महिलाओं की सुरक्षा ही उनका असली सम्मान

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 13, 2026 07:35 IST2026-03-13T07:34:30+5:302026-03-13T07:35:15+5:30

यह बेहद चिंताजनक है, क्योंकि मुख्यमंत्री और अन्य राजनेता सिर्फ  वोट के भूखे हैं. वे लड़कियों और महिलाओं को सुरक्षा देना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं.

women safety is their true respect | महिलाओं की सुरक्षा ही उनका असली सम्मान

महिलाओं की सुरक्षा ही उनका असली सम्मान

अभिलाष खांडेकर

इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित विविध गतिविधियों को मैं गहनता से देख रहा  था. प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित महिला दिवस विश्व के कई हिस्सों में मनाया जाता है. इस दिन विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए, भारत में सामाजिक संगठनों द्वारा महिलाओं को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया.

वर्ष 1975 में जब यह दिवस मनाने की औपचारिक शुरुआत हुई, तो इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से ‘दुनिया की आधी आबादी’ को उसका लंबे समय से लंबित हक दिलाना था. हालांकि भारत में इंदिरा गांधी लगभग एक दशक तक प्रधानमंत्री रहीं, फिर भी राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं के लिए आरक्षण की तब शुरुआत नहीं हुई थी. सुचेता कृपलानी भी 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन चुकी थीं, जो भारत का सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है.

मैंने कुछ प्रसिद्ध स्तंभकारों के लेख उत्सुकतापूर्वक पढ़े और 8 मार्च को राजनेताओं द्वारा महिलाओं को दिए गए शुभकामना संदेशों पर गौर किया. कुछ ने रोजगार के अवसरों की बात की तो कुछ ने समानता की मांग की, वहीं पंजाब और असम के मुख्यमंत्री भगवंत मान और हिमंता बिस्वा सरमा सहित राजनेता ‘लाडली बहना’ योजना के नए संस्करणों की घोषणा करते हुए खुश थे, जो राज्य के खजाने को खाली कर रही है.

वोट बटोरने वाली इन मुफ्त योजनाओं की समाज के सभी वर्गों, विशेषकर अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों द्वारा कड़ी आलोचना की गई है. सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, लेकिन इन्हें बंद करने से परहेज किया जा रहा है. मध्यप्रदेश में भाजपा ने 2023 में अनपेक्षित जीत दर्ज की थी जो निश्चित रूप से शिवराज सिंह चौहान द्वारा असम के अनुकरण से शुरू की गई नगद सहायता योजना के कारण थी.

अब मोहन यादव के नेतृत्व में, ( वे अपने पूर्ववर्ती चौहान के पार्टी के भीतर के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं), मध्यप्रदेश को भारी कर्जग्रस्त होने के बावजूद, महिलाओं के प्रति अधिक उदार राज्य के रूप में देखा जा रहा है. राज्य का खजाना पहले कभी इतना दबाव में नहीं था. मार्च 2026 में यादव सरकार ने 5800 करोड़ रुपए का कर्ज लिया, जो वित्त वर्ष 2025-26 में लिए गए कर्ज की 19वीं  किश्त हैै. इससे मध्यप्रदेश का कुल कर्ज बढ़कर 5 लाख 66 हजार करोड़ रुपए हो गया है. सरकार को ब्याज समेत इसे चुकाने में कितने साल लगेंगे, इसका अनुमान लगाना असंभव है. पुराने समय में मुख्यमंत्री कर्ज लेने से कतराते थे.

खैर, मैं उन लेखकों से निराश हुआ  जिन्होंने समाज में महिलाओं की समानता आदि के बारे में अन्य मुद्दों के साथ ही विस्तार से बात की. फिर इतनी निराशा क्यों? दरअसल महिलाओं के अधिकारों के पैरोकारों द्वारा लिखे गए किसी भी लेख या राजनेताओं के उन वादों में से किसी ने भी, जिन पर मेरी नजर पड़ी, महिलाओं के लिए जरूरी सुरक्षा के बारे में गंभीरता से बात नहीं की.

अपने-अपने राज्यों की महिलाओं का ‘स्वागत-सम्मान’ करने वाले राजनेताओं ने किसी न किसी रूप में नगद सहायता देना तो उचित समझा, लेकिन अपनी ‘बहनों’ की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं बताए. वे राज्य सरकार के धन को बांटकर संतुष्ट रहे, जाहिर तौर पर चुनावों और मुफ्त सहायता के जरिये मिलने वाले वोटों को ध्यान में रखते हुए.

इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय समाज में महिलाओं और लड़कियों को पहले से कहीं अधिक सुरक्षा की जरूरत है. बलात्कार, अपहरण, मानव तस्करी और घरेलू हिंसा जैसे अपराध पूरे भारत में लगभग हर दिन बढ़ रहे हैं. देश का कोई भी शहर उन महिलाओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाता, जिनके साथ हमने इस महीने की शुरुआत में महिला दिवस पर जश्न मनाया है. यह बेहद चिंताजनक है, क्योंकि मुख्यमंत्री और अन्य राजनेता सिर्फ  वोट के भूखे हैं. वे लड़कियों और महिलाओं को सुरक्षा देना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं.

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) के विश्वसनीय माने जाने वाले आंकड़ों से पता चलता है कि हाल के वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगभग पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

सरकार ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) को लागू किया और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए दंडात्मक प्रावधान किए, लेकिन ‘एनसीआरबी’ के आधिकारिक आंकड़े वास्तविक स्थिति नहीं दर्शाते क्योंकि इनमें केवल पंजीकृत अपराध ही शामिल हैं.

पुलिस में दर्ज न किए गए अपराध किसी भी सर्वेक्षण या आधिकारिक आंकड़ों में शामिल नहीं होते हैं. अच्छी राजनीतिक व्यवस्था से ऐसे अपराधों के प्रति अधिक संवेदनशील होने की अपेक्षा की जाती है. दिल्ली,  हरियाणा उत्तर में और दक्षिण में तेलंगाना जैसे राज्य महिलाओं के खिलाफ अपराधों में सबसे आगे हैं – चाहे वह कार्यस्थल पर उत्पीड़न हो, उनकी गरिमा पर हमला हो या पतियों द्वारा घरेलू हिंसा.

यदि 8 मार्च महिलाओं को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता, तो अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को इतने धूमधाम से मनाने का क्या अर्थ है? हम किसे मूर्ख बना रहे हैं?

मध्यप्रदेश विधानसभा को हाल ही में बताया गया कि राज्य से औसतन प्रतिदिन 130 महिलाएं लापता हो रही हैं और उनका कोई पता नहीं चल पा रहा है. वर्ष 2020 से जनवरी 2026 के बीच कुल 274311 महिलाएं और बालिकाएं लापता दर्ज की गई हैं.

क्या यह हमारे देश के लिये शर्म की बात नहीं है कि राजनेता लोग अपनी ‘बहनों’ की रक्षा नहीं कर सकते लेकिन उनके वोट हर हाल में चाहते हैं?

Web Title: women safety is their true respect

भारत से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे