Pariksha Pe Charcha 2026: दोहरा जीवन जीते-जीते हम सभी नहीं क्या पाखंडी बन जाते हैं!

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 11, 2026 05:53 IST2026-02-11T05:53:57+5:302026-02-11T05:53:57+5:30

Pariksha Pe Charcha 2026: कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्कूल-काॅलेजों की पढ़ाई हमारे व्यावहारिक जीवन से कटने के कारण बोझ बनती जा रही हो?

Pariksha Pe Charcha 2026 Don't we all become hypocrites living double life blog Hemdhar Sharma | Pariksha Pe Charcha 2026: दोहरा जीवन जीते-जीते हम सभी नहीं क्या पाखंडी बन जाते हैं!

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Highlights पहाड़ी लड़की भी पांच-छह साल के एक बच्चे को पीठ पर लादे कुछ गुनगुनाती ऊपर जा रही थी. कथनी और करनी में समानता के कारण पहले महापुरुषों को लोग अपना आदर्श मानते थे.राष्ट्रपति बनाए रखने में अमेरिकियों को कोई शर्म महसूस नहीं होती.

हेमधर शर्मा

पिछले दिनों ‘परीक्षा पे चर्चा’ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों से पूछा कि क्या किसी को पिछले साल बोर्ड परीक्षा के टाॅपर का नाम याद है? जवाब में सारे छात्रों ने ‘ना’ में सिर हिलाया तो प्रधानमंत्री ने समझाया कि इससे साफ है कि नंबर क्षणिक होते हैं और छात्रों को अंकों की दौड़ के पीछे भागने की बजाय पढ़ाई की लय को पहचानना चाहिए तथा परीक्षा को बोझ नहीं, उत्सव की तरह लेना चाहिए. सवाल यह है कि नंबर क्या परीक्षा से बाहर की कोई चीज है, जिस पर ध्यान दिए बिना हमें पढ़ाई की लय को पहचानना चाहिए? और अगर वह पढ़ाई का ही परिणाम है तो फिर परीक्षा में टाॅप करने वाले सिर्फ एक दिन के लिए ही खबरों की सुर्खियां बनकर क्यों रह जाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्कूल-काॅलेजों की पढ़ाई हमारे व्यावहारिक जीवन से कटने के कारण बोझ बनती जा रही हो?

एक बार किसी पहाड़ी पर चढ़ते पर्यटकों ने देखा कि तेरह-चौदह साल की एक पहाड़ी लड़की भी पांच-छह साल के एक बच्चे को पीठ पर लादे कुछ गुनगुनाती ऊपर जा रही थी. थककर बेहाल हो चुके पर्यटकों ने पूछा कि इतना बोझ लेकर चढ़ते हुए क्या उसे थकान महसूस नहीं हो रही? लड़की ने उत्तर दिया कि यह बोझ थोड़ी है, यह तो मेरा भाई है.

परीक्षा अगर बोझ लगे तो थका देती है, लेकिन लड़की को अपने भाई की तरह हमें भी परीक्षा प्रिय हो तो अंकों की दौड़ क्या मजेदार नहीं बन जाती है? विकास कदाचित गुणात्मक गति से आगे बढ़ता है. जैसे दो गुणा दो, चार होता है, फिर आठ, सोलह, बत्तीस और चौंसठ गुना होता जाता है, इसी तरह शायद पहले जो बदलाव समाज में सैकड़ों वर्षों में आते थे, वे दशकों में आने लगे और अब तो कुछ ही वर्षों में आ जाते हैं.

लेकिन विकास की इसी गति से क्या हम पाठ्यक्रमों में भी परिवर्तन ला पा रहे हैं? आज स्कूल-काॅलेजों की शिक्षा क्या हमारे जीवन में काम आ रही है? हमारी मनुष्यता को परिष्कृत करने की बात तो दूर, रोजगार तक दिलाने में यह कितनी सहायक हो पा रही है? एक तरफ तो शिक्षित युवा बेरोजगार घूम रहे हैं, दूसरी तरफ कंपनियां कुशल कर्मचारियों के अभाव से जूझ रही हैं.

व्यवहार और सिद्धांत के बीच की यह दूरी सिर्फ शिक्षा ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में देखने को मिल रही है. राजनीति इसका ज्वलंत उदाहरण है. राजनीतिक दलों की घोषित विचारधारा कुछ भी हो, हकीकत में सारे दलों के नेता एक जैसे होते हैं, जिनका एकमात्र लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करना होता है. कथनी और करनी में समानता के कारण पहले महापुरुषों को लोग अपना आदर्श मानते थे.

आज वर्तमान के सफल और चमकदार नामों को अपना आदर्श बनाते हुए डर लगता है कि क्या पता कब कोई ‘एपस्टीन फाइल’ जारी हो जाए और बड़े-बड़े सफेदपोशों के पीछे का घिनौना सच सामने आ जाए! समाज में बढ़ती गिरावट का ही प्रमाण है कि डोनाल्ड ट्रम्प जैसे व्यक्ति को अपना राष्ट्रपति बनाए रखने में अमेरिकियों को कोई शर्म महसूस नहीं होती.

तो क्या दोमुंहेपन को ही अब हमने अपनी स्वाभाविक नियति मान लिया है? ऐसा नहीं है कि समाज के कुछ चुनिंदा क्षेत्र ही दलदल में डूबे हुए हैं. फिल्मों के अंडरवर्ल्ड से संबंध जगजाहिर हैं. विभिन्न विभागों से कुछ नेताओं-अधिकारियों को नंबर दो की कितनी कमाई होती है, यह बात अघोषित रूप से सब जानते हैं.

राजनीतिक दलों में आज सत्ता हथियाने के लिए जनता को ज्यादा से ज्यादा ‘मुफ्त’ में चीजें देने की होड़ लगी है. हाल ही में राज्यसभा में उठाए गए एक मामले से जानकारी सामने आई कि एक बड़ी फार्मा कम्पनी तीस डाक्टरों को दो करोड़ रुपए खर्च कर पेरिस घुमाने ले गई और बदले में उन्हें मरीजों के पर्चे में अपनी कंपनी की दवाइयां-इंजेक्शन लिखने के लिए कहा.

क्या हमने कभी सोचा है कि डाॅक्टर को मरीज भगवान क्यों मानते हैं? इसलिए क्योंकि जान बचाने की कीमत को पैसों में नहीं आंका जा सकता. सीमा पर तैनात सैनिक अगर तनख्वाह के अनुपात में ही अपनी ड्यूटी बजाने की बात सोच ले और जान देने का मौका आने पर पीछे हट जाए तो देश पर दुश्मनों का कब्जा होते देर नहीं लगेगी.

लेकिन जब हम पैसे को स्वतंत्र वस्तु मानकर उसी को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लें तो ऐसे दौर में कब तक डाॅक्टरों से मरीज के प्रति अपनी निष्ठा या सैनिकों से अपने भीतर देशभक्ति की भावना को सर्वोपरि मानने की अपेक्षा रख पाएंगे? हो सकता है जब आंच वहां तक पहुंचे तब हमें अहसास हो कि पैसा ही सबकुछ नहीं होता, लेकिन तब तक क्या बहुत देर नहीं हो चुकी होगी?

Web Title: Pariksha Pe Charcha 2026 Don't we all become hypocrites living double life blog Hemdhar Sharma

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