जैव विविधता संरक्षण की कठिन होती चुनौती
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 16, 2026 08:07 IST2026-01-16T08:07:12+5:302026-01-16T08:07:36+5:30
उन्होंने वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध किया था कि पश्चिमी घाट एक नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र है, इसलिए सरकार और जनता को इस धरोहर की रक्षा के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है, जो कई वन्य प्रजातियों का घर है.

जैव विविधता संरक्षण की कठिन होती चुनौती
अभिलाष खांडेकर
नववर्ष के प्रारंभ में 83 वर्षीय डॉ. माधव गाडगिल का निधन न केवल भारत के एक उच्च शिक्षित पर्यावरणविद् को खोने का बड़ा नुकसान है, बल्कि उनके निधन से हमने देश में जैव विविधता संरक्षण की उम्मीदों को भी काफी हद तक झकझोर दिया है. गाडगिल ऐसे समय में हमें छोड़कर चले गए जब प्रकृति संरक्षण के आंदोलन को नेतृत्व देने की सबसे अधिक आवश्यकता थी, जो इस समय अत्यंत नाजुक दौर से गुजर रहा है.
वैज्ञानिक सोच वाले एक पर्यावरणविद् के रूप में, उन्होंने पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण के अपने प्रयास वैश्विक विचारकों और विशेषज्ञों द्वारा खतरों की भविष्यवाणी करने और 1992 में ब्राजील के रियो में पहले पृथ्वी शिखर सम्मेलन के लिए एकत्रित होने से कई साल पहले ही शुरू कर दिए थे. यह महत्वपूर्ण बात है.
माधव गाडगिल को उनके लंबे और उतार-चढ़ाव भरी यात्रा में किए गए अन्य प्रयासों के साथ-साथ नाजुक पश्चिमी घाटों की रक्षा के प्रयासों के लिए कई शानदार श्रद्धांजलियां अर्पित की गई हैं. मैं यह लेख जैव विविधता संरक्षण के लिए उनके योगदान को उजागर करने के लिए लिख रहा हूं. उन्होंने भविष्य में प्रकृति को होने वाले तीव्र नुकसान को भांपते हुए कानूनी उपाय लाने में मदद की.
यह उनका मौलिक कार्य था. यदि जैव विविधता- पक्षी, कीट, उभयचर, मधुमक्खियां, तितलियां, पेड़, झाड़ियां, जल निकाय, घास के मैदान आदि - लुप्त हो जाए तो मानव जाति का अस्तित्व निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगा. प्राचीन लोग और हमारे पूर्वज इसके महत्व को जानते थे और उन्होंने प्रकृति के साथ उस निर्दयता से छेड़छाड़ नहीं की, जैसा कि हम आज रोजाना देख रहे हैं.
वर्ष 1971 में, गाडगिल ने वनों की रक्षा पर ध्यान केंद्रित करते हुए पारिस्थितिक क्षेत्र अध्ययन शुरू किया. ‘हरित क्रांति’ के नायक डॉ. एमएस स्वामीनाथन, जिन्हें इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1980 में स्थापित भारत के पहले पर्यावरण विभाग को आकार देने का श्रेय भी दिया जाता है, ने 1983 में उन्हें पश्चिमी घाट का व्यवस्थित अध्ययन शुरू करने के लिए कहा, जब गाडगिल बेंगलुरु स्थित प्रख्यात भारतीय विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर थे.
वहीं से उन्होंने ऐसे शोध कार्यों में रुचि रखने वाले उत्साही युवा छात्रों को एकत्रित करना शुरू किया. पक्षी प्रजातियों और उनके आवासों के व्यापक अध्ययन के लिए उत्तर कन्नड़ जिले को चुना गया और फिर 1992 में प्रकाशित एक लेख में, गाडगिल और उनके छात्रों ने लंबे समय से चली आ रही इस धारणा को चुनौती दी कि पक्षियों और पौधों की विविधता एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं.
