माफ कीजिए मुनिश्रीजी, आप गलत बोल गए

By राजेंद्र दर्डा | Updated: April 3, 2026 08:25 IST2026-04-03T08:25:39+5:302026-04-03T08:25:39+5:30

हमारी सांसों में मराठी है, हमारी पहचान मराठी ही है. मराठी केवल भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और हमारी अस्मिता है.

Sorry Muni Shri Ji you said the wrong thing blog writer by Rajendra darda | माफ कीजिए मुनिश्रीजी, आप गलत बोल गए

माफ कीजिए मुनिश्रीजी, आप गलत बोल गए

बीते मंगलवार को ही जैन धर्मावलंबियों के साथ सभी धर्म-पंथ के लोगों ने मिलकर भगवान महावीर का जन्मकल्याणक बड़े ही भक्तिभाव से मनाया. सत्य, अहिंसा और सह-अस्तित्व का संदेश देने वाले पवित्र पर्व का महत्व आज की वैश्विक परिस्थितियों में और भी अधिक स्पष्ट और प्रासंगिक हो गया है.

दुनिया भर में अस्थिरता का साया गहराता जा रहा है. अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से उत्पन्न युद्ध की स्थिति केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रह रही, बल्कि इसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ रहा है. खाड़ी देशों के साथ-साथ भारत इसके प्रभाव से अछूता नहीं है. इस संकट की घड़ी में जैन धर्मीय के रूप में हमारी सच्ची भावना यही है कि भगवान महावीर के शांति और अहिंसा के विचारों की ‘मिसाइल’ अस्थिर होती धरती पर सही मायने में ‘रामबाण’ साबित हो सकती है.

भगवान महावीर द्वारा दी गई सत्य, अहिंसा और सह-अस्तित्व की शिक्षा केवल धार्मिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि मानवता के अस्तित्व की मूलभूत आवश्यकता है. सह-अस्तित्व का अर्थ है - हर जीव को जीने का समान अधिकार है, इस बात के प्रति संवेदनशील रहना. दुर्भाग्य से, जिस दिन हम यह पवित्र महोत्सव मना रहे थे, उसी समय एक विवादास्पद वक्तव्य के कारण राज्य में असहज स्थितियां पैदा हो गई हैं. जैन मुनि आचार्य नयन पद्मसागरजी ने अपने वक्तव्य में ‘महारानी ताराबाई जैन धर्मीय थीं’ कहकर महाराष्ट्र की जनता की भावनाओं को पीड़ा पहुंचाई है.

आपका कथन असत्य है. हम जानते हैं कि इतिहास समाज की नींव होता है. उसमें विकृति लाना या मनमाना परिवर्तन करना किसी के भी हित में नहीं होता है. महारानी ताराबाई भोसले छत्रपति शिवाजी महाराज की स्वराज्य परंपरा की एक चमकती हुई, तेजस्वी व्यक्तित्व थीं. वे छत्रपति राजाराम महाराज की पत्नी और पराक्रमी सरसेनापति हंबीरराव मोहिते की पुत्री थीं.

सन् 1700 में राजाराम महाराज के निधन के बाद औरंगजेब के आक्रमण का तारारानी ने जिस साहस और कुशलता से सामना किया, उससे उनके नेतृत्व गुण स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आते हैं. ‘रणरागिणी’ के नाम से जानी जाने वाली तारारानी ने स्वराज्य की पताका ऊंची रखते हुए मुगलों को बुरी तरह परेशान किया. इतिहास में यह बात सुनहरे अक्षरों में दर्ज है और हम सभी को उस पर गर्व है.

महाराष्ट्र विविधता से सुशोभित भूमि है. यहां अनेक समाज, संस्कृतियां और परंपराएं साथ-साथ निवास करती हैं. जैन समाज भी सदियों से इस भूमि में रच-बस चुका है. श्वेतांबर या दिगंबर, स्थानकवासी हों या मंदिर मार्गी, हिंदी हों या मराठी भाषी; महाराष्ट्र में रहने वाले सभी जैन धर्मावलंबी इस मिट्टी के साथ एकरूप हैं. हमारी सांसों में मराठी है, हमारी पहचान मराठी ही है. मराठी केवल भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और हमारी अस्मिता है. इसलिए कोई भी ऐसा कथन जो समाज में फूट डाल सकता हो, उससे अधिक संवेदनशीलता से बचना आवश्यक हो जाता है.

साधु-संत समाज के मार्गदर्शक होते हैं. उनके शब्दों में गंभीरता और गहराई होती है, उनके विचारों का प्रभाव व्यापक होता है. इसलिए उनका कहा हर कथन विचारपूर्वक और पूर्ण जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए, यह अपेक्षा रखना स्वाभाविक है. कभी-कभी एक कथन से उत्पन्न विवाद पूरे समाज को संकट में ला खड़ा करता है. ऐसी परिस्थिति में विवेक, संयम और संतुलित दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक हो जाता है.

भगवान महावीर की शिक्षा अहिंसा केवल कृति तक सीमित नहीं है. किसी को शारीरिक चोट पहुंचाना ही हिंसा नहीं है, अपने शब्दों से किसी को पीड़ा अथवा आहत किया जाना भी हिंसा ही है. इसलिए जैन परंपरा में ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ इस विचार को अत्यंत महत्व दिया गया है — अपनी क्रिया या शब्दों से जाने- अनजाने में किसी को दु:ख पहुंचा हो तो मन से क्षमा मांगी जाती है.

आज के इस संवेदनशील समय में यदि किसी कथन से समाज में मतभेद या तनाव उत्पन्न होने की संभावना हो, तो उसे रोकना ही सच्ची जिम्मेदारी है. अतः मेरी नम्र विनती है कि समाज में सौहार्द बनाए रखने के लिए और आपसी सम्मान की रक्षा करने के लिए हर किसी को अपने शब्दों के प्रति जागरूक और सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि सुसंवाद से वैचारिक पुल भी बनाए जा सकते हैं, लेकिन इसी संवाद से वैमनस्य की दरार भी पैदा हो सकती है.

महाराष्ट्र का जैन समाज इस भूमि की मुख्य धारा का अभिन्न अंग है. शांति, सहिष्णुता और आपसी आदर के मूल्यों पर आधारित सहजीवन ही हम सभी की प्रगति का सच्चा सूत्र है. इसलिए नम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं — माफ कीजिए मुनिश्रीजी, लेकिन आप गलत बोल गए!

Web Title: Sorry Muni Shri Ji you said the wrong thing blog writer by Rajendra darda

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