मलयालम को ताकतवर बनाने के बावजूद क्यों उठ रहे सवाल ?
By उमेश चतुर्वेदी | Updated: March 13, 2026 07:38 IST2026-03-13T07:38:39+5:302026-03-13T07:38:43+5:30
लेकिन दिलचस्प यह है कि केरल के विद्वान भी इस कानून के पक्ष में तर्क देते वक्त केंद्र सरकार पर केरल में हिंदी थोपने का आरोप लगाने से नहीं हिचक रहे.

मलयालम को ताकतवर बनाने के बावजूद क्यों उठ रहे सवाल ?
केरल का नाम केरलम किए जाने और इसके हफ्तेभर बाद ही मलयालम को राज्य की आधिकारिक भाषा की मंजूरी मिलने को कुछ लोग संयोग बता सकते हैं, लेकिन यह महज संयोग नहीं है. राज्य में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने की औपचारिकता भर बाकी है. इस संदर्भ में राजनीतिक दलों द्वारा इन दोनों कदमों का श्रेय लेने की होड़ मचना स्वाभाविक है. लेकिन भाषा विधेयक को लेकर केरल की सीमाओं के बाहर सवाल भी उठने शुरू हो गए हैं.
इसमें दो राय नहीं कि गैरहिंदीभाषी इलाके अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को अपनी अस्मिता से जोड़कर देखते हैं. हिंदीभाषी राज्यों में अपनी हिंदी या स्थानीय भाषाओं को लेकर ऐसी सोच नहीं दिखती.
मलयालम को केरल की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग बहुत पुरानी है. इस दिशा में पहला प्रयास करीब दस साल पहले कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा यानी यूडीएफ की सरकार ने किया था. 2015 में ओमन चांडी सरकार ने इस विधेयक को पारित कराया था. लेकिन तब इस विधेयक पर पड़ोसी कर्नाटक सरकार ने कड़ा एतराज जताया था.
जब इस विधेयक को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा गया तो राष्ट्रपति ने इसे 1963 के ऑफीशियल भाषा एक्ट के नियमों को हटाकर जमा करने के सुझाव के साथ वापस भेज दिया था. फिर दस साल बाद मौजूदा वाममोर्चा की सरकार ने इसे नए रूप में पारित किया. इस बार भी कर्नाटक इस कानून का विरोध कर रहा है.
भाषायी अस्मिता के लिहाज से देखें तो केरल का यह कदम बेहद क्रांतिकारी और भारतीय भाषाओं के हित में है. लेकिन कर्नाटक की आपत्तियों को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. यहां ध्यान दिया जाना चाहिए कि केरल के कासरगोड जिले में मलयालम की बजाय कन्नड़ भाषी लोग ज्यादा है. राज्य में इसी तरह तमिल, तुलु, गुजराती और कोंकणीभाषी लोग भी हैं. उनकी अपनी भाषाओं में पढ़ाई वाले स्कूल भी हैं. हालांकि मलयालम भाषा कानून का विरोध तमिल मूल के लोगों ने तो नहीं किया है, लेकिन कर्नाटक सरकार का तर्क है कि यह कानून केरल में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों की भाषाई अस्मिता के लिए खतरा है.
कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण का तर्क है कि कासरगोड और केरल के दूसरे कन्नड़ भाषी क्षेत्रों में भाषाई अल्पसंख्यक छात्र अभी स्कूलों में कन्नड़ को पहली भाषा के तौर पर पढ़ते हैं. केरल में स्कूलों में हिंदी भी पढ़ाई जाती रही है. इसलिए माना जाता है कि केरल में हिंदीविरोधी माहौल नहीं है. लेकिन दिलचस्प यह है कि केरल के विद्वान भी इस कानून के पक्ष में तर्क देते वक्त केंद्र सरकार पर केरल में हिंदी थोपने का आरोप लगाने से नहीं हिचक रहे. दिलचस्प यह है कि ऐसा ही आरोप कर्नाटक की ओर से लगाया जा रहा है, बस वहां हिंदी की जगह मलयालम को थोपे जाने की बात हो रही है.
मातृभाषा से इतर समूहों से आने वाले लोग किसी भी भाषा को अवसरों और जरूरत के लिहाज से सीखते हैं. सीखने की इस प्रक्रिया में मजबूरी की बजाय उत्साह जुड़ जाता है तो भाषाएं समृद्ध होती हैं और वे सौहार्द का प्रतीक बनती हैं. आधिकारिक भाषा बनने के बाद मलयालम भी उसी तरह उम्मीद की भाषा बने, शायद यही केरल के बौद्धिक चाहते हैं. मलयालमभाषियों की इस सोच से हिंदीभाषी विद्वानों, राजनेताओं और प्रशासनिक तंत्र को प्रेरित होना चाहिए.