खुले मैदानों, बड़े बगीचों को भी विकास का हिस्सा मानना होगा 

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 20, 2026 07:15 IST2026-03-20T07:14:50+5:302026-03-20T07:15:11+5:30

बरसात के दिनों में पानी के जमीन में रिसाव में मदद करते हैं, गरबा जैसे सांस्कृतिक आयोजनों, वॉलीबॉल, फुटबॉल खो-खो जैसे कम खर्चीले स्थानीय खेलों के लिए उपयोगी हो सकते हैं.

Open grounds and large gardens will also have to be considered part of development | खुले मैदानों, बड़े बगीचों को भी विकास का हिस्सा मानना होगा 

खुले मैदानों, बड़े बगीचों को भी विकास का हिस्सा मानना होगा 

अभिलाष खांडेकर

भीषण गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है. जल्द ही इसका असर और भी गंभीर होगा. इजराइल-अमेरिका बनाम ईरान युद्ध, जो तीसरे विश्व युद्ध का रूप लेता दिख रहा है, कई हफ्तों बाद भी शांत नहीं हुआ है. यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा बन रहा है. हालांकि हम युद्ध के कारण उत्पन्न तनावों के देर-सबेर समाप्त होने की आशा और प्रार्थना कर सकते हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि से संबंधित खतरे बने रहेंगे. इसका कारण यह है कि हम भारतीय बढ़ते तापमान से निपटने के लिए अपेक्षित ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं.

पिछले हफ्ते मुझे इंदौर के पास एक अनोखे फल बागान और शहरी जंगल को देखने का मौका मिला, जिसे एक समर्पित पर्यावरणविद् ने अथक परिश्रम और स्वयं के सीमित  संसाधनों के बाद विकसित किया है. यह कोई व्यावसायिक परियोजना नहीं है; एक पति-पत्नी की जोड़ी ने कमाल कर दिखाया है. इस छोटे से खुले बागान ने साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन से स्थानीय स्तर पर भी कैसे निपटा जा सकता है और गर्मियों में देशी पेड़, खुले मैदान और घास के मैदान आपको वह सब कुछ प्रदान कर सकते हैं जिसकी आपको आवश्यकता है- एक आदर्श वातावरण, पानी का जमीन में रिसाव और सबसे बढ़कर, खाने के लिए फल और सब्जियां. भूमि के प्राकृतिक उपचार के बाद वहां का भूजल स्तर सुधर गया है.

भारत में आज के दौर में विकास का मतलब है भव्य मॉल, विशाल बहुमंजिला कार्यालय परिसर, मेट्रो स्टेशन (जहां इनकी आवश्यकता नहीं है) बनाना और खुले स्थानों को कांक्रीट से ढक देना; सीमेंट की सड़कों को बनाना जिससे पानी का जमीन में रिसाव पूर्णतः थम जाता है. यह सब गलत हो रहा है.

अत्यधिक शहरीकृत क्षेत्रों में खुले स्थान शहरों की जीवनरेखा होते हैं. स्मार्ट सिटी, ग्रोथ इंजन आदि नामों से पुकारे जाने वाले शहरों के तेजी से विस्तार के साथ, छोटे-बड़े बगीचों, खेल के मैदानों, सरकारी विद्यालयों के मैदानों और सार्वजनिक भूमि जैसे पारंपरिक खुले स्थानों को सरकार और निजी क्षेत्र के ठेकेदार बुनियादी ढांचा निर्माण के नाम पर हथिया रहे हैं.

मिट्टी से ढंके खुले स्थान-मैदान मानव समाज के लिए क्या करते हैं? आपने कभी इस बात पर गौर किया है? जलवायु परिवर्तन के इस भयानक दौर में इनके अनेक उपयोग हैं; इसीलिए इन्हें सख्त कानून और राजनीतिक इच्छाशक्ति के माध्यम से संरक्षित किया जाना चाहिए. शहरों (और साथ ही बसने योग्य गांवों) से खुले स्थानों को छीनना पुराने जलस्रोतों को दफनाने, नदियों और जल निकायों को नष्ट करने जैसा महापाप है, जिसका पछतावा संकट के समय ही होता है. मैं जमीनों की बढ़ती कीमतों से अनजान नहीं हूं, फिर भी खुले मैदानों की वकालत कर रहा हूं.

बहुत जल्द ही लोगों की लंबी कतारें प्लास्टिक के डिब्बे लिए पानी के टैंकरों का इंतजार करती नजर आएंगी, जो हर दूसरे दिन या शायद चार दिन बाद आएंगे, क्योंकि मई के अंत तक पूरे भारत में पानी की किल्लत गंभीर होना तय है. मैं खुले स्थानों के लिए इसलिए पैरवी कर रहा हूं ताकि रिसाव के माध्यम से भूजल का पुनर्भरण हो सके.

कृषि, औद्योगीकरण और शहरीकरण की बढ़ती जरूरतों के साथ-साथ अन्य उपयोगों के कारण भूजल की स्थिति (अत्यधिक दोहन से) बद से बदतर होती जा रही है, लेकिन हमारे जल संसाधनों पर ध्यान देने के लिए कुछ ठोस नहीं किया गया है.  

किसी भी शहर या गांव के लिए खुले स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं. ये जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को कम करने में सहायक होते हैं, बरसात के दिनों में पानी के जमीन में रिसाव में मदद करते हैं, गरबा जैसे सांस्कृतिक आयोजनों, वॉलीबॉल, फुटबॉल खो-खो जैसे कम खर्चीले स्थानीय खेलों के लिए उपयोगी हो सकते हैं.

लगभग एक एकड़ या उससे कम का खुला भूखंड यदि पेड़ों, घास से सुसज्जित हो और आसपास कोई गंदगी न हो तो बच्चों और बुजुर्गों के लिए कई लाभ प्रदान कर सकता है. हमने देखा है कि पिछले 50 वर्षों में बड़े-बड़े बगीचे, बावड़ियां, तालाब और झीलें हमारी आंखों के सामने लगभग गायब हो गए हैं.

इसी का परिणाम है जलवायु परिवर्तन. केंद्रीय भूजल बोर्ड का गठन 1986 में हुआ था और तब से, कई तकनीकी-कानूनी उपायों के बावजूद, स्थिति और बिगड़ती जा रही है.

खुले क्षेत्रों को सीमेंट-कांक्रीट की परतों से पक्का करने और कांक्रीट रोड के निर्माण का गलत चलन मुसीबतों को और भयावह बना रहा है; राजनेता इसे समझते ही नहीं. यदि नीति आयोग जैसे नीति निर्माता राज्यों को विकास के हिस्से के रूप में खुले स्थानों को खुला रखने के निर्देश जारी करें तो भविष्य थोड़ा सुरक्षित हो सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि मुंबई शहर का 95 प्रतिशत हिस्सा पक्का है और यही शहरी बाढ़ और वर्षा जल की बर्बादी का कारण है. क्या अब भी हम खुले मैदानों, बगीचों, बड़े खेल मैदानों की सुरक्षा नहीं चाहेंगे?

Web Title: Open grounds and large gardens will also have to be considered part of development

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