मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और चेन्नई में सार्वजनिक भूमि, फुटपाथ, पार्क और सड़कों पर अतिक्रमण का बढ़ता संकट
By विवेक शुक्ला | Updated: February 7, 2026 05:57 IST2026-02-07T05:57:41+5:302026-02-07T05:57:41+5:30
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस अमित बंसल ने पिछले माह 23 जनवरी को अपने एक अहम फैसले में दिल्ली नगर निगम को निर्देश दिया कि वह पूर्वी दिल्ली की मंडावली रोड पर अवैध ठेला वालों और अतिक्रमणों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे.

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देश के हरेक छोटे-बड़े शहरों से लेकर महानगरों में सरकारी और सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण करने का सिलसिला तेज होता जा रहा है. जब कब्जा करने वालों को खदेड़ा जाता है तब बवाल मच जाता है. दिल्ली ही नहीं मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में भी सार्वजनिक भूमि, फुटपाथ, पार्क और सड़कों पर अतिक्रमण आम हो गए हैं. रिपोर्टों के अनुसार, इन शहरों में हजारों एकड़ भूमि अवैध कब्जों से प्रभावित है. उदाहरण के लिए, मुंबई में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण के दस हजार से अधिक मामले दर्ज हुए हैं, जबकि अन्य शहरों में फुटपाथ और सड़क किनारे पर दुकानें-ठेले सार्वजनिक स्थान को निगल रहे हैं. यह समस्या न केवल शहरी भीड़ बढ़ाती है, बल्कि बुनियादी ढांचे पर दबाव डालती है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है. इस समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण जरूरी है.
सबसे पहले, नियमित सर्वेक्षण और सख्त निगरानी प्रणाली होनी चाहिए. रेलवे और नगर निगमों को स्थानीय प्रशासन के साथ बेहतर समन्वय करना होगा. अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ प्रभावित लोगों के लिए पुनर्वास की ठोस योजना बनानी होगी, ताकि कार्रवाई मानवीय हो.
साथ ही, भूमि उपयोग नीतियों में सुधार, किफायती आवास योजनाओं का विस्तार और कानूनी प्रक्रिया को तेज करना आवश्यक है. दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस अमित बंसल ने पिछले माह 23 जनवरी को अपने एक अहम फैसले में दिल्ली नगर निगम को निर्देश दिया कि वह पूर्वी दिल्ली की मंडावली रोड पर अवैध ठेला वालों और अतिक्रमणों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे.
बेशक, यह निर्देश एक मिसाल कायम कर सकता है और अन्य सड़कों तथा सरकारी सार्वजनिक भूमियों को अनधिकृत कब्जेदारों और भूमि माफिया से मुक्त कराने के लिए समान कार्रवाई को प्रोत्साहित कर सकता है. सरकारी संपत्ति जनता की संपत्ति है. इसे बचाना और उसका उचित उपयोग सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है.
यदि महानगरों में अतिक्रमण पर प्रभावी रोक नहीं लगी, तो शहरी विकास और सार्वजनिक सुविधाओं का सपना अधूरा रह जाएगा. समय आ गया है कि केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें.