भाजपा में ‘लॉटरी’ बार-बार नहीं खुलती

By Amitabh Shrivastava | Updated: March 9, 2026 19:57 IST2026-03-09T19:56:59+5:302026-03-09T19:57:55+5:30

राज्यसभा चुनाव में राज्य की सात रिक्त सीटों के लिए भाजपा ने दूर की सोच और जातीय समीकरणों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन किया.

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Highlightsशिवसेना शिंदे गुट को भी चौंकाने की नीति अपनाने पर मजबूर होना पड़ा. अपने ही दल के नेताओं को समझाकर शांत करना पार्टी के लिए टेढ़ी खीर थी.ऐसे नाम थे, जिनसे भाग-दौड़ में लगे नेताओं को पार्टी का रुख साफ हो गया.

राजनीतिक दलों के अच्छे दिनों में नेताओं की महत्वाकांक्षा का उछाल मारना कोई नई बात नहीं है. इसीलिए इन दिनों महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के अनेक नेताओं के सपनों में पंख लगना आश्चर्यजनक नहीं है. किंतु भाजपा का इतिहास है कि वह ‘अच्छे दिनों’ में उड़ान संभल कर भरती है. वह नेताओं की मनोकामना पूरी करने के बजाय सुखद झटके देने में विश्वास करती है. भले ही किसी का चेहरा उतरे या किसी की बांछें क्यों न खिल जाएं. ताजा राज्यसभा चुनाव में राज्य की सात रिक्त सीटों के लिए भाजपा ने दूर की सोच और जातीय समीकरणों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन किया.

यहां तक कि उससे राज्य सरकार में साझेदार शिवसेना शिंदे गुट को भी चौंकाने की नीति अपनाने पर मजबूर होना पड़ा. एक तरफ जीत के लिए चार तय सीटों के अलावा पांचवीं सीट हथियाने की तैयारी और दूसरी ओर अपने ही दल के नेताओं को समझाकर शांत करना पार्टी के लिए टेढ़ी खीर थी.

किंतु महाविकास आघाड़ी के तीनों दल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा) शरद पवार गुट और शिवसेना ठाकरे गुट के बीच समझौता होने से पांचवीं सीट पर चुनाव लड़ने की मंशा किनारे हो गई. वहीं चार सीटों पर ऐसे उम्मीदवारों के नाम घोषित किए गए, जो प्रत्यक्ष रूप से किसी दौड़ में शामिल नहीं थे. वह ऐसे नाम थे, जिनसे भाग-दौड़ में लगे नेताओं को पार्टी का रुख साफ हो गया.

साथ ही दल की परंपरा में अपवाद शामिल नहीं हो पाया. वर्ष 1980 में जनसंघ से भाजपा बनने के बाद वर्ष 1986 में महाराष्ट्र के पहले राज्यसभा सांसद बनने का अवसर प्रमोद महाजन को मिला. उनके बाद वीरेन शाह को वर्ष 1990 में मौका मिला. वर्ष 1992 में दूसरी, वर्ष 1998 में तीसरी और वर्ष 2004 में चौथी बार पार्टी ने महाजन को ही राज्यसभा भेजा.

उनके अलावा पीयूष गोयल पार्टी के दूसरे नेता हैं, जिन्हें चार बार राज्यसभा में भेजा जा चुका है. इन दोनों के अतिरिक्त वेद प्रकाश गोयल और बलवंत आप्टे का दो बार राज्यसभा के लिए चयन हुआ. हालांकि प्रकाश जावड़ेकर को भी दो बार मौका मिला, मगर दोनों में अंतर चार साल का था.

इसके अलावा वीरेन शाह से लेकर भागवत कराड़ तक कोई नेता लगातार दूसरी बार राज्यसभा में अपनी सीट सुरक्षित नहीं कर पाया. यद्यपि भाजपा ने अब तक महाराष्ट्र से संसद के उच्च सदन में 25 नेताओं को भेजा है. फिलहाल राज्यसभा में राज्य की कुल सीटें 19 हैं, जिनमें से सर्वाधिक सात भाजपा के पास हैं और नए चुनावी समीकरणों के बाद दो सीटें और बढ़ जाएंगी.

