थानीय खबरों, मौसम की जानकारी और स्थानीय भाषा में जितने कार्यक्रम सार्वजनिक रेडियो यानी आकाशवाणी पर हैं, उतना न तो इंटरनेट पर है और न टेलीविजन में.

भारत में रेडियो स्टेशनों की कुल संख्या लगभग डेढ़ हजार है, जिनमें सार्वजनिक यानी आकाशवाणी के साथ ही निजी और सामुदायिक रेडियो शामिल हैं. जुलाई 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में आकाशवाणी से 585 एफएम स्टेशन और 591 सामान्य स्टेशन काम कर रहे हैं.

 आकाशवाणी का नेटवर्क देश की करीब 99.2 प्रतिशत जनसंख्या तक पहुंच रखता है. इसके साथ ही देश के 112 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन सक्रिय हैं. अगस्त 2024 तक के आंकड़ों के हिसाब से देश में 500 सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित हो चुके थे, जिनके जरिए विशेषरूप से किसानों, जनजातीय क्षेत्रों और स्थानीय समुदायों के लिए प्रसारण हो रहे हैं.

इतना विशाल नेटवर्क होने के बावजूद पारंपरिक रेडियो प्रसारण और उसे सुनने को लेकर दिलचस्पी घटी है. अगर रेडियो को भारत में और ज्यादा प्रासंगिक होना है तो उसे पश्चिम विशेषकर अमेरिकी और ब्रिटिश रेडियो प्रसारण मॉडल से प्रेरणा लेनी होगी. अमेरिका, ब्रिटेन आदि पश्चिमी देशों में रेडियो ट्रैफिक में सुना जाने वाला माध्यम बन चुका है. इसकी वजह है रेडियो की अपनी तकनीकी सहूलियत.  पश्चिमी देशों में रेडियो सबसे ज्यादा ट्रैफिक में ही सुना जा रहा है. इसके चलते वहां के रेडियो ने ट्रैफिक में फंसे या उससे गुजर रहे लोगों के मानस और जरूरतों के लिहाज से विशेष प्रोग्रामिंग शुरू की है

Web Title: world radio day The charm of radio is still not over

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