बिहार में यादगार रहा नीतीश कुमार का कार्यकाल
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 9, 2026 20:16 IST2026-03-09T20:15:58+5:302026-03-09T20:16:39+5:30
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ना कई लोगों के गले नहीं उतर रहा है, खासकर तब जब वर्तमान कार्यकाल के लिए बिहार का मुख्यमंत्री बने मुश्किल से चार महीने ही हुए हैं.

file photo
बिहार में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने और राज्यसभा में जाने का मन बनाने से तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. सियासी गलियारों में चर्चा है कि उन्होंने अपनी बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य कारणों से यह फैसला लिया है, जबकि खुद नीतीश कुमार का कहना है कि उनकी विधानमंडल व संसद के दोनों सदनों का सदस्य बनने की इच्छा थी, इसलिए इसी क्रम में वे राज्यसभा का सदस्य बनना चाहते हैं.
हो सकता है कि नीतीश की सचमुच यही इच्छा हो, लेकिन राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ना कई लोगों के गले नहीं उतर रहा है, खासकर तब जब वर्तमान कार्यकाल के लिए बिहार का मुख्यमंत्री बने मुश्किल से चार महीने ही हुए हैं. अगर उन्हें इतनी जल्दी पद छोड़ना था तो विधानसभा चुनाव के दौरान इसका संकेत तो दिया जा सकता था!
या फिर चुनाव ही नीतीश के बजाय किसी और चेहरे पर लड़ा जाता! यह सही है कि चार माह पहले हुए राज्य के विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू ने गठबंधन में रहते हुए 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था और जदयू को 85 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी. इस नाते मुख्यमंत्री पद पर अधिकार तो भाजपा का ही था.
वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में भी जदयू को 43 सीटें ही मिली थीं, जबकि भाजपा को 74 सीटें, इसके बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बने थे. अब संभव है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते प्रदेश भाजपा में भी ऐसे स्वर उठने लगे हों कि मुख्यमंत्री उनकी अपनी पार्टी का होना चाहिए. इसके अलावा पिछले कुछ समय से उनका मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत संतुलित नहीं लग रहा था.
इसलिए हो सकता है उन्हें भी लगा हो कि राज्य की सक्रिय राजनीति से विदाई का उनके लिए यही सही समय है! बहरहाल, सारे किंतु-परंतुओं के बीच, हमें मान लेना चाहिए कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने का जो कारण नीतीश कुमार बता रहे हैं, वही सही होगा. जहां तक उनके लगभग दो दशक तक बिहार का नेतृत्व संभालने की बात है, इसमें कोई दो राय नहीं कि वे बिहार को भ्रष्टाचार और कुशासन से मुक्ति दिलाते हुए विकास के रास्ते पर लाए. उन्हें ‘सुशासन बाबू’ का तमगा यूं ही नहीं मिल गया था.
उन्होंने राज्य में जहां पूर्ण शराबबंदी लागू की, वहीं पंचायत और नगर निकायों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू किया. पुलिस में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिया तो जीविका दीदियों के विस्तार से महिला सशक्तिकरण किया. निश्चित रूप से उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान राज्य में विकास के जो मानक तय किए, उन पर खरा उतरने की चुनौती उनके उत्तराधिकारियों के सामने रहेगी.