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पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉग: खाते-पीते घर के बच्चे क्यों भाग जाते हैं घर से?

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: July 17, 2019 05:55 IST

भावनाओं और रिश्तों को टीआरपी के जरिये कमाई का जरिया बना दिया गया. जबकि देश का सच तो ये भी है कि हर दिन 1200 भागे हुए बच्चों की शिकायत पुलिस थानों तक पहुंचती है. भागे हुए बच्चों में 52 फीसदी लड़कियां ही होती हैं. लेकिन हमेशा ऐसा होता नहीं है कि लड़का-लड़की एक साथ भागें. और पुलिस फाइल में जांच का दायरा अक्सर लड़कियों को वेश्यावृत्ति में ढकेले जाने से लेकर बच्चों के अंगों को बेचने या भीख मंगवाने पर जा टिकता है.

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‘घर की जंजीरें / कितनी ज्यादा दिखाई पड़ती हैं / जब घर से कोई लड़की भागती है..’ बीस बरस पहले कवि आलोक धन्वा ने ‘भागी हुई लड़कियां’ कविता लिखी तो उन्हें भी ये एहसास नहीं होगा कि बीस बरस बाद भी उनकी कविता की पंक्तियों की ही तरह घर से भागी हुई साक्षी भी जिन सवालों को अपने ताकतवर विधायक पिता की चारदीवारी से बाहर निकल कर उठाएगी, वह भारतीय समाज के उस खोखलेपन को उभार देगी जो मुनाफे-ताकत-पूंजी तले समा चुका है. 

ये कोई अजीबोगरीब हालात नहीं हैं कि न्यूज चैनल की स्क्रीन पर रेंगते खुशनुमा लड़कियों के चेहरे खुद को प्रोडक्ट मान कर हर एहसास, भावनाओं और रिश्तों को भी तार-तार करने पर आमादा हैं और टीआरपी के जरिये पूंजी बटोरने की चाहत में अपने होने का एहसास कराने पर भी आमादा हैं. दरअसल बरेली के विधायक की बेटी साक्षी अपने प्रेमी पति से विवाह रचाकर घर से क्या भागी, सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्क्रीन पर उसका तमाशा बना दिया गया.

भावनाओं और रिश्तों को टीआरपी के जरिये कमाई का जरिया बना दिया गया. जबकि देश का सच तो ये भी है कि हर दिन 1200 भागे हुए बच्चों की शिकायत पुलिस थानों तक पहुंचती है. भागे हुए बच्चों में 52 फीसदी लड़कियां ही होती हैं. लेकिन हमेशा ऐसा होता नहीं है कि लड़का-लड़की एक साथ भागें. और पुलिस फाइल में जांच का दायरा अक्सर लड़कियों को वेश्यावृत्ति में ढकेले जाने से लेकर बच्चों के अंगों को बेचने या भीख मंगवाने पर जा टिकता है. लेकिन समाज कभी इस पर चिंतन कर ही नहीं पाता कि आखिर वह कौन से हालात होते हैं जो बच्चों को घर से भागने को मजबूर कर देते हैं.

यहां बात भूख और गरीबी में पलने वाले बच्चों की नहीं है, बल्कि खाते-पीते परिवारों के बच्चों का जिक्र  है. और इस अक्स में जब आप पश्चिमी दुनिया के भीतर भागने वाले बच्चों पर नजर डालेंगे तो आपको आश्चर्य होगा कि जिन गंभीर परिस्थितियों में बच्चों के भागने के बाद भी हमारा समाज चर्चा करने को तैयार नहीं है, उसकी संवेदनशीलता को समझने के लिए टीवी स्क्रीन पर खुशनुमा लड़कियां भी तैयार नहीं हैं. 

वहीं इस एहसास को लेकर पश्चिमी देशों ने साठ-सत्तर के दशक में बखूबी चर्चा की, बहस की. सुधार के उपाय खोजे और माना कि पूंजी या कहें रुपया हर खुशी को खरीद नहीं सकता है. यानी एक तरफ ब्रिटेन-अमेरिका में साठ के दशक में बच्चों के घर से भागने पर ये चर्चा हो रही थी कि क्या पैसे से खुशी खरीदी जा सकती है. क्या पैसे से दिली मोहब्बत खरीदी जा सकती है. यानी भारतीय समाज के भीतर का मौजूदा सच साक्षी के जरिये उस दिशा में सोचने ही नहीं दे रहा है कि बहुत से मां-बाप जो अपनी जिंदगी में पैसे कमाने में मशगूल होते हैं, वे अपने बच्चों के लिए तमाम सुख-सुविधा  का इंतजाम कर देते हैं, सामान की उनके बच्चों को कमी नहीं होती. ऐसे बच्चों को कमी खलती है मां-बाप की, उनकी मोहब्बत की.

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