क्रांति की भाषा: भगत सिंह और हिंदी का अद्भुत संबंध

By विवेक शुक्ला | Updated: March 23, 2026 05:32 IST2026-03-23T05:32:27+5:302026-03-23T05:32:27+5:30

लेख में भगत सिंह ने पंजाब की भाषायी समस्या के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण किया और भाषा को मजहबी रंग देने पर दुख जताया.

Revolution Language Amazing Connection Bhagat Singh and Hindi blog Vivek Shukla | क्रांति की भाषा: भगत सिंह और हिंदी का अद्भुत संबंध

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Highlightsनिबंध पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन की प्रतियोगिता के लिए था, जिसमें उन्हें 50 रुपए का प्रथम पुरस्कार मिला.भगत सिंह का जन्म 1907 में उस पंजाब में हुआ जहां पंजाबी और उर्दू का बोलबाला था.घर, स्कूल और कॉलेज में हिंदी सीखना स्वाभाविक था.

शहीद-ए-आजम भगत सिंह का नाम सुनते ही क्रांति, बलिदान और अटूट देशभक्ति की तस्वीर उभर आती है. वे महान क्रांतिकारी, कुशल लेखक और विचारक भी थे, जिन्होंने अपनी कलम से जन-चेतना जगाने का काम किया. उन्होंने विभिन्न भाषाओं में लिखा, लेकिन हिंदी को विशेष महत्व दिया. भगत सिंह की मातृभाषा पंजाबी थी. वे पंजाबी, हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और संस्कृत में पारंगत थे-सभी भाषाओं में सही ढंग से लिख और पढ़ सकते थे. फिर भी, उन्होंने विचारों को राष्ट्रव्यापी स्तर पर फैलाने की गरज से हिंदी को चुना. उनका पहला महत्वपूर्ण हिंदी निबंध संभवतः ‘पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या’ था, जो उन्होंने मात्र 17 वर्ष की उम्र में 1924 में लिखा. यह निबंध पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन की प्रतियोगिता के लिए था, जिसमें उन्हें 50 रुपए का प्रथम पुरस्कार मिला.

बाद में यह 28 फरवरी 1933 को ‘हिंदी संदेश’ में प्रकाशित हुआ. इस लेख में भगत सिंह ने पंजाब की भाषायी समस्या के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण किया और भाषा को मजहबी रंग देने पर दुख जताया. उन्होंने कहा- “....हमारे प्रांत का दुर्भाग्य रहा कि यहां भाषा को मजहबी रंग दे दिया गया.” भगत सिंह का जन्म 1907 में उस पंजाब में हुआ जहां पंजाबी और उर्दू का बोलबाला था.

लेकिन हिंदी भी प्रिंट मीडिया और हिंदू परिवारों में व्यापक थी. उस समय आर्य समाज और सनातन धर्म समर्थक हिंदी का प्रचार कर रहे थे. भगत सिंह का परिवार आर्य समाज से जुड़ा था-उनके दादा सरदार अर्जुन सिंह दयानंद सरस्वती के करीबी थे. कई सिख भी आर्य समाज से जुड़े रहे. इसलिए घर, स्कूल और कॉलेज में हिंदी सीखना स्वाभाविक था.

दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. चंद्रपाल सिंह, जो ‘भगत सिंह- रीविजिटेड’ किताब के लेखक हैं, बताते हैं कि परिवार में हिंदी की परंपरा पहले से मजबूत थी. जैसे-जैसे भगत सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हुए, उन्हें एहसास हुआ कि हिंदी में लिखने से वे देश के आम आदमी तक आसानी से पहुंच सकते हैं.

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) में शामिल होने के बाद वे भारत के विभिन्न हिस्सों के क्रांतिकारियों से मिले, जिनमें ज्यादातर हिंदी भाषी थे. विशेष रूप से चंद्रशेखर आजाद के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था, जिनके साथ उनका घनिष्ठ संबंध था. भगत सिंह मुख्यतः राजनीतिक, सामाजिक और क्रांतिकारी मुद्दों पर लिखते थे.

शुरू में उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में लेख लिखे, लेकिन बाद में हिंदी की ओर मुड़े. उन्होंने कई हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं जैसे ‘प्रताप’, ‘चांद’, ‘किरती’ आदि में योगदान दिया. छद्म नामों जैसे ‘बलवंत सिंह’, ‘रणजीत’ और ‘विद्रोही’ नाम से लिखना गिरफ्तारी से बचने का तरीका था. इस कारण उनके लेखों का व्यवस्थित संकलन नहीं हो सका, जो एक बड़ा नुकसान रहा.

1925 में भगत सिंह कानपुर गए, जहां गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘प्रताप’ में काम किया. पीलखाना में प्रेस के पास रहते हुए उन्होंने हिंदी लेखन को और निखारा. कानपुर हिंदी का प्रमुख केंद्र रहा है, इसलिए वहां रहकर उनकी हिंदी और मजबूत हुई. भगत सिंह की कलम आज भी प्रेरणा देती है-यह बताती है कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, क्रांति का हथियार भी हो सकती है.

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