तब तक इसे ‘पारंपरिक मान्यता’ माना जाता था. उन्होंने इसे गलत साबित किया. गाडगिल ने न केवल पौधों, पक्षियों और कीटों की प्रजातियों पर काम किया, बल्कि उन्होंने बाघ जैसे विशालकाय स्तनधारियों का भी अध्ययन किया और बाघ सुरक्षा बल में भी योगदान दिया. हालांकि उनके जिस काम ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह था जन जैव विविधता रजिस्टर (पीबीआर) की अवधारणा. रियो शिखर सम्मेलन में जैव विविधता पर एक सम्मेलन (सीबीडी) का सूत्रपात हुआ, जिसके फलस्वरूप भारत में जैव विविधता अधिनियम 2002 के रूप में एक कानून संसद ने बनाया. यह दो महान विद्वानों - डॉ. स्वामीनाथन और डॉ. गाडगिल - का प्रारंभिक और संयुक्त प्रयास था, जिसकी शुरुआत 1998 में हुई थी; अधिनियम कुछ वर्षों बाद पारित हुआ.
उक्त अधिनियम के तहत यह अनिवार्य किया गया था कि सभी स्थानीय निकाय, ग्रामीण और शहरी - पंचायतें, नगर पालिकाएं, महानगर पालिकाएं - केवल प्रलेखन के बजाय अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में जैव विविधता प्रबंधन समितियां (बीएमसी) स्थापित करें, जिससे स्थानीय समुदायों को व्यापक आधार पर प्रबंधन गतिविधियां करने का अधिकार मिले.
पर्यावासों, स्थानीय प्रजातियों, लोक किस्मों और खेती की जाने वाली प्रजातियों तथा सूक्ष्मजीवों का ऐसा दस्तावेजीकरण भावी पीढ़ियों के लाभ के लिए संरक्षण के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया गया था. यह कानून आज भी लागू है पर कम ही नगर निकाय इस पर काम कर रहे हैं.
पुणे के रहने वाले गाडगिल ने पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए अपनी पूरी कोशिश की, लेकिन हाल ही में वे सब जगह हो रही भीषण तबाही को लेकर चिंतित थे. मेरी उनसे कुछेक बार मुलाकातें हुई थीं - पहली मुलाकात तब हुई थी जब पश्चिमी घाट संरक्षण समूह ने महाबलेश्वर में अपने अभियान की रजत जयंती मनाई थी. वे उच्च शिक्षित थे और भारत की प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण के पक्ष में तर्क देने के लिए उनके पास वैज्ञानिक समझ थी. केरल में वायनाड त्रासदी में कई लोगों की मौत के बाद वे दुःखी व निराश हो गए थे. पश्चिमी घाट विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने कर्नाटक, केरल, गोवा और महाराष्ट्र राज्यों में खनन लॉबी के खिलाफ जंग छेड़ी थी. उन्होंने वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध किया था कि पश्चिमी घाट एक नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र है, इसलिए सरकार और जनता को इस धरोहर की रक्षा के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है, जो कई वन्य प्रजातियों का घर है.
जैव विविधता क्षेत्र में भी, स्थानीय स्व-संगठनों के माध्यम से उन्होंने जो योजना बनाई और लागू करना चाहा, वह बहुत सफल नहीं हो पाई. शहरी निकाय केंद्रीय अधिनियम के प्रावधानों की परवाह नहीं करते, यह एक ऐसा तथ्य था जिसने गाडगिल को उनके जीवनकाल में काफी परेशान किया था.
कैलाश सांखला (बाघ), सुंदरलाल बहुगुणा (वन), एजेटी जॉनसिंह (हाथी), सलीम अली, डॉ. लाड (पक्षी), मारुति चितमपल्ली (जैव विविधता), प्रकाश गोले (सारस क्रेन) और बीएनएचएस के प्रवर्तकों जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कई महान पर्यावरणविद हुए हैं जिन्होंने नि:स्वार्थ भाव से प्रकृति की सेवा की. एक के बाद एक वे हमें छोड़कर चले गए. गाडगिल उन्हीं चुनिंदा महान व्यक्तित्वों में से हैं जिन्होंने प्रकृति के लिए अपने प्राणों की आहुति दी. उनकी कमी को पूरा करना असंभव है, क्योंकि उनके जैसा जुनून और ज्ञान आज के युवाओं में मिलना काफी मुश्किल है.