साफ है कि भाजपा के पास अवसर होने के बावजूद उसने नेताओं की महत्वाकांक्षा को संतुष्ट नहीं करना चाहा. उसने राज्य के जातीय समीकरणों पर पार्टी की अपेक्षाओं को देख नए नेताओं को अवसर दिया.
अतीत में भाजपा ने अपने शुरुआती दिनों में उन्हीं नेताओं को राज्यसभा का अवसर दिया, जो पार्टी के लिए महत्वपूर्ण थे या फिर उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) से घनिष्ठ संबंध था.

उस समय सीट जीतने के लिए सीमाएं थीं. वर्ष 1995 में राज्य विधानसभा में सफलता पाने के बाद से भाजपा में सीटों का सही हिसाब-किताब आरंभ हुआ. पहले राम कापसे और उसके बाद वकील राम जेठमलानी को दूसरी बार पार्टी के टिकट पर राज्यसभा भेजा. उसके बाद पार्टी संगठन से जुड़े प्रकाश जावड़ेकर के साथ नए नामों की शुरुआत हुई.

इसी दौर में पीयूष गोयल को भी अवसर मिला. इनके पश्चात नए नाम आने आरंभ हो गए. जिनकी अलग पहचान थी. इस श्रृंखला में नागपुर के अजय संचेती, पुणे के समीप पिंपरी चिंचवड़ के अमर शंकर साबले, विकास महात्मे, विनय सहस्त्रबुद्धे थे. राजनीतिक समझौते में नारायण राणे, उदयनराजे भोसले, धैर्यशील पाटिल, धनंजय महाडिक और अशोक चव्हाण ऊपरी सदन पहुंचाए गए.

किंतु भागवत कराड़, अनिल बोंडे, अजित गोपछड़े और मुग्धा कुलकर्णी नए और आश्चर्यजनक नाम ही थे. इस बीच, पार्टी ने राजनीतिक मजबूरी या फिर किसी नए व्यक्ति को अवसर देने के मुद्दे पर किसी को दोहराया नहीं. यहां तक कि पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सूर्यभान वहाडणे पाटिल को दूसरी बार अवसर नहीं मिला.

इसके अलावा लोकसभा चुनाव में पार्टी के टिकट पर हारने वाले रावसाहब दानवे जैसे नेताओं की भी कोई सुनवाई नहीं हुई. विकास महात्मे, विनय सहस्त्रबुद्धे और पूर्व केंद्रीय मंत्री भागवत कराड़ की कोशिश बेकार गई. फिलहाल राज्यसभा चुनाव के बहाने भाजपा ने अंदरूनी तौर पर पार्टी में हर एक को मौका, मगर सिर्फ एक बार का संदेश देने का काम किया है.

उसने निचले स्तर पर बात पहुंचाने के साथ जमीनी नेताओं को ऊपर लाने में विश्वास दिखाया है. नांदेड़ के डॉक्टर अजित गोपछड़े और मुग्धा कुलकर्णी के बाद नागपुर की माया इवनाते और हिंगोली के रामराव वड़कुते कुछ लीक से हटकर नाम हैं. ये आम नेताओं और कार्यकर्ताओं की कल्पना से बाहर हैं.

राज्य में दानवे, कराड़, धैर्यशील पाटील के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर, पूर्व केंद्रीय मंत्री भारती पवार, पूर्व सांसद प्रीतम मुंडे और पूर्व सांसद नवनीत राणा के नाम चर्चा में थे. मगर रहाटकर के पास पद तथा बाकी को लोकसभा में अवसर दिए जाने के कारण उन पर दोबारा विचार नहीं किया गया. दूसरी ओर राज्यसभा को लेकर भाजपा की मंशा हमेशा यही रही है कि ऊपरी सदन में जगह चुनाव जीतने में असक्षम नेताओं को दिलाई जाए. किंतु वे सदन में पार्टी का पक्ष जोरदार ढंग से रखने में सक्षम हों.

या फिर उनके पास निजी रूप से प्रभावशाली होने की योग्यता हो. कुछ हद तक यह सही भी माना जा सकता है कि यदि किसी योग्य को सहारा देने से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं तो उसे प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए. फिर भी कोई अपना चयन ‘लॉटरी’ मान बैठे तो उसे छह साल के कार्यकाल में यह अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि भाजपा में ‘लॉटरी’ बार-बार नहीं खुलती.

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