कानून की भावना का भी ध्यान रखना जरूरी
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 25, 2026 05:26 IST2026-03-25T05:26:52+5:302026-03-25T05:26:52+5:30
जस्टिस भुइयां ने यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों के 2019 से 2023 तक के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया लेकिन दोषसिद्धि दर लगभग पांच प्रतिशत ही है.

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उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने बिल्कुल सही कहा है कि असहमति को अपराध घोषित करने, आतंकवाद रोधी कानून यूएपीए अर्थात गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत अंधाधुंध गिरफ्तारियों और ‘गहरी सामाजिक दरारों’ के माध्यम से 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता है.
दरअसल यूएपीए के तहत कम दोषसिद्धि की दर दिखा रही है कि कानून का अगर दुरुपयोग नहीं हो रहा तो कम से कम उसका अत्यधिक उपयोग अवश्य हो रहा है. जस्टिस भुइयां ने यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों के 2019 से 2023 तक के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया लेकिन दोषसिद्धि दर लगभग पांच प्रतिशत ही है.
उल्लेखनीय है कि यूएपीए कानून राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत सख्त माना जाता है और इसमें जमानत मिलना भी अक्सर मुश्किल होता है, इसलिए आरोपी लंबे समय तक बिना दोष सिद्ध हुए भी जेल में रहते हैं. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2023 के दौरान 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में यूएपीए के तहत कुल 10440 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया,
जबकि केवल 335 लोगों को ही दोषी ठहराया जा सका. इतने कठोर कानून के अंतर्गत गिरफ्तारी के बाद कोई व्यक्ति बाद में सबूतों के अभाव में छूट भी जाए तो जेल की जो सजा वह निरपराध होते हुए भी भुगत चुका होता है, क्या उसकी भरपाई संभव है? इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में बढ़ती आतंकवादी घटनाओं के मद्देनजर, उनसे निपटने के लिए सख्त कानूनों की जरूरत भी बढ़ती जा रही है.
यूएपीए अधिनियम केंद्र सरकार को संगठनों को आतंकवादी समूह घोषित करने का अधिकार देता है, यदि वे आतंकवाद करते हैं या उसमें भाग लेते हैं, आतंकवाद की तैयारी करते हैं, आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं, या किसी अन्य प्रकार से आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होते हैं.
लेकिन दोषसिद्धि की दर बहुत कम होना यह दिखाता है कि बहुत से निर्दोष लोग भी इस सख्त कानून की चपेट में आ रहे हैं. इसलिए जस्टिस भुइयां की चिंता को सरकार को ध्यान में रखना होगा और कोशिश करनी होगी कि आतंकवादी कृत्यों में लिप्त लोगों पर शिकंजा कसते हुए भी, निर्दोष लोग इसकी चपेट में न आएं और राजनीतिक या वैचारिक विरोधियों के खिलाफ इस कानून का दुरुपयोग न किया जाए.