तकनीक के जरिये मातृभाषाओं को बचाने की जरूरत

By उमेश चतुर्वेदी | Updated: February 21, 2026 07:15 IST2026-02-21T07:13:35+5:302026-02-21T07:15:06+5:30

शहरीकरण के साथ ही पारंपरिक मूल्यों के प्रति घटती निष्ठा और रोजगार के साधनों के रूप में भाषाओं की घटती संख्या भी मातृभाषाओं के खात्मे की वजह बनी है.

The need to preserve mother tongues through technology | तकनीक के जरिये मातृभाषाओं को बचाने की जरूरत

तकनीक के जरिये मातृभाषाओं को बचाने की जरूरत

तकनीकी दौर में मातृभाषाएं सबसे ज्यादा संकट में हैं. इसकी वजह यह है कि मातृभाषाओं को बोलना भी तकनीक से प्रभावित हो रहा है और लेखन तो पूरी तरह उसी पर निर्भर हो गया है. तकनीक की खासियत कहें या कमी, वह बाजार के लिहाज से खुद को विकसित करती है और अपने उत्पादों के लिए इसी नजरिये से शोध करती है. चूंकि मातृभाषाओं में कई ऐसी हैं जिन्हें बोलने या जिनका इस्तेमाल करने वालों की संख्या बेहद कम है, इसलिए उनसे कमाई की संभावना कम है.

चूंकि तकनीकी विकास में काफी धन लगता है, और मातृभाषाओं के एक हिस्से से कमाई की गुंजाइश नहीं दिखती, इसलिए तकनीक उनके सहज इस्तेमाल में दिलचस्पी नहीं दिखाती. इसलिए मातृभाषाओं की बड़ी संख्या लुप्त होने के कगार पर है.

भारत को ही देखिए. साल 1961 की जनगणना के आंकड़ों के लिहाज से देश में 1652 भाषाएं थीं. लेकिन सिर्फ दस साल बाद यानी 1971 में यह संख्या घटकर महज 808 रह गई. ऐसा बदलाव तब हुआ, जब तकनीक का बोलबाला नहीं था. लेकिन अब बात उससे भी आगे बढ़ चुकी है. 2013 के भारतीय लोकभाषा सर्वेक्षण के अनुसार, विगत 50 वर्षों में 220 भाषाएं जहां लुप्त हो गई हैं, वहीं 197 भाषाएं खत्म होने की कगार पर हैं.

मातृभाषाओं के लुप्त होने की कई अन्य वजहें भी हैं. भाषाशास्त्रियों के मुताबिक व्यक्तिवादी दर्शन, उपभोक्तावाद, सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों में आ रहे बदलाव और शहरीकरण के साथ ही पारंपरिक मूल्यों के प्रति घटती निष्ठा और रोजगार के साधनों के रूप में भाषाओं की घटती संख्या भी मातृभाषाओं के खात्मे की वजह बनी है.

इसके बावजूद कुछ अपवादों को छोड़ दें तो मातृभाषाओं को लेकर कुछ इलाकों में सम्मोहन बरकरार है. शायद यही वजह है कि इस बार के अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के लिए यूनेस्को ने जो थीम रखी है, वह बेहद अहम  है, ‘भाषाओं का महत्व : रजत जयंती और सतत विकास’. इस थीम का ध्येय वाक्य ‘अनेक भाषाएं, एक भविष्य’ है. पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में 1952 में शहीद हुए भाषा आंदोलनकारियों की याद में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की शुरुआत की पिछले साल यानी 2025 में रजत जयंती थी.

तब यूनेस्को ने इस दिवस को भाषाई विविधता, डिजिटल सशक्तिकरण व समावेशी शिक्षा के माध्यम से सतत विकास पर जोर देने पर केंद्रित किया था.

जैसे-जैसे अधिकाधिक भाषाएं विलुप्त होती जा रही हैं, भाषायी विविधता खतरे में पड़ती जा रही है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्व की 40 प्रतिशत आबादी को उस भाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल रहा है, जिन्हें वे बोलते या समझते हैं.

मातृभाषाओं का संरक्षण इसलिए भी जरूरी है कि स्थानीय समाज उनके जरिए शिक्षा हासिल कर सके. अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर हर साल यूनेस्को किसी न किसी अहम विषय को ध्येय बनाता है और उस नजरिये से पूरे साल भाषाई विविधता को विकसित करने और उन्हें लागू करने पर जोर देता है. इस बार के ध्येय वाक्य से साफ है कि यूनेस्को चाहता है कि विश्व के सतत विकास में मातृभाषाओं की महत्ता को रेखांकित किया जाए. मातृभाषाएं एक तरह से भाषायी लोकतंत्र को रचती हैं.

इस लोकतंत्र को बचाए बिना विविधरंगी संसार को नहीं बचाया जा सकता. इसलिए मातृभाषाओं को बचाना और उन्हें सांस्कृतिक लोकतंत्र के प्रतीक के रूप में जिंदा रखना जरूरी हो जाता है.  

Web Title: The need to preserve mother tongues through technology

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