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विजय दर्डा का ब्लॉग: सचिन के भारत रत्न से क्या कांग्रेस को वोट मिले?

By विजय दर्डा | Updated: December 20, 2021 08:21 IST

प्राचीनता और विद्वता का संगम है बनारस, काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर को लेकर एक अलग नजरिया....

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पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का लोकार्पण कर रहे थे तब मेरी नजरों के सामने बनारस की गलियां थीं, कल-कल बहती निर्मल गंगा थीं और बाबा विश्वनाथ के दरबार में सुबह-सुबह रुद्राभिषेक का अद्भुत नजारा था. 

पिछले महीने के मध्य में मैं पहले राजभाषा सम्मेलन में भाग लेने के लिए बनारस गया था. गंगा आरती का वो नयनाभिराम दृश्य अब भी मेरे जेहन में महफूज है. एक पूरी शाम गंगा की गोद में मैंने नाव की सवारी की थी और बनारस के चटपटे चाट का लुत्फ उठाया था. कोहरे में लिपटी भोर में भोलेनाथ का अभिषेक करने पहुंचा था.

मैं बनारस पहले भी कई बार गया हूं लेकिन इस बार की यात्रा का सुखद पक्ष मैं काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर को मानता हूं. जहां कभी इतनी संकरी गलियां थीं कि कंधे से कंधा टकराता था वहां अब इतना चौड़ा मार्ग कि रैली निकल जाए! कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि अतिक्रमण से काशी विश्वनाथ मंदिर कभी मुक्त हो पाएगा! मैंने बनारस के घाटों को पहली बार सुसज्जित देखा. 

कह सकता हूं कि बनारस का एक नया स्वरूप मेरे सामने था. वाकई बहुत मीठी यादें लेकर बनारस से लौटा. काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लोकार्पण समारोह ने उन यादों को ताजा कर दिया. प्रधानमंत्री के शब्दों से मैं बिल्कुल सहमत हूं कि काशी शब्दों का विषय नहीं, संवेदनाओं की सृष्टि है. काशी में जागृति ही जीवन है और मृत्यु भी मंगल है. 

पुराणों में बिल्कुल सही कहा गया है कि जैसे ही कोई काशी में प्रवेश करता है, सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है. भगवान विश्वेश्वर का आशीर्वाद और एक अलौकिक ऊर्जा यहां आते ही हमारी अंतर-आत्मा को जागृत कर देती है. ये सब केवल कहने की बातें नहीं हैं बल्कि आपके भीतर थोड़ी सी आध्यात्मिकता यदि हो तो बनारस की हवा में आप ये सब महसूस कर सकते हैं. 

यह शहर नहीं बल्कि पूरा का पूरा एक मिजाज है जहां भारत की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत की भीनी-भीनी सी खुशबू तैरती रहती है. स्वाभाविक तौर पर ज्यादातर लोग बनारस को धार्मिक नजरिये से देखते हैं. उन्हें देखना भी चाहिए क्योंकि काशी के कण-कण में आस्था विराजित है. लेकिन मैं इस पवित्र शहर को धार्मिक आस्था से आगे बढ़कर इसकी आध्यात्मिकता, पौराणिकता और सांस्कृतिक विरासत के स्वरूप को देखता हूं. 

बनारस की बात चलते ही मुझे कबीर की वाणी याद आती है तो बिस्मिल्ला खां की शहनाई कानों में गूंज उठती है. पंडित छन्नूलाल मिश्र के स्वर झंकृत कर देते हैं तो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की वैचारिक आभा से मैं आलोकित हो उठता हूं. प्रख्यात उपन्यासकार काशीनाथ सिंह की ‘काशी का अस्सी’ के पात्र भीतर तक भूचाल मचा देते हैं.

कहते हैं कि बनारस तो बाबा भोलेनाथ के त्रिशूल पर बसा हुआ है. यह आस्था का मामला है लेकिन उत्तर भारत की जिंदगी को पालने वाली गंगा तो हमारे सामने हैं जो इस पुरातन शहर से गुजरते हुए अपनी धारा मोड़ लेती हैं. क्या यह किसी भौगोलिक चमत्कार से कम है? कुछ तो जरूर है इस शहर में जो इसे दूसरे शहरों से बिल्कुल अलग मिजाज वाला बनाता है. भोलेनाथ जैसा बिल्कुल भोला-भाला लेकिन उनके नाम के अनुरूप नृत्य, संगीत, ज्ञान और विज्ञान से भरा हुआ. ऐसे काशी विश्वनाथ धाम को अतिक्रमण से मुक्त करके कॉरिडोर का निर्माण किया गया है तो यह सनातन संस्कृति का सम्मान है, भारत की प्राचीनता और परंपरा के प्रति आदर भाव है.

कुछ लोग कह रहे हैं कि यूपी चुनाव के मद्देनजर इस कॉरिडोर के पहले चरण का शुभारंभ किया गया है ताकि हिंदुओं के वोट मिलें. संभव है कि ऐसे राजनीतिक विचार हों भी लेकिन ध्यान रखिए कि इस देश का वोटर बहुत जागृत है. वह बहुत सोच समझकर मतदान करता है. मैं आपको एक पुरानी बात याद दिलाता हूं. 

कांग्रेस के समय में जब सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिया गया था तब भी कुछ लोगों ने कहा था कि युवाओं को लुभाने के लिए ऐसा किया गया है लेकिन क्या युवाओं ने कांग्रेस को वोट दिया? तो इस तरह से कोई वोटर प्रभावित नहीं होता. अपने वोटर पर भरोसा रखिए! कॉरिडोर वक्त की जरूरत थी. उसे पर्यटन और शहर के विकास के तौर पर देखिए. 

बनारस के विकास से केवल हिंदुओं का फायदा नहीं होगा हर धर्म और हर आस्था के लोगों को रोजगार मिलेगा. जो लोग बनारस के समरस समाज को जानते हैं उन्हें पता है कि फूल-पत्ती से लेकर पूजन सामग्री के व्यापार और गंगा में नाव खेने में अलग-अलग धर्मो के, अलग-अलग रंगों के लोग लगे हुए हैं. बीएचयू के साथ हिंदू शब्द लगा है लेकिन वहां दूसरे धर्मो के लोग भी तो पढ़ते हैं.

हमारे हिंदुस्तान की यही तो खासियत है कि यह मजहब से नहीं बल्कि अपने संविधान से चलता है. सर्वधर्म समभाव हमारी रगों में है. पिछले सप्ताह जब आपके प्रिय लोकमत के नागपुर संस्करण ने 50 साल पूरे किए तो मैंने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, बौद्ध आराधना स्थल से लेकर जैन मंदिर जाकर नमन किया क्योंकि लोकमत के पितृपुरुष हमारे बाबूजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जवाहरलाल दर्डा ने हमें हर धर्म के प्रति सम्मान की बात सिखाई. 

आज लोकमत एक गुलदस्ते की तरह है जहां हर धर्म के लोग पत्रकारिता की पवित्रता के एक लक्ष्य के साथ काम करते हैं. इसलिए मैं हमेशा कहता हूं कि नजरिया बहुत महत्वपूर्ण है. लक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण है. एकता बहुत महत्वपूर्ण है. हम एक हैं तो दुनिया की कोई ताकत हमें झुका नहीं सकती.

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