निजी स्कूलों की तरह प्रतिष्ठित क्यों नहीं बन पा रहे सरकारी स्कूल?
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 12, 2026 05:30 IST2026-03-12T05:30:38+5:302026-03-12T05:30:38+5:30
महाराष्ट्र सरकार ने 12 फरवरी 2026 को एक नया सरकारी आदेश जारी कर आरटीई प्रवेश के लिए नए नियम लागू किए थे, जिसके अनुसार छात्र अपने घर से एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूलों में ही प्रवेश ले सकता था और केवल दस स्कूलों का ही चयन कर सकता था.

सांकेतिक फोटो
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत प्रवेश के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा लगाई गई एक किलोमीटर की शर्त पर बंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ द्वारा रोक लगाने के बाद अब आईटीई आवेदन के लिए समयसीमा 18 मार्च तक बढ़ा दी गई है. इससे जो अभिभावक एक किमी की शर्त के कारण आवेदन नहीं कर पाए थे, उन्हें राहत मिल सकेगी.
दरअसल महाराष्ट्र सरकार ने 12 फरवरी 2026 को एक नया सरकारी आदेश जारी कर आरटीई प्रवेश के लिए नए नियम लागू किए थे, जिसके अनुसार छात्र अपने घर से एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूलों में ही प्रवेश ले सकता था और केवल दस स्कूलों का ही चयन कर सकता था.
अब हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है, जिससे आवेदकों को पहले की तरह तीन किलोमीटर के दायरे के स्कूलों में आवेदन की अनुमति मिल सकेगी. हाईकोर्ट ने आवेदन के लिए तीन दिन की समय सीमा बढ़ाने का आदेश दिया था लेकिन शिक्षा विभाग ने इसे बढ़ाकर आठ दिन अर्थात 18 मार्च तक कर दिया है.
अच्छी स्कूलों में अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना निश्चित रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों का भी अधिकार है. चूंकि अच्छी शिक्षा देने वाले महंगे निजी स्कूलों में निर्धन लोग अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं, इसलिए आरटीई अर्थात शिक्षा का अधिकार अधिनियम ऐसे लोगों के लिए वरदान साबित होता है,
क्योंकि निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों के अंतर्गत उन्हें नि:शुल्क मिलने वाली पूरी शिक्षा का खर्च सरकार उठाती है. सवाल यह है कि खर्च जब सरकार को ही उठाना पड़ता है तो क्या सरकारी स्कूलों की शिक्षा के स्तर को इतना ऊंचा नहीं उठाया जा सकता कि लोग निजी के बजाय सरकारी स्कूलों में ही अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए लालायित हों?
आखिर आईआईटी, एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों में प्रवेश पाने का सपना हर विद्यार्थी देखता है, फिर स्कूल स्तर की पढ़ाई में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में सरकारी स्कूल क्यों नाकाम रहते हैं? ऐसा भी नहीं है कि ऐसे स्कूलों लिए फंड की कमी होती हो, निजी स्कूलों से तो सरकारी स्कूलों के शिक्षक ज्यादा ही वेतन पाते हैं, फिर क्यों लोगों में निजी स्कूलों में ही अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने की होड़ लगी रहती है?
लोगों के बुनियादी अधिकारों में शिक्षा पाने का अधिकार भी शामिल है और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना सरकारों का कर्तव्य है. अगर सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों के समान प्रतिस्पर्धी बनाने के सुनियोजित प्रयास किए जाएं तो उन्हें निजी स्कूलों के समान प्रतिष्ठित बनाना असंभव नहीं है.