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रहीस सिंह का ब्लॉग: पाकिस्तान को दरकिनार करता ओआईसी

By रहीस सिंह | Updated: February 16, 2020 05:32 IST

दरअसल पाकिस्तान चाह रहा है कि मुस्लिम देशों का यह 57 सदस्यीय ब्लॉक अपने विदेश मंत्रियों की काउंसिल को तत्काल आहूत करे और फिर उसमें कश्मीर पर चर्चा की जाए. ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान को यह पता है कि ओआईसी संयुक्त राष्ट्र के बाद दूसरे नंबर की इंटरगवर्नमेंटल बॉडी है इसलिए वहां पर उठाई गई बात दुनिया के सामने एक नया डायमेंशन लेकर आएगी जिसके अपने प्रभाव और मान्यताएं होंगी.

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पिछले दिनों पाकिस्तान को सऊदी अरब ने एक बार फिर बता दिया कि अब वह भारत के मुकाबले उसको अधिक महत्व नहीं देना चाहता. हुआ यह कि इस्लामिक सहयोग संगठन के वरिष्ठ अधिकारियों की 9 फरवरी से बैठक शुरू हुई थी. इस बैठक में सऊदी अरब ने पाकिस्तान के उस अनुरोध को स्वीकार करने में अनिच्छा प्रकट की जिसके तहत पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर ओआईसी काउंसिल ऑफ फॉरेन मिनिस्टर्स की बैठक तत्काल बुलाना चाहता था.

सऊदी अरब के इस रुख से इस्लामाबाद बेचैन है और इमरान खान पस्त. दरअसल इमरान को लग रहा था कि उनका मलेशियन कार्ड सऊदी अरब में भी चल जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसीलिए अब इमरान विचलित से नजर आ रहे हैं. पिछले दिनों वे मलेशिया में थिंक-टैंक पर बोलते हुए कह रहे थे कि कश्मीर पर ओआईसी की चुप्पी उनके लिए बेहद निराशाजनक है. उनकी निराशा का आलम यह था कि उन्हें यह कहते हुए देखा गया कि हमारी कोई आवाज नहीं है, हमारे बीच पूरी तरह से विभाजन है, यहां तक कि हम कश्मीर पर ओआईसी की बैठक में भी एक साथ नहीं आ सकते. सवाल यह है कि क्या इस्लामी दुनिया अपने रणनीतिक खांचे से पाकिस्तान को बाहर कर रही है और भारत के लिए जगह बना रही है?

दरअसल पाकिस्तान चाह रहा है कि मुस्लिम देशों का यह 57 सदस्यीय ब्लॉक अपने विदेश मंत्रियों की काउंसिल को तत्काल आहूत करे और फिर उसमें कश्मीर पर चर्चा की जाए. ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान को यह पता है कि ओआईसी संयुक्त राष्ट्र के बाद दूसरे नंबर की इंटरगवर्नमेंटल बॉडी है इसलिए वहां पर उठाई गई बात दुनिया के सामने एक नया डायमेंशन लेकर आएगी जिसके अपने प्रभाव और मान्यताएं होंगी. लेकिन सऊदी अरब को भलीभांति पता है कि उसे करना क्या है. यानी उसे जो करना चाहिए था वही किया. सवाल यह है कि सऊदी दबदबे वाले संगठन ओआईसी ने पाकिस्तान की परवाह करना क्यों छोड़ दिया है? वह संगठन जिसमें पाकिस्तान की दादागीरी चलती थी आज वह पाकिस्तान के लिए बेगाना सा क्यों हो गया है?

काउंसिल ऑफ फॉरेन मिनिस्टर्स की पिछली बैठक में भारत को मिले आमंत्रण से स्पष्ट हो चुका है कि ओआईसी में पाक का बोलबाला नहीं रह गया है. इसके बावजूद क्या पाकिस्तान ओआईसी को छोड़ पाएगा यह फिर सऊदी अरब को कन्विंस करने की कोशिश करेगा? दरअसल पाकिस्तान की बेचैनी यह है कि वह चार सीएफएम (काउंसिल ऑफ फॉरेन मिनिस्टर्स) सेशन वर्ष 1970, 1980, 1993 और 2007 में आयोजित कर चुका है, लेकिन अब भारतीय कूटनीति के प्रभावी होने के चलते मुंह की खा रहा है.

पाकिस्तान की मंशा थी कि कश्मीर मसले पर इस मंच का समयबद्ध तरीके से इस्तेमाल किया जाए और मुस्लिम दुनिया को इस ओर डायवर्ट कर वैश्विक कूटनीति पर पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ाया जाए. इस दिशा में सफलता हासिल करने के लिए सऊदी अरब पाकिस्तान के एंबेसडर का काम कर सकता था क्योंकि ओआईसी में सऊदी अरब की खास अहमियत है. लेकिन सऊदी अरब ने पाकिस्तान की मंशा पर पानी फेर दिया. हालांकि इसके बावजूद पाकिस्तान सऊदी अरब को नजरअंदाज नहीं कर पाएगा. कारण यह कि पाकिस्तान वहीं से तेल खरीदता है और वहीं निवेश व वित्तीय फंड हासिल करता है. यानी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था उसे सऊदी अरब की लोमड़ी बनाए रखने पर विवश करती रहेगी. लेकिन पाकिस्तान ओआईसी के मामले में क्या इसे छोड़ने का निर्णय ले सकता है?

इस विषय पर पाकिस्तान में एक विभाजन सा दिख रहा है. एक वर्ग है जो यह मानता है कि पाकिस्तान को ओआईसी से निकल जाना चाहिए. इसमें पाकिस्तानी संसद के बहुत से सदस्यों की मांग भी शामिल है. कारण यह है कि ये लोग यह मान रहे हैं कि अब ओआईसी की स्थिति संयुक्त राष्ट्र जैसी हो गई है.

उल्लेखनीय है कि अगस्त, 2019 में कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद सीनेट में बोलते हुए रजा रब्बानी ने कहा था कि ओआईसी का हाल संयुक्त राष्ट्र से भी गया गुजरा है. उनका कहना था कि ओआईसी कभी भी मुसलमानों की मदद को नहीं पहुंची चाहे वह 1990 के दशक में बोस्निया और फिलिस्तीन में होने वाले ज़ुल्म हों या कश्मीर की समस्या हो. लेकिन दूसरा वर्ग यह मान रहा है कि ओआईसी को छोड़कर पाकिस्तान क्या हासिल कर लेगा? उल्टा पाकिस्तान और भी अकेलेपन का शिकार हो जाएगा. इसलिए ओआईसी के साथ रहते हुए भारत के विरुद्ध रणनीति को सफल बनाने की कोशिश करनी चाहिए. यानी पाकिस्तान कशमकश में है और यह तय कर पाने में असमर्थ है कि किधर जाए.

पाकिस्तान की पीड़ा समझी जा सकती है क्योंकि आर्थिक बदहाली में अमेरिका द्वारा हाथ खींच लेने के बाद अब सऊदी सहित दुनिया के कुछ देश और ओआईसी जैसा संगठन ही उसकी मदद कर सकता है, लेकिन भारत का उस पर बढ़ता प्रभाव उसकी उम्मीदों पर पानी फेर रहा है. ओआईसी में भारत की शिरकत ‘पीवोट टू गल्फ’ या ‘पीवोट टू सऊदी’ की सफलता का संकेत है और पाकिस्तान का ओआईसी में घटता कद यह दर्शाता है कि भारत अपनी डिप्लोमेटिक स्ट्रेटेजी में सफल हो रहा है.

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