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सरोजिनी नायडू: नारी सशक्तिकरण, भारतीय आधुनिकता की अग्रदूत

By देवेंद्र | Updated: February 13, 2026 05:49 IST

1917 में एनी बेसेंट और मार्गरेट कजिन्स के साथ मिलकर मद्रास (अब चेन्नई) के अडयार में महिला भारतीय संघ की स्थापना करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि महिला अधिकारों का संघर्ष राष्ट्रीय स्वतंत्रता से अलग नहीं किया जा सकता.

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ठळक मुद्देविरोधाभास दिखता था. सरोजिनी नायडू पश्चिमी शिक्षा से संपन्न थीं.अंग्रेजी में लिखती थीं, लेकिन उनकी काव्य-दृष्टि पूर्णतः भारतीय थी. स्त्री-मुक्ति के संदर्भ में सरोजिनी नायडू का योगदान परंपरागत नारीवाद से भिन्न था.

महान स्वतंत्रता सेनानी और कवयित्री सरोजिनी नायडू की जयंती के सम्मान में भारत में प्रतिवर्ष 13 फरवरी को  राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में भारतीय राष्ट्रवाद संक्रमण काल से गुजर रहा था. नरमपंथी राजनीति की सीमाएं स्पष्ट हो रही थीं, लेकिन गरमपंथी हिंसा का मार्ग भी जनसाधारण को स्वीकार्य नहीं था. ऐसे में सरोजिनी नायडू का आविर्भाव सांस्कृतिक-राजनीतिक संश्लेषण के रूप में हुआ. उन्होंने भांप लिया था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए सांस्कृतिक आत्मविश्वास अनिवार्य है. लेकिन यहां एक विरोधाभास दिखता था. सरोजिनी नायडू पश्चिमी शिक्षा से संपन्न थीं,

अंग्रेजी में लिखती थीं, लेकिन उनकी काव्य-दृष्टि पूर्णतः भारतीय थी. यह विरोधाभास नहीं, बल्कि एक सुविचारित रणनीति थी. वे अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में बता रही थीं कि भारत केवल रहस्यवाद या गरीबी का देश नहीं, बल्कि समृद्ध संस्कृति और गहन जीवन-दर्शन का केंद्र है. स्त्री-मुक्ति के संदर्भ में सरोजिनी नायडू का योगदान परंपरागत नारीवाद से भिन्न था.

वे पश्चिमी नारीवादी आंदोलन की नकल नहीं कर रही थीं. उनका तर्क था कि भारतीय स्त्री को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विच्छिन्न किए बिना सशक्त बनाया जाना चाहिए. 1917 में एनी बेसेंट और मार्गरेट कजिन्स के साथ मिलकर मद्रास (अब चेन्नई) के अडयार में महिला भारतीय संघ की स्थापना करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि महिला अधिकारों का संघर्ष राष्ट्रीय स्वतंत्रता से अलग नहीं किया जा सकता.

उनकी काव्य-भाषा पर भी विचार करें. वे अंग्रेजी में लिखती थीं, लेकिन उनकी अंग्रेजी में संस्कृत के छंद की लय थी, उर्दू के गजल का सौंदर्य था और तेलुगु के पद्य का प्रवाह था. यह भाषायी संश्लेषण अपने आप में एक राजनीतिक वक्तव्य था- यह घोषणा थी कि भारत बहुलतावादी समाज है, जहां विविधता शक्ति का स्रोत है.

सरोजिनी नायडू का 1925 के कानपुर कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष बनना केवल एक पद की प्राप्ति नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नारी शक्ति, लैंगिक समानता और राष्ट्रवादी एकता की ऐतिहासिक पुनर्स्थापना थी. यह भारतीय राजनीति में स्त्री-नेतृत्व की स्वीकृति थी. लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने इस पद का उपयोग कैसे किया. उनके अध्यक्षीय भाषण में साम्प्रदायिक सद्भाव, आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक सुधार पर जोर था. वे राजनीति को केवल सत्ता-संघर्ष नहीं, बल्कि समाज-परिवर्तन का माध्यम मानती थीं.

आज जब हम उनकी विरासत का मूल्यांकन करते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि सरोजिनी नायडू भारतीय आधुनिकता की एक अनूठी प्रयोगशाला थीं. उन्होंने सिद्ध किया कि बौद्धिक परिष्कार और जनसंपर्क, कविता और राजनीति, सौंदर्य-बोध और संघर्ष-चेतना एक साथ संभव है.

उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्र-निर्माण केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि कल्पना और संवेदना से भी होता है. भारत कोकिला की आवाज में जो स्वर था, वह केवल स्वतंत्रता का स्वर नहीं था - वह भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का स्वर था.

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