विजय दर्डा का ब्लॉगः आजादी का जज्बा हमारी रगों में फड़कना चाहिए

By विजय दर्डा | Updated: March 15, 2021 14:06 IST2021-03-15T14:03:25+5:302021-03-15T14:06:42+5:30

1930 के दांडी मार्च की याद में 386 किलोमीटर के लंबे सफर पर एक और दांडी मार्च निकला है. यह महोत्सव पचहत्तरवीं वर्षगांठ पूरी करने के बाद 15 अगस्त 2023 तक चलेगा.

vijay darda blog spirit freedom should burst our veins complete 75 years of independence on 15 August 2022 | विजय दर्डा का ब्लॉगः आजादी का जज्बा हमारी रगों में फड़कना चाहिए

भारत की आजादी इस मायने में भी बहुत महत्वपूर्ण है. (file photo)

Highlightsजाहिर सी बात है कि हम सबकी जिंदगी का यह अत्यंत महत्वपूर्ण महोत्सव है. अमृत महोत्सव हम ऐसा मनाएं कि दुनिया दंग रह जाए! दुनिया के 50 से ज्यादा देशों को शांति और अहिंसा के मार्ग से आजादी की राह दिखाई.

15 अगस्त 2022 को हमारा देश आजादी के 75 साल पूरे करने जा रहा है. इसके ठीक 75 सप्ताह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साबरमती से आजादी के अमृत महोत्सव का शुभारंभ किया है.

1930 के दांडी मार्च की याद में 386 किलोमीटर के लंबे सफर पर एक और दांडी मार्च निकला है. यह महोत्सव पचहत्तरवीं वर्षगांठ पूरी करने के बाद 15 अगस्त 2023 तक चलेगा. जाहिर सी बात है कि हम सबकी जिंदगी का यह अत्यंत महत्वपूर्ण महोत्सव है. यह अमृत महोत्सव हम ऐसा मनाएं कि दुनिया दंग रह जाए!

भारत की आजादी इस मायने में भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने दुनिया के 50 से ज्यादा देशों को शांति और अहिंसा के मार्ग से आजादी की राह दिखाई. संघर्ष का जज्बा दिया. इस मार्ग से ज्यादातर अफ्रीकी देशों ने आजादी हासिल भी की. दुर्भाग्यवश आज भी बहुत से देश गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए हैं.

आजादी की चाहत को बयां करने वाली एक तिब्बती पत्रकार की एक छोटी सी रिपोर्ट मैंने किसी विदेशी अखबार में पढ़ी थी और मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे. ओलंपिक्स को कवर करते हुए उस पत्रकार ने लिखा था-‘दुनिया भर की टीमें अपने देश का झंडा लिए सामने से गुजर रही हैं. उनके देश के लोग तालियों से उनका स्वागत कर रहे हैं. मैं भी ताली बजाना चाहता हूं लेकिन कैसे बजाऊं? यहां हमारा देश तो है ही नहीं!’

वाकई यदि आजादी नहीं है तो कुछ भी नहीं है. हम अपने देश में बैठ कर समझ ही नहीं पाते कि आजादी कितनी मूल्यवान है क्योंकि हम स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा नहीं रहे हैं. जब मैं चीन में गया, जब मैं रूस गया, पोलैंड पहुंचा तब मुङो समझ में आया कि आजादी क्या होती है. उनकी जिंदगी में आवश्यक सुख-सुविधाएं भी नियंत्रित हैं. आजादी की तो बात बहुत दूर की है.

आजादी महसूस करने के लिए चीन के लोग हांगकांग या अमेरिका या फिर दूसरे देश जाते हैं. रूस के लोग कहीं और जाते हैं. वहां भी उनके देश की खुफिया एजेंसियां उन पर नजर रख रही होती हैं. अब देखिए न! चीनी सरकार ने अपने देश के बिजनेस टायकून और अलीबाबा के मालिक  जैक मा की क्या हालत कर दी है! उनकी आवाज कुचल दी गई है और इस तरह उलझा दिया गया है कि वे तबाह हो जाएं.

ऐसे तानाशाही वाले देशों में बिन जल के मछली की तरह तड़पते रहते हैं वहां के लोग. उनके सामने बस एक ही शब्द है- यस सर! अपनी तानाशाह सरकार के सामने अपनी बात भी नहीं रख सकते. अब म्यांमार की हालत ही देखिए! तीस साल के लंबे संघर्ष के बाद सैन्य तानाशाही से आधी-अधूरी आजादी तो मिली लेकिन सेना ने फिर सत्ता हथिया ली! आज लोगों को फिर से संघर्ष करना पड़ रहा है.

अपने पड़ोसी पाकिस्तान की हालत हम देख ही रहे हैं. वहां के लोग लोकतंत्र के लिए कैसे तड़प रहे हैं, तिलमिला रहे हैं, कैसा संघर्ष कर रहे हैं! मन ही मन में सोच रहे हैं कि काश मैं हिंदुस्तान में होता! आप देख ही रहे हैं कि थाईलैंड में क्या स्थिति है. आजादी के लिए लोग जूझ रहे हैं.

