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राजेश बादल का ब्लॉग: दलबदल के दलदल में फिर एक बार लोकतंत्न

By राजेश बादल | Updated: July 17, 2019 05:39 IST

कितना अजीब है कि एक राजनेता जैसे कोई जादू की छड़ी घुमाते ही अपने आप को किसी एक राष्ट्रीय पार्टी की विचारधारा से अलग कर लेता है. एक दिन पहले वह जिस पार्टी की नीतियों की कड़ी आलोचना करता रहा है, अगले दिन ही उसकी प्रशस्ति गाने लग जाता है.

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इतिहास अपने को दोहराता सा लगता है. भारतीय लोकतंत्न ने राजनीति का एक दौर ऐसा भी देखा था, जब अरसे तक दलबदल की महामारी ने पूरी व्यवस्था को हिला कर रख दिया था. देश उन दिनों सियासत का वैचारिक आधार खिसकते देखता रहा और अवाम के दिलों में राजनेताओं के प्रति भरोसा टूटता रहा. एक उदाहरण तो ऐसा भी आया कि मुख्यमंत्नी समेत समूचा मंत्रिमंडल रातोंरात कुर्सी की खातिर दलबदल कर गया. वे मुख्यमंत्नी जब तक जीवित रहे दलबदलू के नाम से कुख्यात रहे.

राजनीति में आयाराम-गयाराम का यह स्याह चेहरा कई बरस भारतीय मतदाता बर्दाश्त करते रहे. तब त्नस्त मुल्क ने एक प्रधानमंत्नी ऐसा भी देखा, जो साफ-सुथरी राजनीति का हिमायती था और उसने इस बीमारी पर काबू पाने के लिए उन्नीस सौ पचासी में संविधान में 52वें संशोधन के जरिए दलबदल विरोधी कानून बनाया. इस सख्त कानून को लागू करने में प्रधानमंत्नी राजीव गांधी को प्रतिपक्ष का पुरजोर समर्थन मिला.

देश ने इस सियासी सड़ांध से लंबे समय तक के लिए मुक्ति पा ली थी. इसमें व्यक्तिगत दलबदल को हतोत्साहित किया गया था और सामूहिक रूप से पार्टी छोड़ने को ही वैधता प्रदान की गई थी. इसके जरिये निर्वाचित सांसदों या विधायकों की एक-तिहाई संख्या होने पर ही मान्यता मिल सकती थी. बाद में यह संख्या दो-तिहाई की गई.

उस समय मंशा यह रही कि अगर कोई पार्टी अपनी विचारधारा से भटकती है तो लोकतांत्रिक ढांचे में प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि को उससे अपने आप को अलग करने का अधिकार होना चाहिए. यह कानून इस बात को सख्ती से रोकना चाहता है कि फुटकर संख्या में लोग अपना दल छोड़कर दूसरे दल में शामिल हों. क्योंकि इसके पीछे प्रलोभन की आशंका बढ़ जाती थी कि सरकार बनाने या बहुमत से दूर होने पर जरूरी विधायक या सांसद अन्य पार्टी से तोड़ लिए जाएं.  

लेकिन मौजूदा सियासी दौर में  इस संक्रामक मर्ज ने एक बार फिर सिर उठा लिया है. हुकूमत और उसकी सुविधाएं हासिल करने के लिए हम इस दलबदल कानून की आए दिन धज्जियां उड़ते देख रहे हैं. कर्नाटक, गोवा, बंगाल तथा अन्य प्रदेशों में जिस तरह आयाराम - गयाराम को प्रोत्साहित किया जा रहा है, वह संविधान का मखौल नहीं तो और क्या है? यह भी देखा गया है कि नेताओं ने लालच या दबाव में अथवा सत्तासुख भोगने के लिए अपनी सार्वजनिक साख दांव पर लगा दी है.

एक के बाद एक कमोबेश सभी दलों में यह सिलसिला उफान पर है. अंतर सिर्फ इतना है कि अब इस दलबदल की धारा कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस या अन्य क्षेत्नीय विपक्षी पार्टियों की ओर से केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की ओर अधिक है. सत्नहवें लोकसभा चुनाव से पहले एक पतली धारा कांग्रेस की ओर भी बही थी. मगर चुनाव परिणामों ने इस बहती धारा को सुखा दिया. विडंबना यह है कि इस  लाइलाज बीमारी पर पहले जिस तरह समाज की ओर से तीखी प्रतिक्रिया होती थी, वह अब नहीं होती. शायद भ्रष्टाचार की तरह अब दलबदल से भी मतदाता या बौद्धिक वर्ग उदासीनता  महसूस करने लगा है. यह एक खतरनाक चेतावनी है. कोई भी सभ्य समाज लोकतंत्न की बुनियाद को उसके ही रखवालों की तरफ से कमजोर किया जाना बर्दाश्त नहीं करेगा. 

कितना अजीब है कि एक राजनेता जैसे कोई जादू की छड़ी घुमाते ही अपने आप को किसी एक राष्ट्रीय पार्टी की विचारधारा से अलग कर लेता है. एक दिन पहले वह जिस पार्टी की नीतियों की कड़ी आलोचना करता रहा है, अगले दिन ही उसकी प्रशस्ति गाने लग जाता है. एक उम्मीदवार जो कांग्रेस का उम्मीदवार घोषित किया जाता है, वह बाकायदा पत्नकारों से मिलकर खुशी प्रकट करता है, लेकिन जब नामांकन दाखिल करने जाता है तो वह भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार हो जाता है.

इसी तरह एक सांसद जिसने सारी उमर बीजेपी के संसद सदस्य के रूप में दल और देश की सेवा की, वह सिर्फ चुनाव का टिकट नहीं मिलने के कारण कांग्रेस ज्वाइन कर लेता है. इतना ही नहीं, वह ऐलान करता है कि भले ही वह न जीते, मगर उसका मकसद तो बीजेपी को नहीं जीतने देना है. इस तरह की नकारात्मक सोच गणतंत्न की सेहत के लिए नुकसानदेह है. चुनाव प्रचार के दरम्यान सभाओं में विरोधी दल को परास्त करने के लिए शिखर नेताओं की ओर से ऐसे तीर छोड़े जाते हैं कि सत्तारूढ़ दल की सरकार खतरे में है क्योंकि उसके एक सौ विधायक दलबदल के लिए तैयार हैं.

बंगाल इसका उदाहरण है. मध्य प्रदेश की निर्वाचित सरकार को विधायक तोड़कर सरकार गिराने की खुलेआम धमकियों का क्या अर्थ लगाया जाए? मध्यकाल में राजाओं के बीच जंग की स्थिति में दुश्मन राजाओं के सरदार या उनकी फौजी टुकड़ियों को अपनी ओर मिला कर जीत हासिल करने का लंबा इतिहास रहा है. तो क्या भारतीय लोकतंत्न एक बार फिर मध्यकाल की अंधेरी सामंती गुफाओं में जाने के लिए तैयार है? अगर ऐसा है तो हिंदुस्तान के गणतंत्न के लिए यह बेहद गंभीर संदेश है. 

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