‘हां’ और ‘ना’ में बड़ा फासला रखने वाले राजनीति के ‘दादा’
By Amitabh Shrivastava | Updated: January 29, 2026 09:50 IST2026-01-29T05:56:39+5:302026-01-29T09:50:42+5:30
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव के बेटे होने के कारण उन्हें बचपन से ही राजनीति का माहौल मिला.

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इसे राजनीति की विवशता कहा जाए या फिर लोकप्रिय बनने का असफल प्रयास, ज्यादातर नेता झूठे आश्वासनों पर अपनी नेतागीरी की दुकान सजा लेते हैं. महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार अकेले ऐसे नेता थे, जिन्हें दिल से ‘दादा’ का सम्मान मिला. इसकी सीधी वजह उनकी ‘दादागीरी’ थी, जिसे उनके काम करने का अंदाज कहा जाता था. यह सबको मालूम था कि वे स्पष्टवादी हैं. बिंदास बोलते हैं. जिसे ‘हां’ बोल दिया, उसे ‘ना’ होने की उम्मीद से कोसों दूर ले जाते थे. उन्हें मंच से यह बोलने में संकोच नहीं था कि उनके पास खड़ा सरकारी कर्मचारी तंबाकू खा रहा है.
वे मंच से ही अपने कार्यकर्ता को बोल सकते थे कि ‘आई लव यू बोलना’ है तो अपनी पत्नी से जाकर घर में बोले, यहां उनसे न बोले. महाराष्ट्र की राजनीति में उनके प्रशंसकों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की कि अजित पवार किस पद और सरकार से जुड़े हैं. वे उनको केवल अपने नेता के रूप में जानते थे.
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव के बेटे होने के कारण उन्हें बचपन से ही राजनीति का माहौल मिला. 12वीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बावजूद सरकार की वित्त व्यवस्था पर उनकी तगड़ी पकड़ थी. उन्होंने अपनी राजनीति वर्ष 1982 में शक्कर कारखाने के चुनाव से आरंभ की और सहकारिता संस्थाओं से जुड़ते हुए वर्ष 1991 में पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने.
यही वह साल था जब पहली बार वे लोकसभा चुनाव में बारामती से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए. उन्होंने रिकाॅर्ड मतों से जीत दर्ज की. बावजूद इसके कुछ ही समय बाद उन्होंने अपने चाचा के लिए उस सीट को खाली कर दिया. बाद में उपचुनाव हुए और शरद पवार जीते और पीवी नरसिंह राव की सरकार में रक्षा मंत्री बने.
इसके बाद वे साल 1995 से महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पहले कांग्रेस के टिकट पर और बाद में राकांपा के गठन पर उसके टिकट पर लगातार जीतकर सात बार विधायक बने. वर्ष 1999 में वे मंत्री बने और वर्ष 2010 में उपमुख्यमंत्री बने. फिर लगातार छह बार उन्हें उपमुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला. वर्ष 2004 और बाद में वर्ष 2019 में मुख्यमंत्री बनने का अवसर उनके सामने था.
यदि तगड़ी राजनीतिक सौदेबाजी करते तो वे मुख्यमंत्री कुछ वर्ष के लिए बन सकते थे, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों से समझौता किया. करीब 44-45 साल के राजनीतिक सफर में अजित पवार ने महत्वाकांक्षा को टूटने की हद तक नहीं बढ़ने देने का प्रण लिया. वहीं दूसरी ओर लोकप्रिय बनने के सारे गुण आत्मसात किए,
जिनमें समय की पाबंदी, लोगों के लिए सुलभता, समस्याओं के समाधान में सहायता, विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से विचार-विमर्श के बाद निर्णय प्रमुख थे. उनके पास दूरदृष्टि थी और आने वाले समय के लिए विकास का स्पष्ट दृष्टिकोण भी था. उनके पास सुनने की क्षमता भी थी और सुनाने का साहस भी था.
उनकी राजनीति में एकाग्रता थी और कुछ करने की लगन भी. जिससे वे जहां वादा करते थे, उसे दादा का वादा माना जाता था. जहां इंकार करते थे, वहां काम असंभव माना जाता था. इसीलिए उन्हें विश्वसनीय राजनीतिज्ञ माना गया और उनके ‘हां’ और ‘ना’ के फैसले को सम्मान दिया गया. यही उनकी ‘दादागीरी’ थी, जो उनके प्रशंसकों को खूब भाती थी. जो उनकी अनुपस्थिति में अब सबको बहुत खलेगी.