इसे इस रूप में समझिए कि पैसा होना और चोरी का पैसा होना या खुद के नाम पर घर होना और किसी दूसरे के नाम पर घर होने में बहुत फर्क है. आजादी का कोई विकल्प नहीं होता! मेरे बाबूजी जवाहरलाल जी दर्डा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. उन्होंने अंग्रेजों का जुल्म सहा था. जेल में रहे थे. उनसे मैंने स्वतंत्रता संग्राम की बहुत सी कहानियां सुनीं और जाना कि लोगों ने किस तरह अपनी जान तक न्यौछावर कर दी ताकि आने वाली पीढ़ी गुलाम न रहे. वास्तव में आज हमारे पास जो कुछ भी है वह हमारी आजादी की ही देन है.

यदि आजादी नहीं होती तो बोलने का हक भी कहां होता हमारे पास? क्या लोग ये बोल पाते कि हमारे पास कपड़ा नहीं है, मकान नहीं है, रोटी नहीं है, बोलने का अधिकार नहीं है, लिखने का अधिकार नहीं है, विरोध करने का अधिकार नहीं है, हमारे पास शिक्षा का अधिकार नहीं है, हमारे पास खाने का अधिकार नहीं है, जानने का अधिकार नहीं है! और गुलामी में ये अधिकार मिलते भी नहीं!

ये सारी चीजें आजादी के इर्दगिर्द घूमती हैं. ..और जो लोग यह कहते हैं कि गांधीजी ने क्या किया? पंडित नेहरू ने क्या किया? इंदिरा गांधी या  राजीव गांधी ने क्या किया तो उनके लिए बता दूं कि इसका बड़ा अच्छा जवाब अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया था. उन्होंने कहा था - ‘यदि कोई कह रहा है कि सबकुछ मैं ही कर रहा हूं तो बिल्कुल झूठ है ये!’

आजादी लाने के लिए जिन लोगों ने बलिदान दिया और उसके बाद इस देश को बनाने में जिन लोगों ने अपनी आहुति दी उनमें सभी लोग शामिल हैं. उनमें नेहरूजी से लेकर अटलजी  और अब मोदीजी तक शामिल हैं. हमें जब आजादी मिली थी तब हमारे देश के पास कुछ भी नहीं था. विकास के इस रास्ते में सभी नेतृत्वकर्ताओं के प्रति हमें ऋणी होना चाहिए चाहे वे किसी भी दल के क्यों न रहे हों.

हमारे शीर्ष नेताओं ने राष्ट्र के लिए जो बलिदान दिया, उसे भुलाया नहीं जाना चाहिए. न ही कुप्रचार होना चाहिए और न ही तथ्यों को तोड़-मरोड़ा जाना चाहिए. नई पीढ़ी है, हमारा भविष्य है और उसे सत्य से अवगत कराना हमारा दायित्व है. ध्यान रखिए कि किसी भी राष्ट्र की बुनियाद सच्चई, सभ्यता, संस्कृति और निष्ठा पर खड़ी होनी चाहिए.

उसमें किसी भी प्रकार का तोड़-मरोड़ किसी भी संस्कृति के लिए मान्य नहीं है. ..और अब जो यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने क्या किया तो  मैं आपको बता दूं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या अटल बिहारी वाजपेयी का कभी यह सिद्धांत नहीं रहा कि राजनीतिक दल खत्म हो जाने चाहिए या राजनीतिक आवाज बंद हो जानी चाहिए. वो जमाना था जब पंडितजी विरोधी पक्ष के लोगों को चुनकर लाते थे क्योंकि उनका मानना था कि लोकतंत्र को जिंदा रखना है तो विपक्ष अत्यावश्यक है.

मेरा मानना है कि आप मंदिर जरूर  बनाइए लेकिन एक बात मत भूलिए कि इस देश में जितना अधिकार मंदिर में जाने वालों का है उतना ही अधिकार स्तूप में जाने वाले बौद्धों का, गुरुद्वारा में जाने वाले सिखों का है, उतना ही अधिकार मस्जिद में जाने वाले मुसलमानों का, गिरजाघर में जाने वाले ईसाइयों का और  जिनालय में जाने वाले जैनियों का भी है.

भारतीय होने के अधिकार के मामले में संख्या का मतलब ही नहीं है. विविधता में एकता ही हमारी शक्ति है. इसी कारण दुनिया हमें आश्चर्य से देखती है. इतना बड़ा देश, इतनी सारी भाषाएं, इतनी सारी सभ्यताएं, इतने सारे रीति-रिवाज, इसके बाद भी एक देश! वाकई  दुनिया का कोई और देश इतनी विविधताओं से भरा हुआ नहीं है लेकिन दुख होता है जब मैं एकता को खंडित करने वाली कट्टरवादी ताकतों को बेलगाम देखता हूं. सोचता हूं इन्हें कुचलने में देर हो गई तो? ..सबकुछ गंवा कर होश में आए तो क्या हुआ!  

दोस्तों हमें विविधता में एकता की अपनी ताकत को समझने की जरूरत है. भीतरी तौर पर कमजोर पड़ेंगे तो दुश्मनों को मौका मिलेगा. किसी को ऐसा अवसर हम दें ही क्यों? और हां, आजादी का जज्बा हमारी रगों में फड़कना चाहिए. जय हिंद!

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