राष्ट्रपति पद की गरिमा पर न हो राजनीति?, द्रौपदी मुर्मु की बंगाल-यात्रा को लेकर घमासान?
By विश्वनाथ सचदेव | Updated: March 11, 2026 05:21 IST2026-03-11T05:21:52+5:302026-03-11T05:21:52+5:30
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की हाल की बंगाल-यात्रा को लेकर जिस तरह का वातावरण बन रहा है, वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता.

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देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक ही नहीं होता, देश के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति होता है. राष्ट्रपति को कैसे संबोधित किया जाए से लेकर राष्ट्रपति के साथ कैसा व्यवहार किया जाए जैसी बातें एक प्रोटोकॉल के अंतर्गत आती हैं, और अपेक्षा की जाती है कि कोई इसका उल्लंघन नहीं करेगा. हमारे राष्ट्रपति का सम्मान किसी व्यक्ति या पद का सम्मान मात्र नहीं है, वस्तुतः यह देश का सम्मान है, उस संविधान का सम्मान है जिसके आधार पर हमारी समूची जनतांत्रिक व्यवस्था चलती है. इस पद की मर्यादा को देखते हुए कुछ ऐसी ही अपेक्षा उस व्यक्ति से भी की जाती है, जिसे देश इस पद पर बिठाता है.
दलगत राजनीति से ऊपर होता है. आमतौर पर यह माना जाता है कि हमारा राष्ट्रपति विवादों से परे होगा. पिछले सात दशक से भी अधिक समय का इतिहास इस बात का साक्षी है कि इस पद पर बैठे व्यक्तियों ने कुल मिलाकर पद की गरिमा की रक्षा ही की है. ऐसे में जब किसी राष्ट्रपति के संदर्भ में विवादास्पद स्थितियां बनती हैं तो खेद भी होता है.
आशंका भी होती है कि देश का यह सर्वोच्च पद विवादों के चलते अपनी गरिमा न खो दे. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की हाल की बंगाल-यात्रा को लेकर जिस तरह का वातावरण बन रहा है, वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता. संथाल आदिवासियों की एक संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिए राष्ट्रपति प. बंगाल गई थीं.
राष्ट्रपति जब भी किसी राज्य में जाते हैं, भले ही वह यात्रा सामाजिक हो अथवा सरकारी, तो उनके स्वागत का एक निश्चित तरीका होता है, जिसका पालन राज्य सरकार को करना होता है. इस प्रोटोकॉल में मुख्य रूप से यह बात शामिल है कि राज्य का राज्यपाल, मुख्यमंत्री अथवा कोई वरिष्ठ मंत्री स्वागत करने पहुंचता है.
यह संभव है कभी किन्हीं कारणों से इस व्यवस्था का पूरा पालन न हो पाता हो, पर ऐसा होने का कोई उचित कारण होना-दिखना चाहिए. राष्ट्रपति मुर्मु की इस यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वागत के लिए नहीं पहुंची थीं. उन्होंने ‘पूर्व निर्धारित अन्य कार्यक्रम’ और राष्ट्रपति की यात्रा की पूर्व सूचना न मिलने का हवाला देकर अपनी अनुपस्थिति का औचित्य ठहराया है.
उनकी बात सही भी हो सकती है, पर ऐसे में वे अपने मंत्रिमंडल के किसी वरिष्ठ सहयोगी को वहां भेज कर अपना कर्तव्य निभा सकती थीं. वे चाहतीं तो चूक को स्वीकार करके विवाद की तल्खी कम कर सकती थीं. पता नहीं क्यों उन्होंने ऐसा करना जरूरी नहीं समझा. राष्ट्रपति के सम्मान को लेकर किसी भी प्रकार की चूक होना उचित नहीं है. देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को समुचित सम्मान मिलना ही चाहिए.